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वक्त की नब्ज़: भारत की तरक्की से घबराता है पाकिस्तान

जब तक निजी निवेशक अर्थव्यवस्था में फिर से निवेश करना शुरू नहीं करेंगे, तब तक मंदी के बादल मंडराते रहेंगे मुंबई के आसमानों में। भारत के लिए इन बादलों का खतरा उतना ही है, जितना युद्ध के बादलों का खतरा।

Author Published on: August 18, 2019 1:26 AM
इमरान खान। फोटो: सोशल मीडिया

कहने को तो पाकिस्तान के साथ हमारी एक ही समस्या है और वह है कश्मीर। पिछले दिनों अगर आपने इमरान खान की तकरीरें सुनी होतीं या उनके ट्वीट पढ़े होते, तो आपको यकीन हो गया होता कि कश्मीर की समस्या न होती तो हमारे दोनों देशों के बीच दोस्ती ही दोस्ती होती। ऐसा बिल्कुल नहीं है। कश्मीर का मसला न भी होता तो दुश्मनी रहती हमारे बीच। इसलिए कि पाकिस्तान के जरनैलों के गले नहीं उतरता कि भारत उनके देश से आर्थिक तौर पर आगे निकल गया है, जबकि कभी पाकिस्तान हमसे कहीं ज्यादा आगे था।

याद है मुझे, जब पहली बार लाहौर गई थी 1980 में तो हैरान रह गई थी पाकिस्तान की तरक्की देख कर। सीमा के इस पार समाजवादी दौर उरूज पर था। सो, हमारी टूटी, पुरानी सड़कों पर चला करती थीं वे टूटी, पुरानी गाड़ियां, जो अब दिखती भी नहीं हैं। लाहौर की शानदार, आधुनिक सड़कों पर चलती थीं आलीशान विदेशी गाड़ियां, इसलिए कि पाकिस्तान के सैनिक शासक अयूब खान ने दूसरा आर्थिक रास्ता लिया था हमसे, जिसमें विदेशी निवेशकों का स्वागत था और निजी निवेशकों का भी। उस समय भारत की बागडोर पूरी तरह सरकारी अधिकारियों के हाथ में थी, सो दिल्ली की पहचान थी सरकारी दफ्तर और अफसरशाही। उधर लाहौर की पहचान थी एक अमीर, सभ्य, सुंदर पंजाबी शहर की। यहां तक कि लाहौर का एयरपोर्ट भी दिल्ली के एयरपोर्ट से कहीं ज्यादा आधुनिक था उन दिनों। सो, मुझे ऐसा लगा कि मैं किसी विकसित देश में आ पहुंची हूं किसी अति-पिछड़े देश से।

फिर दौर ऐसा बदला कि जब हमारी क्रिकेट टीम पाकिस्तान के दौरे पर गई थी 2003-04 में, तो यहां से हजारों क्रिकेट प्रेमी भी गए, जिनमें थे कई बड़े उद्योगपति, जो अपने निजी विमानों में गए। मेरी एक पाकिस्तानी दोस्त ने बाद में बताया कि जब ये निजी विमान उतरे लाहौर के हवाई अड्डे पर, तो उनको पहली बार अहसास हुआ कि भारत कितना आगे निकल चुका है पाकिस्तान से।

इसके बाद ही शायद पाकिस्तान के जरनैलों ने अपनी जिहादी संस्थाओं के साथ साजिश रची मुंबई पर हमला करने की। कोई इत्तेफाक नहीं था कि हाफिज सईद के जिहादी प्यादों को हुकुम था ताज होटल और ओबेराय होटल को खास निशाना बनाने का। कोई इत्तेफाक नहीं था कि उनको आदेश था कि ताज होटल में ऐसी आग लगनी चाहिए, जो दुनिया भर के लोग देख सकें टीवी पर। इस पूरे हमले का मकसद था भारत की अर्थव्यवस्था को ठप करना, ताकि विदेशी निवेशक यहां से भाग निकलें।

