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समाज और महिलाएं: अजन्मी बेटियों की हकीकत

अनुमान है कि अब तक इस अपराध के लिए करीब ढाई-तीन सौ लोगों को जेल भेजा जा चुका है। इन सजाओं के बाद उम्मीद की गई है कि इससे हमारा समाज कुछ सबक लेगा और लैंगिक अनुपात में आते भयावह अंतर पर रोक लग सकेगी।

Author Published on: August 18, 2019 1:48 AM
इसमें भी इंटरनेट उनकी मदद करता है।

मनीषा सिंह

समाज में महिलाओं को सम्मान, स्वायत्तता और समानता न मिल पाने की बड़ी वजह समाज की संकीर्ण सोच है। हालांकि इसे बदलने के लिए अनेक जागरूकता अभियान चले, कानूनों में दंड के कड़े प्रावधान किए गए, मगर स्थिति में कोई उल्लेखनीय बदलाव नजर नहीं आता। आज भी कन्या भ्रूण हत्या और बलात्कार की घटनाएं रुकने का नाम नहीं ले रहीं। माना जाता है कि जब समाज शिक्षित होता है, तो इस तरह की समस्याएं अपने आप हल होने लगती हैं, पर महिलाओं की सुरक्षा के मामले में अब यह मान्यता भी सही नहीं जान पड़ती। ऐसी स्थितियों से पार पाने का क्या रास्ता हो सकता है, इस बार की चर्चा इसी पर। – संपादक

देश के कई राज्यों में बिगड़ता लिंगानुपात समाज और सरकार के लिए चिंता का विषय है। इसकी अहम वजह कन्या भ्रूण हत्या है, यह तथ्य भी किसी से छिपा नहीं है। सोनोग्राफी यानी गर्भ की जांच करने वाली अल्ट्रासाउंड मशीनों के अस्तित्व में आने और गांव-कस्बों तक में उनका इस्तेमाल बढ़ने से हमारे सामाजिक परिदृश्य से करीब 6.3 करोड़ बेटियां आजादी के बाद से गायब हो गर्इं। यह आंकड़ा पिछले वर्ष के आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18 में दिया जा चुका है। तमाम कानूनी प्रतिबंधों के बावजूद यह सिलसिला जारी है। हाल ही में एक खबर उत्तराखंड से आई कि वहां उत्तरकाशी जिले के एक सौ तैंतीस गांवों में बीते तीन महीनों में दो सौ सोलह प्रसव हुए, जिनमें एक भी लड़की नहीं है। एक स्वयंसेवी संगठन के माध्यम से तथ्य उजागर हुआ कि उत्तरकाशी के कुछ इलाकों में प्रसव पूर्व लिंग जांच कराने वालों का गिरोह काम कर रहा है, जो देहरादून और चंडीगढ़ से संचालित होता है। मोबाइल या छोटी अल्ट्रासाउंड (सोनोग्राफी) मशीनों के जरिए गर्भ में पल रहे बच्चे के लिंग की जानकारी कुछ हजार रुपयों में मिल जा रही है। हालांकि घोषित रूप से उत्तरकाशी जिले में तीन ही अल्ट्रासाउंड मशीनों की मौजूदगी स्वीकार की गई है। दावा है कि तीनों की सतत निगरानी की जाती है, ताकि उनका गलत इस्तेमाल न हो सके।

यह पहला मौका नहीं है जब देश में चीनी पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड मशीनों की पहुंच बढ़ने और उनके गलत इस्तेमाल से बेटियों की गर्भ में ही हत्या कराने का संदेह किया जा रहा है। दो वर्ष पहले भी ऐसी ही खबरें महाराष्ट्र के पुणे से आई थीं कि वहां गांव-कस्बों तक में क्लीनिक और नर्सिंग होम चला रहे लोग चीन में बनी छोटी अल्ट्रासाउंड मशीनों के जरिए धड़ल्ले से गर्भ में मौजूद भ्रूण के लिंग की जांच कर रहे हैं। कई मौकों पर पता चला है कि हमारा समाज कन्या भ्रूण हत्या के मकसद से आधुनिक मशीनों और तकनीकों का इस्तेमाल करने लगा है। उन मशीनों और तकनीकों पर नजर रखने वाला महकमा ज्यादातर मौकों पर सुस्त और लापरवाह ही रहा है।

तकनीक का आविष्कार तो मानवता की बेहतरी के लिए हुआ है, लेकिन जैसे-जैसे तकनीक आगे बढ़ रही है, पता चलता है कि उसका इस्तेमाल कुछ नकारात्मक चीजों के लिए भी हो रहा है। बड़ी विडंबना है कि हमारे देश में भ्रूण परीक्षण पर कानूनन प्रतिबंध होने के बावजूद उसके कई चोर रास्ते लोगों और इस धंधे में लगे लोगों ने तलाश लिए हैं। एक ओर लोग इंटरनेट की विभिन्न वेबसाइटों की सहायता से यह जानकारी निकालते रहते हैं कि भ्रूण के लिंग की जानकारी कैसे हासिल की जाए, तो दूसरी ओर कन्या भ्रूण हत्या के धंधे में लगे लोग अपने लालच के लिए सस्ती अल्ट्रासाउंड तकनीकों और मशीनों को विदेशों से हासिल करते रहे हैं। इसमें भी इंटरनेट उनकी मदद करता है।

