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वक़्त की नब्ज़: समर्थन का आधार

मोदी के पहले कार्यकाल में ग्रामीण भारत में काफी परिवर्तन आया है। कच्चे घर पक्के करने के लिए सरकारी मदद मिली है। घरों में बिजली के अलावा गैस सिलेंडर पहुंच गए हैं। जहां शौचालयों का सपना भी नहीं लोग देखते थे, वहां निजी शौचालय बन गए हैं।

Author July 7, 2019 2:21 AM
राहुल गांधी ने आम चुनाव के नतीजों के बाद हुई सीडब्ल्यूसी की बैठक में इस्तीफे के पेशकश की थी। (फाइल फोटोः एपी)

राहुल गांधी के त्यागपत्र ने मुझे इतना हैरान किया पिछले हफ्ते कि मैंने उसे दोबारा पढ़ा। दोबारा पढ़ने पर हैरानी और बढ़ गई। यकीन करना मुश्किल था कि एक भारतीय राजनेता को भारत के लोकतंत्र में इतना कम विश्वास हो सकता है। वह भी ऐसे शाही परिवार का वारिस, जिसने कोई पांच दशक तक राज किया है इस देश में। यकीन करना मुश्किल है कि राहुल गांधी मानते हैं कि भारत की लोकतांत्रिक संस्थाएं इतनी कमजोर कर दी हैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने पिछले पांच वर्षों में कि उन पर संघ का अब पूरा कब्जा हो गया है। सो भविष्य में चुनाव होंगे तो सिर्फ नाम के वास्ते।

जिस पत्र को उन्होंने ट्विटर पर डाला, वह अंग्रेजी में था। उसका अनुवाद करने की कोशिश नहीं मैं करूंगी। संदेश यही था कांग्रेस अध्यक्ष का कि असली चुनाव तभी हो सकते हैं जब चुनाव आयोग, मीडिया और न्यायालय सशक्त होते हैं। इतने कि चुनावी गतिविधियों पर कड़ी निगरानी रखने के काबिल हों। उनका मानना है कि इन संस्थाओं को संघ ने इतना कमजोर कर दिया है कि हाल में हुए आम चुनावों में इन संस्थाओं ने अपनी भूमिका ईमानदारी से नहीं निभाई थी। राहुल गांधी को विश्वास है कि कांग्रेस पार्टी किसी राजनीतिक दल के खिलाफ नहीं लड़ रही थी, भारत सरकार की पूरी शक्ति के खिलाफ लड़ रही थी। ऊपर से थीं वे इतनी कमजोर लोकतांत्रिक संस्थाएं कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों का होना असंभव हो गया था।

मीडिया में होने के नाते मैं विश्लेषण शुरू करती हूं मीडिया की भूमिका से। कई चुनाव देखे हैं मैंने, सो यकीन के साथ कह सकती हूं कि शायद ही कोई चुनाव रहा होगा, जिसको हम पत्रकारों ने इतना गलत समझा था। कुछ इसलिए कि हम हवा का रुख देख न सके, लेकिन ज्यादातर इसलिए कि मोदी को बहुत कम पत्रकार चाहते हैं। मैं उनके भक्तों में गिनी जाती हूं, लेकिन मैंने खुद उनको ढाई सौ से ज्यादा सीटें नहीं दीं। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, दिल्ली और मुंबई के दौरे करने के बाद। मेरे कुछ पत्रकार बंधु थे जिन्होंने एक सौ अस्सी का आंकड़ा तय कर लिया था। जो मोदी को थोड़ी उदार नजरों से देखते हैं, उन्होंने मेरी तरह ढाई सौ का आंकड़ा तय किया।

जिस शाम को नतीजे आए और मैं घर आई, एक लम्बा दिन टीवी चैनलों की चर्चा में हिस्सा लेने के बाद तभी ध्यान आया मुझे कि मैंने कोई डेढ़ सौ लोगों को इंटरव्यू किया था चुनाव अभियान शुरू होने के बाद, जिनमें से मुश्किल से बीस लोग थे, जिन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस बार मोदी को वोट नहीं देने वाले हैं। भारतीय जनता पार्टी का जिक्र तक नहीं किसी ने किया। मोदी के नाम पर वोट पड़ा, मोदी के नाम पर वोट नहीं पड़ा।