कहने का मतलब यह है कि पाकिस्तान के गले भारत की तरक्की कभी नहीं उतर सकती। सो, हमारा सबसे शक्तिशाली हथियार है हमारी अर्थव्यवस्था, जिसका पिछले कुछ सालों से हाल अच्छा नहीं है। मंदी के कारण कई हैं, लेकिन मेरी नजर में सबसे बड़ा कारण है काले धन की खोज, जिसके चलते आयकर अधिकारियों को ऐसे अधिकार दिए गए हैं कि वे गिरफ्तार भी कर सकते हैं उनको, जिनके पास काला धन मिलता है। मुंबई में रहती हूं, सो यकीन मानिए जब मैं कहती हूं कि ऐसा इन्स्पेक्टर राज चल रहा है अभी, जिसके चलते देसी निवेशक भी देश छोड़ कर भागने लगे हैं।

सो, जब प्रधानमंत्री ने लालकिले की प्राचीर से कहा कि हमको सम्मान करना चाहिए उन लोगों का, जो देश का धन पैदा करते हैं, मुझे बहुत अच्छा लगा। ऐसा लगा कि प्रधानमंत्री के कानों तक खबर पहुंच गई है कि देश के सबसे बड़े उद्योगपति क्यों इतने दुखी हैं कि निवेश करने से डरते हैं। खुल कर बात कह नहीं सकते अपनी, क्योंकि दीवारों के भी कान होते हैं, जब इन्स्पेक्टर राज शुरू हो जाता है। चुप रहना पसंद करते हैं, इसलिए कि जानते हैं कि उनकी बातें अगर किसी टैक्स अधिकारी तक पहुंच जाती हैं, तो उनको निजी तौर पर खतरा है। जानते हैं कि ये लोग इतना तंग कर सकते हैं उनको कि बिजनेस करना मुश्किल हो जाता है। कैफे कॉफी डे के मालिक की आत्महत्या के बाद मुंबई में माहौल बद से बदतर हो गया है। सो, बहुत अच्छी बात है कि प्रधानमंत्री नया संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं अब।

चुनाव के बाद उन्होंने अपना पहला इंटरव्यू इकोनॉमिक टाइम्स को दिया, जिसमें उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था में निजी निवेशकों को विश्वास रखना चाहिए। उनको यह भी कहा है कि उनकी सरकार की तरफ से कोई रुकावट नहीं पैदा होगी, उनके लिए जो ईमानदारी से कारोबार चला रहे हों। समस्या यह है प्रधानमंत्रीजी, कि ईमानदारी का फैसला कौन करेगा? क्या वे लोग करेंगे जो खुद रिश्वत खाने की आदत डाल चुके हैं? वे लोग करेंगे, जो जानते हैं कि किसी बड़े उद्योगपति के घर में जब छापा पड़ता है तो कुछ न कुछ तो मिल ही जाता है उन्हें, जिसको वे पैसा खाने का जरिया बना सकते हैं?

अब जब प्रधानमंत्री ने खुद संदेश दिया है कि धन पैदा करने वालों का सम्मान करना चाहिए, उम्मीद है कि यह संदेश जाएगा उन अधिकारियों को, जिन्होंने इन्स्पेक्टर राज शुरू किया है काला धन ढूंढ़ने के बहाने। जब तक निजी निवेशक अर्थव्यवस्था में फिर से निवेश करना शुरू नहीं करेंगे, तब तक मंदी के बादल मंडराते रहेंगे मुंबई के आसमानों में। भारत के लिए इन बादलों का खतरा उतना ही है, जितना युद्ध के बादलों का खतरा। दोनों किस्म के बादलों को हटाने का प्रयास करना होगा प्रधानमंत्री को, इस बात को ध्यान में रखते हुए कि पाकिस्तान को हराने के लिए हमारा सबसे बड़ा हथियार है हमारी अर्थव्यवस्था। भारत की आर्थिक कामयाबी युद्ध से भी ज्यादा डराती है पाकिस्तान के शासकों को।

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