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वक्त की नब्ज: जो उनके साथ हुआ…

जो उनके साथ हुआ, होना नहीं चाहिए था। आजकल आर्थिक विभागों के अफसर टीवी पत्रकारों को बहुत अच्छी तरह इस्तेमाल करना सीख गए हैं, सो अदालत में बेगुनाह साबित हों न हों चिदंबरम, मीडिया की अदालत में दोषी अभी से पाए गए हैं।

Author Published on: August 25, 2019 4:59 AM
(फोटोः पीटीआई)

शुरू में ही स्पष्ट करना जरूरी समझती हूं कि चिदंबरम साहब के लिए मेरे दिल में जरा भी हमदर्दी नहीं है। बहुत ध्यान से मैंने उनकी गिरफ्तारी को पल-पल देखा पिछले हफ्ते। देखा गौर से कि किस तरह इस पूर्व वित्तमंत्री के अपने विभाग के अफसरों ने उनको बेइज्जत किया सरेआम। यह देख कर गुस्सा आया, बुरा लगा, लेकिन सहानुभूति का अहसास नहीं हुआ मुझे। इसलिए कि जब चिदंबरम वित्तमंत्री थे, उनके आदेश पर तकरीबन इसी तरह की बेइज्जती मुझे सहनी पड़ी थी।

हुआ यह कि मैं एक दोस्त के समंदर तटीय मकान में ठहरी हुई थी। शनिवार का दिन था और हफ्ते भर की थकान मिटाने के लिए मैं आराम कर रही थी टीवी के सामने लेट कर। अचानक हल्ला-सा हुआ और जिस छोटे से कमरे में मैं लेटी हुई थी, उसमें अनजान लोगों की एक फौज ऐसे आ टपकी जैसे डाका डालने आई हो। ‘भारत सरकार, भारत सरकार’ चिल्लाते हुए आए वे लोग बोले- ‘आपको फौरन नीचे चलना होगा हमारे साथ।’ ज्यादा देर नहीं लगी समझने में कि डाका डालने नहीं, छापा मारने आई थी वह फौज।

नीचे गई, तो देखा कि कोई तीस लोगों की टुकड़ी बरामदे में मौजूद थी। उनकी पहली कोशिश थी मुझे डराने की। मुझे डराना आसान नहीं है, सो जितनी ऊंची आवाज में वे चिल्लाए, उससे ज्यादा ऊंची आवाज में मैं चिल्लाई। चिल्लाना, धमकाना जब थोड़ा कम हुआ, तो मैंने उनको बताया कि घर के मालिक विदेश में हैं और मैं सिर्फ मेहमान हूं। कोई फर्क नहीं पड़ा। घर के कोने-कोने की तलाशी ली गई और मेरे जेवर तक गिने और तोले गए। जब इस घर में उनको वह नहीं मिला, जिसकी उनको तलाश थी, तो थोड़े शांत हुए वे लोग, लेकिन तब तक आधी रात हो गई थी।

मेरे साथ जो हुआ था उस दिन, बिलकुल उसी किस्म की ‘रेड’ लाखों आम लोगों को बर्दाश्त करनी पड़ती है अपने इस देश में। सो, जब किसी बड़े राजनेता के साथ ऐसा होता है तो उसके साथ हमदर्दी कैसे रखी जाए? आर्थिक अपराध करने का जिन पर शक होता है उनके साथ ऐसा व्यवहार किया जाता है, जो शायद हत्यारों और चोरों के साथ भी नहीं होता होगा। असली अपराधियों को बेगुनाह माना जाता है, जब तक जुर्म साबित न हो उनका, लेकिन जब इस तरह की रेड करने आते हैं एन्फोर्समेंट डायरेक्टरेट या सीबीआइ के अफसर, तो समय ही नहीं देते हैं किसी को अपनी बेगुनाही साबित करने का।

