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वक्त़ की नब्ज़: असल समस्या है जिहादी आतंकवाद

इस सोच से जब तक पाकिस्तान के शासक प्रभावित रहते हैं, तब तक अमन-शांति की बातें कैसे हो सकती हैं हमारे काफिर देश के साथ? हमारे बीच समस्या कश्मीर नहीं है। समस्या है जिहादी आतंकवाद, जिसका काला साया फिर से मंडरा रहा है।

Author Published on: September 15, 2019 1:44 AM
लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी) के आतंकवादियों के घुसपैठ की आशंका (फोटो सोर्स: इंडियन एक्सप्रेस)

पिछले हफ्ते दुनिया ने एक बार फिर उनको याद किया जो 9/11 वाले जिहादी हमले में न्यूयार्क और वॉशिंगटन में मारे गए थे। इतने डरावने थे इस हमले के दृश्य कि अठारह साल बाद भी आंखों के सामने घूमने लगते हैं जब भी 9/11 की याद आती है। अमेरिका पर यह सबसे बड़ा जिहादी हमला था। तो, स्मृति सभा में हमेशा शामिल होते हैं राष्ट्रपति और अन्य बड़ी हस्तियां। अमेरिकी मीडिया हर साल दिखाती है न्यूयार्क में उन आसमान को छूती इमारतों का ध्वस्त होना और लोगों का ऊंची मंजिलों से गिरना। इस हमले के बाद दुनिया बदल गई थी। इसको याद क्यों न किया जाए हर साल। मुझे शिकायत सिर्फ यह है कि जिस जिहादी सोच के कारण यह हमला हुआ था, उसको याद क्यों नहीं कर रही है दुनिया? क्यों नहीं डोनाल्ड ट्रंप को याद आया, जब इमरान खान से मिले थे दो महीने पहले कि यह उसी देश के प्रधानमंत्री हैं, जो केंद्र है जिहादी सोच का? याद आई होती यह बात तो शायद इतने प्यार से न कहते इमरान खान को कि कश्मीर समस्या का हल ढूंढ़ने में वे मदद करने को तैयार हैं।

विदेशी राजनीतिक समस्याओं की समझ कम है ट्रंप साहब को, वरना जान जाते इमरान खान से मिलने से पहले कि भारत और पाकिस्तान के बीच सबसे बड़ी समस्या जिहादी आतंकवाद है, कश्मीर नहीं। कश्मीर पर बातचीत का सिलसिला हमारे दोनों देशों के बीच चलता रहा है दशकों से, लेकिन 26/11 वाले हमले के बाद बिल्कुल रुक गया। इसलिए कि पाकिस्तान के शासकों ने अभी तक स्वीकार नहीं किया है कि इस हमले की पूरी तैयारी उनकी सर-जमीन से हुई थी। सबूत पर सबूत पेश किए जाने के बाद अभी तक नहीं स्वीकार करने को तैयार हैं कि जिन हत्यारों को मुंबई भेजा गया था उनको कदम-कदम पर हुक्म दे रहा था पाकिस्तान में कोई ऐसा व्यक्ति, जो खुद शायद पाकिस्तानी सेना का था। उनमें जो बातचीत हो रही थी, उसकी रिकॉर्डिंग सबूत के तौर पर पाकिस्तान को भेजी गई है। ऊपर से डेविड हेडली ने अमेरिका की किसी जेल से बयान दिया है कि पाकिस्तान का हाथ था इस हमले में।

