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वक्त की नब्ज: अस्त्र और ब्रह्मास्त्र

कांग्रेस पार्टी की समस्या यह है कि अभी तक वह उत्तर प्रदेश में जीतने की स्थिति में नहीं है, सो प्रियंका का ‘ब्रह्मास्त्र’ चलाया गया है, ताकि इस अति-महत्त्वपूर्ण प्रदेश में इसका असर देखने को मिले। उत्तर प्रदेश तैयार भी दिख रहा है राजनीतिक परिवर्तन के लिए।

Author January 27, 2019 3:47 AM
कांग्रेस ने प्रियंका गांधी वाड्रा को पार्टी का महासचिव बनाया है और पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी नियुक्त किया है। (एक्सप्रेस फोटो)

क्या प्रियंका गांधी कांग्रेस पार्टी के लिए ब्रह्मास्त्र का काम कर सकती हैं? क्या अब नरेंद्र मोदी का दुबारा प्रधानमंत्री बनना नामुमकिन हो गया है? सवाल हमसे पूछ रहे थे इंडिया टुडे के राहुल कंवल दावोस की एक बर्फीली सड़क के किनारे। मेरे अलावा इस छोटी, ठिठुरती भीड़ में थे कुछ राजनीतिक पंडित और कुछ उद्योगपति। मेरा जवाब था कि शायद प्रियंका का सक्रिय राजनीति में इस समय आना उनके भाई को ज्यादा नुकसान कर सकता है, मोदी को कम। राहुल गांधी अपने राजनीतिक जीवन में पहली बार अपनी पार्टी को चुनाव जिता पाए हैं, सो ‘पप्पू’ से बन गए हैं लीडर अभी। अभी तो क्या यह समय था प्रियंका को राजनीतिक बिसात पर उतारने का?

प्रियंका अपने भाई से कई चीजों में आगे हैं। करिश्मा ज्यादा है, हिंदी अच्छी बोल लेती हैं, भाषण देती हैं उनसे अच्छे, लोगों से घुलमिल लेती हैं उनसे ज्यादा और ऊपर से उनकी शक्ल मिलती है अपनी दादी से। मैं इंदिरा गांधी की मुरीद नहीं हूं, लेकिन मुझे भी स्वीकार करना पड़ेगा कि आम जनता की राय में उनकी गिनती देश के महान राजनेताओं में है। आम जनता उनको याद करती है प्यार से, क्योंकि उनको विश्वास है कि वे गरीबी हटाने का काम ईमानदारी से कर रही थीं। गरीबी हटी नहीं, तो दोष उनका नहीं, उनके अफसरों और मंत्रियों का था। प्रियंका में चूंकि इंदिरा गांधी की झलक दिखती है, उनके बारे में अक्सर लोग कहते हैं कि वे देश के किसी भी चुनाव क्षेत्र से जीत सकती हैं। याद है मुझे कि बनारस में 2014 के आम चुनावों में लोग यहां तक कहा करते थे कि मोदी को भी हरा सकती हैं। सो, इसमें दो राय नहीं कि प्रियंका का राजनीति में आना एक किस्म का ब्रह्मास्त्र है, लेकिन निशाना कहां होगा, कहना मुश्किल है।

फिलहाल यह कहना गलत न होगा कि कांग्रेस ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि उसके पास राजनीतिक हथियार एक भी नहीं है गांधी परिवार के अलावा। अगर आज यह हथियार शक्तिशाली नजर आ रहा है, तो दोष नरेंद्र मोदी का है। उन्होंने परिवर्तन और विकास लाने के अपने वादे पूरे किए होते, तो देश की आर्थिक दिशा अभी तक बदल गई होती। थकी हुई समाजवादी आर्थिक नीतियों की जगह आज होतीं ऐसी नीतियां, जिनके द्वारा पैदा हो सकते करोड़ों रोजगार के अवसर। मोदी ने प्रधानमंत्री बनते ही इशारा तो किया था कि वे देश को नई आर्थिक दिशा में ले जाना और भारत को ऐसा देश बनाना चाहते हैं, जहां से नौजवानों को पलायन करके अन्य देशों में रोजगार की तलाश में न जाना पड़े। फिर जब उन पर राहुल गांधी ने ‘सूट-बूट की सरकार’ वाला ताना कसा, तो डर कर वापस आ गए उसी आर्थिक रास्ते पर, जिस पर कांग्रेस के प्रधानमंत्री दशकों से भारत को लेते आए हैं।

