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वक्त की नब्जः मुद्दे से अलग

समस्या यह है कि जिन सिद्धांतों को कांग्रेस पार्टी अपने बुनियादी सिद्धांत मानती आई है, उनकी तरफ न राहुल गांधी का ध्यान गया है और न उनकी बहन का। जबसे मोदी का दूसरा कार्यकाल शुरू हुआ है, उन्होंने और उनके गृहमंत्री ने साबित किया है कि उनका ‘सबका साथ, सबका विकास’ वाला नारा खोखला था।

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राहुल गांधी पिछले हफ्ते अचानक प्रकट हुए कई दिन गायब रहने के बाद। लौटते ही उन्होंने ऐसा बयान दिया टीवी पत्रकारों को, जिसने साबित कर दिया कि वे न कुछ सीखे हैं 2019 की चुनावी हार से और न ही उनमें राजनीतिक समझ आई है। ऐसा कह रही हूं ट्विटर पर उनके इस बयान को दो-तीन बार ध्यान से देखने-सुनने के बाद। बयान है : ‘भैया देखिए, यह जो पूरा तमाशा चल रहा है, यह नोटबंदी नंबर-2 है, इससे हिंदुस्तान के गरीबों को ऐसा नुकसान होने वाला है कि नोटबंदी को भूल जाएंगे वे। इससे ऐसा झटका लगने वाला है कि नोटबंदी से बड़ा झटका है। यह बेसिक आइडिया क्या है कि आप हिंदुस्तान के हर गरीब से बोलो कि भैया बताओ कि आप हिंदुस्तान के नागरिक हो कि नहीं। मगर जो उनके पंद्रह दोस्त हैं, उनको कोई डॉक्युमेंट नहीं दिखाना पड़ेगा और जो पैसा बनेगा वह पूरा का पूरा उन पंद्रह लोगों की जेब में जाएगा।’

कांग्रेस पार्टी के पूर्व (और शायद भावी) अध्यक्ष का यह बयान मैंने दो-तीन बार देखा-सुना यह समाझने की कोशिश में कि वे कह क्या रहे हैं। पूरी कोशिश करने के बाद भी उनकी बात समझ में नहीं आई। नागरिकता कानून में इस संशोधन का नोटबंदी से क्या वास्ता हो सकता है? पैसे कैसे बनेंगे इस संशोधन से? कौन हैं मोदी के ये अदृश्य पंद्रह दोस्त, जिनसे राहुल गांधी को पांच सालों से इतनी तकलीफ हो रही है? इससे भी महत्त्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या राहुलजी अभी तक सीखे नहीं हैं कि मोदी पर भ्रष्टाचार का कीचड़ उछालना बेकार है, इसलिए कि उनके आलोचक भी नहीं मानते हैं कि वे निजी तौर पर भ्रष्ट हैं।

इल्जाम उन पर लगाना चाहते हैं राहुलजी तो नागरिकता कानून में इस संशोधन को लेकर क्यों नहीं लगाते हैं, जिससे इतना खौफ फैला है आम मुसलमानों में कि सड़कों पर उतर आए हैं देश भर के बड़े शहरों में? क्या इस संधोधन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए थी, जब इतना कुछ और है करने को अच्छे दिन लाने के प्रयास में? स्वास्थ्य सेवाएं आज भी देश में इतनी बेकार हैं कि कोटा के एक अस्पताल में जहां सौ से ज्यादा नवजात बच्चे मरे हैं हाल में, उस अस्पताल के अंदर जंगली सूअर घूम रहे थे और गंदगी इतनी पाई गई है कि शर्म आनी चाहिए हमारे शासकों को। पिछले साल बिहार में मुजफ्फरपुर के अस्पताल में भी बिल्कुल इसी किस्म की घटना घटी थी और बड़े-बड़े वादे किए थे केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार लाने के। कुछ नहीं हुआ। अब इस घटना के बाद भी सियासत हो रही है, सुधार नहीं।

