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वक़्त की नब्ज़: समस्याएं और भी हैं

इस कानून ने हमारी अंदरूनी समस्याएं भी बढ़ा दी हैं। संसद में गृहमंत्री ने कई बार कहा कि इस कानून का भारत के मुसलिम नागरिकों से कोई वास्ता नहीं है, लेकिन मुसलमानों में डर का माहौल बना हुआ है, खासकर गरीब मुसलमानों में।

PM Modiप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (फोटो सोर्स: PTI)

तवलीन सिंह

इस हफ्ते मेरा पक्का इरादा था नरेंद्र मोदी के दूसरे शासनकाल के बारे में कुछ अच्छा लिखने का। इस नेक इरादे को अमल में लाने के लिए मैं भारत सरकार के एक आला अधिकारी से मिलने गई, यह जानने के लिए कि प्रधानमंत्री का जल शक्ति मिशन कहां तक सफल हुआ है। इस नए मिशन का लक्ष्य है 2024 तक ग्रामीण भारत के हर घर तक पानी पहुंचाने का। फिलहाल हमारे देहाती भाई-बहन जीवन की इस सबसे जरूरी चीज से इतने वंचित हैं कि अनुमान लगाया जाता है कि सिर्फ अठारह फीसद ग्रामीण घरों में जल नल से आता है। आला अधिकारी के साथ बातचीत चल ही रही थी कि असम और त्रिपुरा से हिंसा की खबरें आने लगीं। घर पहुंची और टीवी लगाया तो ऐसे दृश्य देखने को मिले, जिन्होंने असम की पुरानी, डरावनी यादें ताजा कर डालीं।

नेली जनसंहार के दृश्य आंखों के सामने घूमने लगे। खेतों में बिछीं लाशों की वे कतारें और उन कतारों में छोटे बच्चों की नन्ही लाशें, जैसे शिकार के बाद जानवरों की लाशें बिछाई जाती हैं। 18 फरवरी, 1983 के दिन हुआ था यह कत्लेआम, जिसमें सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2191 लोग मारे गए थे, लेकिन जिन चौदह गांवों में यह रक्तपात हुआ था, उनका अनुमान है कि मौतों की संख्या तीन हजार से दस हजार तक जाती है। मरने वालों में बंगाली मुसलिम और हिंदू दोनों थे। उनके घर जलाए गए थे, उनकी संपत्ति लूटी गई और उसके बाद लंबे समय तक असम में अशांति रही।

असम आंदोलन चला तब तक, जब तक राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद असम समझौता करके लोगों के आक्रोश को शांत नहीं किया। तबसे लेकर पिछले हफ्ते तक शांति रही है असम में, बावजूद इसके कि हाल में वहां नागरिकता सिद्ध करने के लिए मोदी सरकर ने मुहिम चलाई है, जिसके तहत उन्नीस लाख विदेशी पाए गए हैं। इनमें ग्यारह लाख हिंदू निकले। कई राजनीतिक पंडित मानते हैं कि यही मुख्य वजह रही है नागरिकता कानून में इस संशोधन को इतनी जल्दी लाने की।

मगर ऐसा लगता है कि गृहमंत्री जी ने असम के इतिहास को भुला कर कदम उठाया है, वरना इतनी जल्दबाजी नहीं करते। असम में स्थिति इतनी गंभीर हो गई थी नागरिकता संशोधन विधेयक पारित होने के बाद कि सेना को तैनात करना पड़ा। त्रिपुरा में भी हिंसक भीड़ें सड़कों पर उतर आर्इं। कानून तो बन गया है अब, लेकिन असम और त्रिपुरा के लोगों को आश्वस्त कैसे करेगी सरकर कि लाखों बंगाली हिंदुओं और चकमाओं के आने से उनकी सभ्यता, संस्कृति, भाषा और उनके रोजगार को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है? प्रधानमंत्री झारखंड में चुनाव प्रचार में व्यस्त थे पिछले सप्ताह, लेकिन स्थिति इतनी गंभीर हो गई थी कि उनको एक आमसभा को संबोधित करते हुए पूर्वोत्तर के लोगों को कहना पड़ा कि ‘आप अपने इस मोदी पर भरोसा कीजिए।’

सच पूछिए तो इस नागरिकता कानून की प्राथमिकता मैं अभी तक समझ नहीं पाई हूं। माना कि मोदी सरकर का दिल इतना बड़ा है कि चिंता रहती है आसपास के इस्लामी देशों में रहने वाले हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध और इसाई लोगों की। मगर क्या इस कानून को प्राथमिकता मिलनी चाहिए या भारत की बिगड़ती अर्थव्यवस्था को? मोदी के दूसरे दौर में मंदी ऐसी छाई रही है कि अब आम आदमी को भी चुभने लगी है। रोजमर्रा की चीजों के दाम इतने बढ़ गए हैं कि आम लोग बाजारों में सब्जियों के दाम देख कर हैरान रह जाते हैं। प्याज इतने महंगे हो गए हैं कि उनका आयात मिस्र से करना पड़ा।

मुंबई में हाल यह है कि बड़ी-बड़ी कंपनियां बंद हो रही हैं। जिनकी क्षमता अभी तक है निवेश करने की, वे भी निवेश करने से डरते हैं अस्थिरता के कारण। इसका सीधा परिणाम यह है कि रोजगार के नए अवसर पैदा नहीं हो रहे हैं। महाराष्ट्र में अगर मोदी मंत्र जपने के बाद भी भारतीय जनता पार्टी बहुमत नहीं हासिल कर पाई थी विधानसभा चुनावों में, तो इसका एक मुख्य कारण यह था कि आम लोगों को वाहन उद्योग में हजारों नौकरियां जाने से खासी चिंता होने लगी थी।

ऊपर से मोदी की समस्या यह भी है कि नागरिकता कानून के कारण उनकी छवि पर दुनिया की नजरों में दाग लग गया है। पिछले हफ्ते संयुक्त राष्ट्र के एक प्रवक्ता ने पत्रकारों से कहा कि इस कानून का विश्लेषण उनकी मानवाधिकार संस्थाएं कर रही हैं इस नजरिए से कि क्या यह मुसलमानों के साथ भविष्य में अन्याय का आधार तो नहीं बन सकता है। यह बात इस प्रवक्ता की पूरी ही हुई थी कि इमरान खान का बयान आया कि इस कानून से नाजी दौर की बदबू आती है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने खतरे की घंटी क्या बजाई कि बांग्लादेश के दो मंत्रियों ने भारत के अपने दौरे रद्द कर दिए, इसी नागरिकता कानून का हवाला देकर।

इस कानून ने हमारी अंदरूनी समस्याएं भी बढ़ा दी हैं। संसद में गृहमंत्री ने कई बार कहा कि इस कानून का भारत के मुसलिम नागरिकों से कोई वास्ता नहीं है, लेकिन मुसलमानों में डर का माहौल बना हुआ है, खासकर गरीब मुसलमानों में। यह इसलिए कि गृहमंत्री ने स्पष्ट कर दिया है कई बार कि देश भर में नागरिकता साबित करने की मुहिम चलने वाली है, जिसमें हर नागरिक को अपनी नागरिकता का सबूत देना अनिवार्य होगा। सवाल है कि इस मुहिम से हासिल क्या होगा? भारत की समस्याएं और भी हैं प्रधानमंत्री जी, जिनका समाधान ढूंढ़ना ज्यादा जरूरी है।

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