अब बात करते हैं न्यायालयों की निष्पक्षता की। यहां याद करना जरूरी है कि मोदी से हमारे न्यायाधीशों को इतना कम भय रहा है कि पिछले साल सर्वोच्च न्यायालय के जजों ने पत्रकार सम्मेलन बुला कर मोदी के खिलाफ आवाज उठाई। उनकी शिकायत थी कि मुख्य न्यायाधीश पक्षपाती दिखते हैं, पीठों के चयन में मोदी भक्ति के कारण। खुल कर शिकायत इन जजों ने तब भी नहीं की थी जब आपातकाल के समय इंदिरा गांधी ने इनको भारतवासियों के बुनियादी अधिकार निलंबित करने का आदेश दिया था। जीवन का अधिकार भी नहीं रहा था हमारे पास, पर सर्वोच्च न्यायालय के आला न्यायाधीशों ने चुपके-से प्रधानमंत्री के आदेश का पालन किया। शायद एक ही न्यायाधीश थे, जिन्होंने प्रधानमंत्री का हुक्म नहीं माना था और उनकी तरक्की रुक गई थी। रही बात चुनाव आयोग की निष्पक्षता की तो विनम्रता से अर्ज करना चाहूंगी कि मेरी राय में इस संस्था ने अपना काम पूरी ईमानदारी से किया है।

सच तो यह है कि मीडिया में खबरें देख कर राहुल गांधी के हौसले कुछ ज्यादा ही बुलंद हो गए थे। कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस अध्यक्ष को विश्वास हो गया था कि मोदी को एक सौ अस्सी सीटों से ज्यादा नहीं मिलने वाली हैं। सो, प्रधानमंत्री बनाने में कांग्रेस अहम भूमिका निभाएगी। सच तो यह है कि राहुल गांधी और उनके सलाहकारों ने इस बात पर बिल्कुल ध्यान नहीं देने की कोशिश की कि उनका चुनाव प्रचार कितना फीका था। ‘चौकीदार चोर है’ बार-बार कहने से कोई चोर नहीं बन जाता है और यही नारा था राहुल गांधी के प्रचार का मुख्य मुद्दा। मोदी का मजाक भद्दे तरीके से भी उड़ाया राहुल गांधी ने, बिना यह देखे कि वे मजाक भारत के प्रधानमंत्री का उड़ा रहे थे। मुझे गांवों में कई लोग मिले, जिन्होंने कहा कि ‘राहुल को बात करने की तमीज नहीं है।’

समस्या कांग्रेस की यह भी थी कि जनता के सामने उनके पास गांधी परिवार का तथाकथित करिश्मा और उनकी ‘कुर्बानियों’ के अलावा कुछ नहीं था। उनको शायद जानकारी नहीं थी कि देश इतना बदल गया है कि अब इन चीजों पर कोई भी वोट नहीं करता है। जो लोग कभी जाति या मजहब के नाम पर वोट डाला करते थे, वे भी बदल गए हैं अब। समझ गए हैं भारत के आम लोग कि वोट उन्हीं को देना चाहिए जो उनके जीवन को बेहतर बना सकता है।

मोदी के पहले कार्यकाल में ग्रामीण भारत में काफी परिवर्तन आया है। कच्चे घर पक्के करने के लिए सरकारी मदद मिली है। घरों में बिजली के अलावा गैस सिलेंडर पहुंच गए हैं। जहां शौचालयों का सपना भी नहीं लोग देखते थे, वहां निजी शौचालय बन गए हैं। सड़कें बनी हैं, जहां नहीं हुआ करती थीं। सो, मोदी को पांच साल और देने को लोग तैयार थे। खासकर इसलिए कि अन्य राजनीतिक दलों ने उनके सामने कोई नया सपना नहीं रखा। यह है 2019 के चुनावों का यथार्थ राहुल जी।

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