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तीरंदाज: व्यवस्था से हताश लोग

असल में जो लोग मुठभेड़ में आरोपित बलात्कारियों की मौत से खुश हैं, वे सारी व्यवस्था और माहौल से अपने मूलचूल तक बेहद निराश हैं। वे देख रहे हैं कि एक तरफ तो व्यवस्था गूंगी गुड़िया बन गई है, जिससे हर तरह का तत्त्व तामसिक खिलवाड़ कर रहा है, तो दूसरी तरफ कुछ तबकों ने व्यवस्था के हलकों पर अनधिकार अधिग्रहण कर लिया है।

Hyderabad Rape Case, Police Encounterहैदराबाद रेप -मर्डर केस के आरोपियों को पुलिस ने शुक्रवार को मुठभेड़ में मार गिराया।

अश्विनी भटनागर

सनसनीखेज वारदात करने वालों का सनसनीखेज खात्मा हो चुका है। हैदराबाद के निकट एक मासूम बेटी का जिस तरह से चार हैवानों ने बलात्कार किया था और फिर उसे जिस बेरहमी से फूंक दिया था, उसकी सही सजा ‘पुलिस एनकाउंटर’ में दी गई सख्त मौत ही है। दरिंदों का अंत तुरंत और दया शून्य होना चाहिए। पुलिस के बयान के अनुसार कथित बलात्कारियों ने हिरासत से फरार होने की कोशिश की थी और जब अनुरक्षण दल ने इसे विफल करने का प्रयास किया, तब इन चारों ने उन पर पत्थर बरसाए और गोली भी चलाई थी। जवाबी फायर में पुलिस इनको ढेर करने में कामयाब रही।

खबर के ‘ब्रेकिंग’ होते ही सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाएं बरसने लगी थीं। ज्यादातर लोगों का कहना था कि जो भी हुआ, अच्छा हुआ। इन वहशी युवकों को अपने कुकृत्य की उचित सजा मिल गई। यों भी ‘निर्भया कांड’ के बाद यह मांग उठती रही है कि कानून में बलात्कारियों के लिए सजा-ए-मौत निश्चित होनी चाहिए और आरोप सिद्ध होने पर उन्हें फांसी पर फौरन लटका देना चाहिए।

कोर्ट-कचहरी की लंबी कार्य प्रणाली को भी बलात्कार जैसे संगीन जुर्म के संदर्भ में त्वरित निपटान करने की जरूरत पर भी जोर दिया गया था। दशकों तक चलने वाली कानूनी कार्यवाही की वजह से ज्यादातर मामलों में आरोपी बच निकलते हैं और अगर कहीं किसी को सजा हो भी जाती है, तो पीड़ित महिला के लिए उसका कोई मतलब नहीं रह जाता है। न्याय तुरंत होना जरूरी है और ऐसा होना चाहिए, जिससे घृणित प्रवृत्ति वालों को उचित सबक मिल सके।

इसमें कोई शक नहीं है कि चाहे वह पुलिस हो या न्यायपालिका, पीड़ित को समयबद्ध कार्रवाई की अपेक्षा होना लाजमी है। पर जैसा हमने पिछले सत्तर सालों के दौरान देखा है कि आरोपित अपराधी न्याय व्यवस्था की प्रक्रिया में निहित कमियों का फायदा उठा कर कानून के शिकंजे से बाहर रहते हैं और शिकायतकर्ता का उत्पीड़न जारी रखते हैं। उन्नाव जिले में बलात्कार की शिकार एक बच्ची को बलात्कारियों ने हाल ही में जिंदा जला दिया। मरने से पहले उसने इन घिनौने लोगों की पहचान तो बता दी थी और अब उन पर कार्रवाई भी हो, पर इस लड़की की बेहद दर्दनाक मौत फिर एक बार बताती है कि हमारी व्यवस्था कितनी लचर और संवेदनहीन है।

इसके साथ जब लगातार सूचनाएं मिलती हैं कि किस तरह से जघन्य अपरधियों को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है और वे किस सीनाजोरी से पीड़ित और उसके परिवार को धमका रहे हैं, तो हमारी और आपकी कानून और न्याय-व्यवस्था के साथ-साथ राजनीतिक व्यवस्था से भी आस्था समाप्त हो जाती है। ऐसी स्थिति में जन-मानस का आंदोलित होकर फौरन से पेश्तर कबीलाई इंसाफ की मांग करना स्वाभाविक है। खून का बदला खून और लगे हाथ मामले को उत्तेजित हालात के हिसाब से निपटा देने की प्रवृत्ति उग्र हो गई है।