सुधारों की सख्त जरूरत है प्रशासन के हर क्षेत्र में, लेकिन इनका नामो-निशान तक नहीं दिखता है उन राज्यों में भी, जहां भारतीय जनता पार्टी की सरकारें हैं। कानून-व्यवस्था का इतना बुरा हाल है देश में कि जबसे प्रदर्शन शुरू हुए हैं नागरिकता कानून को लेकर अशांति और अराजकता फैलती ही गई है देश भर में। सबसे ज्यादा हिंसा और पुलिस की गोलियों से मौतें हुई हैं उत्तर प्रदेश में, जहां मुख्यमंत्री हैं योगी आदित्यनाथ, जिनको मोदी ने स्वयं चुना था 2017 के विधानसभा चुनावों के बाद। आज बड़े-बड़े विदेशी अखबारों में खबरें छप रही हैं उत्तर प्रदेश पुलिस की ज्यादतियों की। बच्चों को पकड़ कर बंद करके पीटे जाने की खबरें मिल रही हैं, बिलकुल वैसे जैसे अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद कश्मीर घाटी से खबरें मिली थीं।

रही बात कश्मीर की, तो वहां अभी तक इतनी अशांति है कि हर दूसरे-तीसरे दिन इंटरनेट बंद किया जाता है और कर्फ्यू नाफिस कर दिया जाता है। आज भी वहां के बड़े राजनेताओं को नजरबंद करके रखा गया है इस डर से कि जब बाहर आएंगे तो लोगों को भड़काने का काम करेंगे। अमन-शांति अगर होती, जैसा गृहमंत्री बार-बार कहते फिरते हैं, तो राजनेताओं को छोड़ क्यों नहीं दिया जा रहा है? नरेंद्र मोदी जब दूसरी बार प्रधानमंत्री बने थे, तो दुनिया की नजरों में इतने बड़े हीरो थे कि हाउडी मोदी जैसे कार्यक्रम किए जा सकते थे, जिनमें अमेरिका के राष्ट्रपति भी शामिल हुए।

कभी मोदी की गिनती दुनिया के सबसे महत्त्वपूर्ण राजनेताओं में हुआ करती थी। आज नहीं है, क्योंकि न देश का आर्थिक हाल बेहतर हुआ है और न राजनीतिक हाल अच्छा है। विपक्ष के पास इतने मुद्दे हैं आलोचना करने के लिए, जो उठा नहीं रही है कांग्रेस पार्टी। क्या सवाल सिर्फ नेतृत्व का है? वर्तमान स्थिति यह है कि कांग्रेस पार्टी के पास गांधी परिवार के अलावा कोई विकल्प नहीं दिख रहा है। राहुल और प्रियंका में से प्रियंका कम से कम जब किसी मुद्दे पर बोलती हैं, तो थोड़ी-बहुत समझदारी से बोलती हैं। प्रियंका के बारे में यह भी कहना गलत न होगा कि उत्तर प्रदेश में उन लोगों के साथ हमदर्दी दिखाई है, जिनके बेटे और भाई पुलिस की गोलियों से मरे हैं। बार-बार गई हैं उत्तर प्रदेश, हमदर्दी जताने।

समस्या यह है कि जिन सिद्धांतों को कांग्रेस पार्टी अपने बुनियादी सिद्धांत मानती आई है, उनकी तरफ न राहुल गांधी का ध्यान गया है और न उनकी बहन का। जबसे मोदी का दूसरा कार्यकाल शुरू हुआ है, उन्होंने और उनके गृहमंत्री ने साबित किया है कि उनका ‘सबका साथ, सबका विकास’ वाला नारा खोखला था। यही कारण है कि देश भर में इतने लोग उतर कर आए हैं विरोध दिखाने। कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व अगर असली राजनेता के हाथों में होता, तो इस आंदोलन का नेतृत्व जरूर करता।

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