गर्भ की स्थिति और विकृतियों का पता लगाने के मकसद से अल्ट्रासाउंड मशीनों से लेकर इंटरनेट तक का जैसा इस्तेमाल हो रहा है, उनके बारे में तो शायद इनके आविष्कर्ताओं ने भी नहीं सोचा होगा। अल्ट्रासाउंड मशीनें इसलिए बनीं कि अजन्मे शिशु की विकृतियों की गर्भ में जांच हो सके, ताकि समय पर इलाज कर उन्हें दूर किया जाए, पर तकरीबन पूरे देश में वे कन्या भ्रूण हत्या के घृणित काम में सहायक बन गर्इं। सरकार ने देश में कन्या भ्रूण हत्या के बढ़ते मामलों को देखते हुए लिंग परीक्षण को अपराध घोषित कर रखा है, लेकिन अल्ट्रासाउंड जांच करने वाले क्लीनिकों ने गर्भ की विकृतियों की जांच की आड़ में चोरी-छिपे यह सच जानने और बताने का काम अब तक जारी रखा है। यह साबित हो चुका है कि अल्ट्रासाउंड सुविधा से लैस नर्सिंग होम जाने वाली गर्भवती महिलाओं में से करीब पैंसठ फीसद पैसे देकर भ्रूण के लिंग के बारे में जानना चाहती हैं। चाहे वे ऐसा परिजनों के दबाव में करती हों या स्वेच्छा से।

असल में, कन्या भ्रूण हत्याओं की करोड़ों घटनाओं के पीछे अहम कारण परिवारों का भीतरी दबाव ही है। तमाम सामाजिक कारणों से गर्भवती पर लिंग जांच और कन्या भ्रूण हत्या का दबाव बनाता है। इसमें भी पुरुषों के बजाय घर की बड़ी-बुजुर्ग महिलाओं और विशेष रूप से पति और उसकी मां यानी सास की अहम भूमिका होती है। इस संबंध में तीन साल पहले यानी 2016 की एक घटना का उल्लेख प्रासंगिक होगा। उस वर्ष महाराष्ट्र में भ्रूण के लिंग की जांच कराने के मामले में गर्भवती महिलाओं के पतियों को डॉक्टरों समेत गिरफ्तार किया गया था। पुणे के सोलापुर में सोनोग्राफी के मामले में दो डॉक्टरों के अलावा दो महिलाओं के पतियों को भी लिंग परीक्षण कराने से रोकने वाले कानून प्री-कन्सेप्शन ऐंड प्री-नैटल डायग्नॉस्टिक टेक्नीक (पीसीपीएनडीटी एक्ट, 1994) के तहत गिरफ्तार किया गया था। इनके पतियों के खिलाफ पीसीपीडीएनटी अधिकारी ने अदालत में मामला भी दर्ज कराया था। पीसीपीडीएनटी एक्ट में पतियों की गिरफ्तारी का यह देश में पहला मामला था। मगर यह बात काफी पहले स्पष्ट हो चुकी है कि भ्रूण की लिंग जांच और हत्या में महिलाओं के बजाय उनके पतियों या ससुराल वालों का दबाव ही काम कर रहा होता है।

अमूमन कोई महिला नहीं चाहती कि कई महीनों से उसकी कोख में पल रहे बच्चे को सिर्फ इसलिए मार दिया जाए कि वह लड़की है। मगर जब ससुराल वालों और पति की ओर से दबाव पड़ता है, तो वह समर्पण कर देती है। यह समर्पण उसकी मजबूरी है, अन्यथा उसे जीवन भर बेटी पैदा करने के लिए ताने सुनने पड़ते हैं। परिवार से बाहर समाज में उसकी हैसियत इसलिए दोयम दर्जे की मानी जाती है कि उसने एक या एक से ज्यादा बेटियां पैदा की हैं। यह सामाजिक दबाव सबसे पहले पति और ससुराल पक्ष के अन्य सदस्यों के जरिए उस पर आता है, जिसे देखते हुए वह राजी होती है कि ‘समय रहते’ भ्रूण के लिंग की जांच करा ली जाए। पर अफसोस की बात है कि अभी तक किए गए कानूनी प्रावधानों में परिवार की तरफ से आने वाले दबाव की अनदेखी की गई।

इसकी एक और बड़ी वजह कानून पर सख्ती के अमल का अभाव है। आंकड़े बताते हैं कि देश में लाखों बेटियों की बलि चढ़ने के बाद गर्भ में लिंग परीक्षण के दोषियों को सजा देने की शुरुआत पिछले चार-पांच वर्षों में ही हुई है। अनुमान है कि अब तक इस अपराध के लिए करीब ढाई-तीन सौ लोगों को जेल भेजा जा चुका है। इन सजाओं के बाद उम्मीद की गई है कि इससे हमारा समाज कुछ सबक लेगा और लैंगिक अनुपात में आते भयावह अंतर पर रोक लग सकेगी। लेकिन पकड़ में आने वाले मामले इतने कम हैं कि इसमें शायद ही कोई कमी आए।

अगर कन्या भ्रूण हत्या के आंकड़े में सतत बढ़ोतरी हो रही है, तो इसकी मुख्य वजह संबंधित लोगों का पकड़ा नहीं जाना, सबूतों का अभाव होना, न्यूनतम खतरे के साथ अत्यधिक लाभ की संभावना होना और दोनों पक्षों (भ्रूण की जांच कराने आए अभिभावक और चिकित्सा तंत्र) की मिलीभगत होना है। खासकर संपन्नता और बेटियों की गुमशुदगी के बीच बन गया प्रतिकूल रिश्ता बेहद चिंताजनक है। अगर सरकार कभी यह निष्पक्ष सर्वेक्षण कराए कि देश में डॉक्टरों, इंजीनियरों और वैज्ञानिकों के घरों में पिछले एक दशक में कितने बेटों या बेटियों ने जन्म लिया है, तो यह साफ पता चल जाएगा कि कथित तौर पर पढ़े-लिखे और संपन्न समाज ने बेटियों से तकरीबन छुटकारा पा लिया है और उनकी जगह सिर्फ बेटे पैदा किए जा रहे हैं।

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