जब तक पाकिस्तान के शासक स्वीकार करने को तैयार नहीं होते हैं कि लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसी जिहादी तन्जीमों को स्थापित किया है उसकी सेना ने, तब तक बातचीत का कोई फायदा नहीं है। लेकिन इमरान खान जबसे बने हैं प्रधानमंत्री, उन्होंने दुनिया के सामने अपनी छवि एक अमनपरस्त व्यक्ति की बनाने की कोशिश की है। जहां जाते हैं वहां कहते हैं दुनिया के बड़े राजनेताओं से कि उन्होंने दोस्ती का हाथ बढ़ाया है बहुत बार, लेकिन भारत ने उसको ठुकरा दिया है हमेशा। जबसे अनुछेद 370 को हटाया गया है, उन्होंने अमन-शांति की बातें छोड़ कर नरेंद्र मोदी और भारत को बदनाम करना शुरू कर दिया है। अपने हर दूसरे भाषण में कहते हैं पाकिस्तान के प्रधानमंत्री कि अमन-शांति इसलिए नहीं आ सकती है हमारे देशों के बीच, क्योंकि नरेंद्र मोदी हिटलर हैं और उनकी सोच आरएसएस की सोच से प्रभावित है, जो प्रेरणा लेती है नाजी सोच से। हिंदुत्व की तुलना करते हैं नाजी सोच के साथ, लेकिन कभी उन्होंने यह नहीं देखा कि नाजी सोच की तुलना जिहादी सोच से करते तो उनकी बातों में ज्यादा वजन होता। जिहादी इस्लाम का आधार है कि जो लोग इस्लाम को नहीं मानते, उनको मारना अल्लाह का हुकुम है। जिहादी सोच के मुताबिक हम जैसे बुतपरस्तों को मारना पाप नहीं, पुण्य है। इस सोच के मुताबिक जन्नत के दरवाजे खुल जाते हैं फौरन उन फिदाइनों के लिए, जो अपनी जान देकर हम काफिरों को मारते हैं।

यही सोच थी, जिससे प्रेरणा लेकर उन उन्नीस सउदी युवकों ने अठारह साल पहले चार विमानों को अगवा करके न्यूयार्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और वॉशिंगटन में पेंटागन के अंदर उड़ाए थे। जब अमेरिकी सरकार को जानकारी मिली कि इस पूरी साजिश को उसामा बिन लादेन ने रचा था अफगानिस्तान से, तो अफगानिस्तान में जंग शुरू हुई, जिसमें पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ से मदद जबर्दस्ती ली गई। लेकिन मुशर्रफ ने उसामा बिन लादेन और उसके साथियों को चुपके से पाकिस्तान में पनाह दी, जिसके बारे में अमेरिका को एक पूरे दशक तक खबर तक नहीं थी। खबर मिली तो बिना पाकिस्तान की इजाजत लिए अमेरिका ने उसामा को ढूंढ़ निकाला और उसको मार कर उसकी लाश को समंदर में फेंक दिया था।

ऐसा होने के बाद लेकिन जिहादी सोच का खात्मा नहीं हुआ। उस सोच को अपना दीन बना कर आइएसआइएस ने इराक में अपनी खिलाफत बनाई 2014 में। ऐसी खिलाफत थी यह कि औरतों को गोली मार दिया जाता था अगर उन्होंने बेनकाब घर से बाहर निकलने की कोशिश की। ऐसी खिलाफत थी यह, जहां यजीदी औरतों और बच्चियों को गुलाम बना कर बाजारों में बेचा गया, क्योंकि जिहादी सोच कहता है कि काफिर औरतों के साथ कुछ भी किया जा सकता है। माना कि अभी तक पाकिस्तान में इस तरह की चीजें नहीं शुरू हुई हैं, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए हमें कि आसिया बीबी को एक दशक जेल में सड़ना पड़ा, सिर्फ इसलिए कि गांव की कुछ औरतों ने शिकायत की थी कि इस इसाई औरत ने इस्लाम के रसूल के खिलाफ गुस्ताखी की थी। इमरान खान ऐसी जिहादी सोच को आज के दौर की नाजी सोच मानें या न मानें, पूरी दुनिया मानती है। इस सोच से जब तक पाकिस्तान के शासक प्रभावित रहते हैं, तब तक अमन-शांति की बातें कैसे हो सकती हैं हमारे काफिर देश के साथ? हमारे बीच समस्या कश्मीर नहीं है। समस्या है जिहादी आतंकवाद, जिसका काला साया फिर से मंडरा रहा है।

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