अगर आज के हालत पर गौर करें और पीछे हुए कई अलग-अलग संदर्भों के घटनाक्रम पर निगाह दौड़ाएं तो साफ हो जाता है कि एक संदर्भ दूसरे को प्रभावित ही नहीं कर रहा है, बल्कि अपनी लपेट में भी ले रहा है। उदाहरण के लिए महिला सुरक्षा के नाम पर ‘एंटी रोमियो स्क्वाड’ को राजनीतिक स्तर पर मंजूरी दी गई थी। महिला संरक्षण बहुत अच्छा विचार है, पर ‘एंटी रोमियो स्क्वाड’ के नाम पर हर तरह के तत्त्व सक्रिय हो गए थे। इससे स्थापित व्यवस्था, यानी पुलिस द्वारा संगठित कानून-व्यवस्था हाशिये पर कर दी गई थी। कोई भी उचक्का ‘स्क्वाड’ का बिल्ला लगा कर कानून का डंडा चलाने लगा था।

एक वर्ग ने इस तरह की पहल का स्वागत किया था, पर वह भूल गया था कि इसके दूरगामी परिणाम भी हो सकते हैं। उचक्के धीरे-धीरे अपनी भीड़ बनाने में कामयाब हो गए और महिला सुरक्षा का मुद्दा पहले गौ-सुरक्षा और फिर भीड़ द्वारा हत्या में तब्दील हो गया था। धर्म संरक्षण के नाम पर सड़क पर इंसाफ होने लगा था, जिससे कानून-व्यवस्था और लाचार होती गई। पुलिस वालों का कहना था कि वे आखिर करें भी तो क्या करें! ऊपर से आदेश है कि भीड़ को मनमानी करने दो।

हैदराबाद, उन्नाव और इनसे पहले ‘निर्भया एक’ और ‘निर्भया दो’ जैसे कई घिनौने कांड हो चुके हैं। निर्भया के बलात्कारियों को कई वर्ष बीत जाने के बाद भी, उचित सजा नहीं मिली है। यों हैदराबाद एनकाउंटर के बाद एक वर्ग का हर्ष वास्तव में कानून-व्यवस्था पर उनके रोष को जाहिर करता है। वे वाजिब न्याय के न होने से इतने हताश हो चुके हैं कि सड़क पर गोली कांड हो जाना ही उनको सही विकल्प लगता है। उनके जेहन में वह छवि भी कांटे की तरह से खटक रही है, जिसमें उन्नाव की बलात्कार पीड़िता और उसके परिवार का उत्पीड़न शिकायत करने के बाद बढ़ गया था और आखिर एक ट्रक उसे रौंद कर चला गया था, जिसमें वह किसी तरह जिंदा बच सकी। उसके परिवार के कुछ लोग मारे गए। साथ में उन्हें वह दृश्य भी याद है, जिसमें एक वरिष्ठ सांसद अपनी चुनाव में जीत का धन्यवाद प्रस्ताव लेकर बलात्कार आरोपी से मिलने जेल पहुंच गए थे।

असल में जो लोग मुठभेड़ में आरोपित बलात्कारियों की मौत से खुश हैं, वे सारी व्यवस्था और माहौल से अपने मूलचूल तक बेहद निराश हैं। वे देख रहे हैं कि एक तरफ तो व्यवस्था गूंगी गुड़िया बन गई है, जिससे हर तरह का तत्त्व तामसिक खिलवाड़ कर रहा है तो दूसरी तरफ कुछ तबकों ने व्यवस्था के हलकों पर अनधिकार अधिग्रहण कर लिया है। ऐसा करने के लिए माहौल रचा गया था, कहना मुश्किल है, पर छोटी-छोटी भूलों ने आज दैत्यकायी भूल रूपी माहौल की शक्ल ले ली है।

दूसरी तरफ जो लोग हैदराबाद किस्म के इंसाफ पर किंतु-परंतु कर रहे हैं, वे भी उतने ही हताश हैं, जितना कि खुश होने वाले हैं। कुल मिला कर नागरिक अपने को बेबस और लाचार महसूस करने लगे हैं। उनको व्यवस्था से कोई आशा नहीं रह गई है। हैदराबाद जैसे तुरंत न्याय के जोखिम को जानते हुए भी वे कहीं न कहीं उसका समर्थन कर रहे हैं। वास्तव में गलन आत्मा तक का ह्रास कर चुकी है। हम जंगल में नहीं रहते हैं, फिर भी जंगल राज के हामी होने के लिए मजबूर होते जा रहे है।

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