ताज़ा खबर
 

वक़्त की नब्ज़: फीकी पड़ती चमक

जो लोग अवैध तरीके से भारत में आते हैं, वे अक्सर बदकिस्मत, बेरोजगार, गरीब होते हैं। वरना कोई नहीं छोड़ कर जाता है अपना देश। उनको दीमक कहना गलत था तो और भी गलत था ऐसा कानून पारित करवाना, जिसमें भारत के इतिहास में एक खास कौम को बाहर रखा गया उसके दायरे से।

narendra modiपीएम नरेंद्र मोदी (पीटीआई फोटो)

जब केवल साल नहीं पूरा दशक बदलता है तो एक अजीब माहौल बन जाता है, जिसमें मायूसी और उम्मीद का संगम-सा हो जाता है। 2019 के आखिरी दिन इतने बुरे रहे हैं भारत के लिए कि मायूसी ज्यादा है और आशा कम। निजी तौर पर मुझे मायूसी ज्यादा महसूस हुई है। इसलिए कि पत्रकारिता की लंबी यात्रा में मैंने पहली बार किसी प्रधानमंत्री का खुल कर समर्थन किया है तो नरेंद्र मोदी का और अब ऐसे लगने लगा है कि जिनका समर्थन मैंने किया था, वे कहीं खो गए हैं और उनकी जगह किसी दूसरे व्यक्ति ने ले ली है।

जिनका मैंने 2013 से समर्थन करना शुरू किया था, उन्होंने भारत के लोगों को एक ऐसा सपना दिखाया था, जिससे मेरे जैसे लोगों को विश्वास हुआ कि भारत को आखिर में एक ऐसा प्रधानमंत्री मिला है जो इस देश को गरीबी और लाचारी की बेड़ियों से निकाल कर उस जगह पहुंचाएगा जो भारत के लिए होनी चाहिए विश्व में। उस जगह पर, जहां भारत कभी हुआ करता था। हाल में अंग्रेजी लेखक विलियम डेलरिंपल ने ‘एक्स्प्रेस अड्डा’ में कहा था कि उनकी नजरों में भारत का दुनिया पर सबसे महत्त्वपूर्ण असर सन 400 से लेकर सन 1200 तक रहा था। यह वह दौर था जब दक्षिण-पूर्वी देशों में संस्कृत फैल गई थी, जब रामायण की कहानी अंगकोरवाट की दीवारों के पत्थरों पर तराशी गई थी। जब थाइलैंड के राजा अपने आपको राम कहने लग गए थे और जब चीन से ह्वेनसांग भारत आए थे यह कह कर कि दुनिया में सबसे ज्यादा असरदार देश भारत है। अब दक्षिण-पूर्व के तकरीबन सारे देश हमसे आगे निकल गए हैं।

मोदी ने जब पहले कदम रखे थे राष्ट्रीय राजनीतिक रंगमंच पर तो उन्होंने ऐसी बातें कही थीं जिनसे करोड़ों भारतीयों के दिलों में एक नई आशा पैदा हो गई थी। याद कीजिए उनके वे पुराने भाषण जिनमें वे कहते थे कि देश को एक नई आर्थिक दिशा में ले जाने की जरूरत है, जिसका लक्ष्य गरीबी हटाना ही नहीं, संपन्नता होना चाहिए। मेरे लिए उनकी यह बात खास महत्त्व रखती थी, क्योंकि मुझे यकीन है कि भारत गरीब देश है सत्तर वर्षों की स्वतंत्रता के बाद भी तो सिर्फ इसलिए कि हमारी आर्थिक नीतियां गलत रही हैं। समाजवाद के नाम पर धनवान बने हैं सिर्फ हमारे शासक और उनके दोस्त। ऊपर से समाजवादी देशों में जो अच्छी बातें हैं, यानी बेहतरीन शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, बेहतरीन अन्य आम सुविधाएं- उनसे भी वंचित रखा गया है आम भारतीय को। इसलिए मोदी जब कहते थे कि उनको भारत के गरीब देशों की श्रेणी में होने का कोई कारण नहीं दिखता है, तो मेरा उनमें विश्वास बढ़ता गया। अफसोस कि राहुल गांधी के ‘सूट-बूट सरकार’ के भद्दे ताने के बाद मोदी खुद समाजवादी बन गए।