पूछताछ करने के तरीके इतने गलत हैं भारत सरकार के आर्थिक विभागों के अफसरों के कि दिल्ली के लोकनायक भवन से एक सिख व्यापारी ने पूछताछ के दौरान खिड़की से कूद कर जान दे दी थी। यह उस समय की बात है, जब मनमोहन सिंह वित्तमंत्री थे। याद है मुझे कि मैंने उनसे इस हादसे के बारे में बात भी की थी और उन्होंने आश्वासन दिया था कि वे कुछ करेंगे अपने अफसरों को नियंत्रित करने के लिए, लेकिन तीस साल गुजर गए हैं और कोई परिवर्तन नहीं आया है।

परिवर्तन कैसे आएगा बिना राजनेताओं की मर्जी के! और राजनेता हमारे जानते हैं कि इन चीजों में परिवर्तन ज्यादा आ गया तो अपने राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ उनके पास यह सबसे बड़ा हथियार कमजोर हो जाएगा। पिछले हफ्ते गिरफ्तार होने से पहले चिदंबरम ने कांग्रेस पार्टी के मुख्यालय में दर्द भरा भाषण दिया, जिसमें उन्होंने कहा कि लोकतंत्र का आधार है स्वतंत्रता और अगर उनको जिंदगी और स्वतंत्रता के बीच चुनना हो तो वे स्वतंत्रता चुनेंगे हमेशा। उनकी स्वतंत्रता की जब बात आती है तो हमारे राजनेताओं को बहुत तकलीफ होती है, लेकिन हमारी स्वतंत्रता के बारे में कम ही सोचते हैं। सोचे होते तो चिदंबरम अपने मंत्रालय के अफसरों को नियंत्रण में ला सकते थे जब वित्तमंत्री थे। ऐसा न उन्होंने किया कभी और न किसी दूसरे वित्तमंत्री ने। मोदी सरकार में आज अगर आला पदों पर लोग हैं, जो चिदंबरम के हाल पर हंस रहे हैं तो उनको थोड़ा रुक कर सोचना चाहिए। कल उनके साथ भी ऐसा हो सकता है।

नरेंद्र मोदी की काले धन की खोज ने आर्थिक विभागों के अफसरों की ताकत इतनी बढ़ा दी है कि टैक्स अधिकारियों को गिरफ्तार करने का हक मिल गया है काला धन ढूंढ़ने के बहाने। थोड़ा सोच-विचार करने के बाद ऐसा अधिकार दिया गया होता तो शायद दिया न जाता, इसलिए कि काला धन ढूंढ़ने वाले ये अफसर अपना निजी फायदा देख कर काम करते हैं। सो, जहां रिश्वत नहीं मिलने की संभावना होती है वहां काला धन मिल जाता है और कार्रवाही शुरू हो जाती है, ऐसे लोगों के खिलाफ जो रिश्वत देने की क्षमता नहीं रखते।

इस तरह का अन्याय जब किसी आम नागरिक के साथ होता है तो न सिर्फ उसका कारोबार खत्म हो जाता है, बल्कि उसका जीवन भी तकरीबन खत्म हो जाता है। अदालतों तक जाने की क्षमता बहुत कम भारतीयों के पास होती है, सो चुप करके सहने पर मजबूर हैं सरकारी अफसरों का हर अन्याय। उनकी स्वतंत्रता के बारे में सोचा होता कभी चिदंबरम ने जब वित्तमंत्री थे, तो आज शायद उनके हाल पर हमको तरस आता।

जो उनके साथ हुआ, होना नहीं चाहिए था। आजकल आर्थिक विभागों के अफसर टीवी पत्रकारों को बहुत अच्छी तरह इस्तेमाल करना सीख गए हैं, सो अदालत में बेगुनाह साबित हों न हों चिदंबरम, मीडिया की अदालत में दोषी अभी से पाए गए हैं। इस तरह की मीडिया अदालतें अब आम हो चुकी हैं। चिदंबरम के पास अब समय है इन चीजों के बारे में सोचने का, लेकिन इन चीजों के बारे में वर्तमान वित्तमंत्री को भी सोचना चाहिए ध्यान से।
जो उनके साथ हुआ, होना नहीं चाहिए था। आजकल आर्थिक विभागों के अफसर टीवी पत्रकारों को बहुत अच्छी तरह इस्तेमाल करना सीख गए हैं, सो अदालत में बेगुनाह साबित हों न हों चिदंबरम, मीडिया की अदालत में दोषी अभी से पाए गए हैं।

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