मोदी का दोष नहीं है कि उनको ऐसी अर्थव्यवस्था मिली विरासत में, जिसमें सरकारी खर्चे सरकारी आमदनी से ज्यादा थे। सोनिया-मनमोहन के दौर में हुआ यह था कि समाजवाद के नाम पर बड़ी-बड़ी योजनाएं बनीं गरीबों में खैरात बांटने की। इनमें अहम थी मनरेगा, जो असली रोजगार के बदले बेरोजगारी भत्ता देने का काम करती है। इस योजना में जो हजारों करोड़ रुपए निवेश हुए हैं, अगर ग्रामीण भारत में असली रोजगार पैदा करने में लगे होते, तो शायद किसान इतने बेहाल और दुखी न होते, जो आज हैं देश भर में। मोदी ने खुद कहा था लोकसभा में अपने पहले भाषण में कि शर्म की बात है कि सत्तर वर्ष बाद कांग्रेस की आर्थिक नीतियां इतनी नाकाम रही हैं कि एक ऐसी योजना बनी है, जो लोगों को गड्ढे खोदने और फिर उनको भरने के लिए पैसा देती है। मनरेगा को समाप्त करने की लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं दिखाई।

न ही मोदी ने उस नई आर्थिक दिशा की तरफ बढ़ने की हिम्मत दिखाई है। हां इतना जरूर किया है कि कांग्रेस की खैरात बांटने वाली योजनाओं को डिजिटल बना कर भ्रष्टाचार कम किया है, लेकिन दिशा न बदलने का खमियाजा अब भुगतने लगे हैं मोदी। परिवर्तन न लाने का खमियाजा भुगतने लगे हैं और सबूत इसका था मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में कांग्रेस के हाथों हारना। कांग्रेस पार्टी के आज हौसले बुलंद हैं, तो इसलिए कि अब सर्वेक्षण भी बताने लगे हैं कि मोदी किसी भी हालत में भारतीय जनता पार्टी के लिए दुबारा पूर्ण बहुमत नहीं ला सकेंगे।

कांग्रेस पार्टी की समस्या यह है कि अभी तक वह उत्तर प्रदेश में जीतने की स्थिति में नहीं है, सो प्रियंका का ‘ब्रह्मास्त्र’ चलाया गया है, ताकि इस अति-महत्त्वपूर्ण प्रदेश में इसका असर देखने को मिले। उत्तर प्रदेश तैयार भी दिख रहा है राजनीतिक परिवर्तन के लिए। यहां योगी आदित्यनाथ ने लव जिहाद और गोरक्षा के नाम पर इतनी अराजकता फैला रखी है कि सब मानते हैं कि भारतीय जनता पार्टी का इस प्रदेश में दोबारा पचहत्तर सीटें लेना बिलकुल असंभव हो गया है।

सो, प्रियंका का ‘ब्रह्मास्त्र’ कहीं काम आएगा, तो उत्तर प्रदेश में, लेकिन आसानी से नहीं, क्योंकि यहां फिलहाल बुआ-भतीजे की ताकत ज्यादा है। इतना जरूर है कि कांग्रेस की स्थिति इस प्रदेश में थोड़ी मजबूत हो जाएगी प्रियंका के आने से। खासकर इस राज्य के पूर्वी हिस्से में। यहां कई वर्षों से कांग्रेस कार्यकर्ताओं की मांग रही है प्रियंका को राजनीति में लाने की। हर चुनाव में राय बरेली और अमेठी में पोस्टर नजर आते हैं, जिनमें बेटी प्रियंका को लाने की मांग रखी जाती है। सो, यहां कांग्रेस का परिवारवाद काम आ सकता है। लेकिन यह भी कहना जरूरी है कि इस किस्म का लोकतांत्रिक सामंतवाद भारत के लिए सिर्फ नुकसानदेह साबित हो सकता है।

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