अपने पहले कार्यकाल में मोदी ने ‘मनरेगा’ जैसी समाजवादी योजनाओं को कुशल बनाने का काम किया, लेकिन रोजगार पैदा करने पर ध्यान नहीं दिया। कम से कम उन्होंने ‘उज्ज्वला’ और ‘स्वच्छ भारत’ योजनाएं शुरू कीं, जिनसे ग्रामीण भारत में बहुत परिवर्तन आया है। यही कारण था कि देश के मतदाताओं ने उनको दूसरी बार प्रधानमंत्री बनाया, लेकिन यह संदेश उन तक पहुंचा नहीं। जो संदेश उन तक पहुंचा वह यह था कि उनको दोबारा मौका दिया गया है सिर्फ भारत को एक हिंदू राष्ट्र में परिवर्तित करने के लिए। इसलिए उनके दूसरे कार्यकाल के शुरू होते ही ऐसे कदम उठाय गए हैं जिनसे मुसलमानों में खौफ का माहौल पैदा हुआ है। मैं धारा 370 के हटाए जाने का समर्थन करती हूं, लेकिन जब इसको हथियार बनाया गया चुनावों में तो मुझे शक होने लगा कि यह कश्मीर की तरक्की के लिए नहीं किया गया, मकसद शायद कुछ और था।

इससे भी ज्यादा चिंता होने लगी मुझे जब देश के गृह मंत्री ने मुसलिम घुसपैठियों के लिए दीमक शब्द इस्तेमाल करना शुरू कर दिया अपने हर दूसरे भाषण में। जो लोग अवैध तरीके से भारत में आते हैं, वे अक्सर बदकिस्मत, बेरोजगार, गरीब होते हैं। वरना कोई नहीं छोड़ कर जाता है अपना देश। उनको दीमक कहना गलत था तो और भी गलत था ऐसा कानून पारित करवाना, जिसमें भारत के इतिहास में पहली बार एक खास कौम को बाहर रखा गया उसके दायरे से।

गृह मंत्री ने अपने हर भाषण में स्पष्ट किया कि हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध और पारसी शरणार्थियों को कोई चिंता नहीं होनी चाहिए। इसलिए संदेश हमारे मुसलिम नागरिकों को गया कि नागरिकता सिर्फ उनकी खतरे में आ सकती है। इसलिए देश भर में मुसलमान और अन्य लोग उतर आए सड़कों पर और विद्यार्थी निकल कर आए विरोध जताने विश्वविद्यालयों में। इतनी अराजकता और अशांति फैली है पिछले दिनों से कि दुनिया में मोदी की छवि खराब हुई है और देश की भी। आखिर में प्रधानमंत्री ने रामलीला मैदान में लंबा भाषण देकर मुसलमानों को आश्वस्त करने के कोशिश की कि उनकी नागरिकता को कोई खतरा नहीं है, लेकिन अगले ही दिन फिर से उनके गृह मंत्री ने भड़काऊ भाषण देना शुरू कर दिया। कहा ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ को हम दंडित करेंगे। क्या इस तरह की भाषा इतने बड़े देश के गृह मंत्री की होनी चाहिए? इतनी अशांति है देश में अब कि ऐसा लगने लगा है कि एक दशक और भारत खो देगा ऐसी चीजों में उलझ कर जो उसकी प्रगति को हमेशा रोकती आई हैं। सत्तर का दशक गया आपातकाल से जूझते, अस्सी का दशक गया पंजाब और कश्मीर में अलगाववादी मुहिमों से लड़ने में, नब्बे के दशक में थोड़ी चैन-शांति रही आर्थिक सुधारों के कारण। लेकिन गलत आर्थिक और राजनीतिक नीतियों का इतिहास लंबा है। क्या और भी लंबा होगा?

Next Stories
1 दूसरी नज़र: दबंगई रोकने की कोशिश
2 बाखबर: एक गुस्सा बिखरता हुआ
3 तीरंदाज: जय और पराजय
ये पढ़ा क्या?
X