ताज़ा खबर
 

वक़्त की नब्ज़: नफरत और हिंसा की सियासत

साध्वी प्रज्ञा की जगह लोकसभा में किसी हाल में नहीं होनी चाहिए और न भारत की राजनीति में। भारत की पुरानी परंपरा के मुताबिक साधु-साध्वियों की जगह मंदिरों में ही रही है, लेकिन मोदी के दौर में ये कुछ ज्यादा ही निकल आए हैं मंदिरों के दायरे से बाहर।

Author April 21, 2019 3:04 AM
साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर। (PTI Photo)

स्पष्ट कर दूं शुरू में ही कि मेरी राय में साध्वी प्रज्ञा जैसे लोग सनातन धर्म को बदनाम करते हैं। इसलिए कि भारत की इस महान देन को समझना इनके वश की बात ही नहीं है। जिन वेदों से यह सोच हमको विरासत में मिली है वह ऐसे ऋषियों का वरदान है, जिनकी तुलना साध्वी प्रज्ञा जैसे ‘संतों’ से करना महापाप होगा। साध्वी प्रज्ञा और योगी आदित्यनाथ जैसे कलयुग के साधुओं के लिए सनातन धर्म का मतलब सिर्फ भगवा पहन कर मुसलमानों को गालियां देने तक सीमित है। सो, मुझे बहुत तकलीफ हुई पिछले हफ्ते जब मालूम हुआ कि इस साध्वी को भारतीय जनता पार्टी ने भोपाल में दिग्विजय सिंह के खिलाफ खड़ा करने का फैसला किया है।

यहां यह कहना जरूरी है कि दिग्विजय सिंह जैसे लोगों के झूठे ‘सेक्युलरिज्म’ से ही पैदा हुए हैं हिंदुत्ववादी कट्टरपंथी। यह वही व्यक्ति है, जिसने 26/11 वाले हमले के बाद एक ऐसी किताब का समर्थन किया, जिसका शीर्षक था ‘26/11 : आरएसएस की साजिश’। किताब तो गायब हो गई छपते ही, लेकिन दिग्विजय सिंह जैसे लोगों ने 26/11 वाली घटना को लेकर शक इस हद तक पैदा किया अपने वक्तव्यों से कि मुझे जब भी पाकिस्तानी मिलते हैं, वे हमेशा पूछते हैं किसी न किसी बहाने कि क्या इस घटना को अंजाम भारत सरकार ने खुद नहीं दिया था पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी देश घोषित करवाने के लिए।
जब भी यह बात सुनती हूं किसी से, मैं उनको याद दिलाती हूं कि जिन दस जिहादी आतंकवादियों ने मुंबई में बेगुनाह लोगों को बेरहमी से मारा था उनकी आवाजें सीसीटीवी में कैद हैं और उनके पंजाबी लहजे से स्पष्ट होता है कि वे कहां से आए थे और पाकिस्तान में उनके आका कौन थे। जवाब उनका होता है कि जब भारत के वरिष्ठ राजनेता खुद शक पैदा करते हैं, तो क्यों न सवाल उठें। दिग्विजय सिंह की मैं बिलकुल प्रशंसक नहीं हूं, फिर भी चाहती हूं कि वे साध्वी को हराएं।

साध्वी प्रज्ञा की जगह लोकसभा में किसी हाल में नहीं होनी चाहिए और न भारत की राजनीति में। भारत की पुरानी परंपरा के मुताबिक साधु-साध्वियों की जगह मंदिरों में ही रही है, लेकिन मोदी के दौर में ये कुछ ज्यादा ही निकल आए हैं मंदिरों के दायरे से बाहर। इससे भारतीय जनता पार्टी की छवि बिगड़ी है और सनातन धर्म की भी। निजी तौर पर मुझे बहुत अफसोस होता है इस बात से, क्योंकि नरेंद्र मोदी का समर्थन मैंने 2014 में यह भी सोच कर किया था कि वे ऐसा हिंदुत्व लाएंगे, जो याद दिलाएगा दुनिया को कि एक ही धर्म है आज, जो किसी को नहीं कहता है कि सारे सवालों के जवाब सिर्फ हमारे पास हैं और हमारे पास ही हैं असली पैगंबर।

सनातन धर्म को कलयुग के इस दौर में अगर किसी ने पूरी तरह समझा है, तो दलाई लामा ने। उनके प्रवचन जब भी होते हैं वह यह कहना नहीं भूलते हैं कि उनकी सोच, उनका धर्म, भारत की देन है। यह भी हमेशा कहते हैं कि भारत ही दुनिया में वह देश है, जहां अलग धार्मिक सोच के लोग रह रहे हैं शांति और प्यार से। मानते हैं जरूर कि कुछ गलत लोग हैं, जो नफरत फैलाने का काम कर रहे हैं, लेकिन इनकी गिनती इतनी थोड़ी है कि इनका बोलबाला नहीं है भारत में। अब तक।

भारतीय संस्कृति धर्म-मजहब तक सीमित नहीं है। दुनिया के पहले विश्वविद्यालय भारत में बने थे। सुश्रुत जैसे महान चिकित्सिक उस समय जीवित थे जब बाकी दुनिया में चिकित्सा नाम की कोई चीज नहीं थी। नाक की प्लास्टिक सर्जरी जिस तरह वे कभी किया करते थे उसी के आधार पर आज भी होती है। गणित का ज्ञान भी इसी देश ने दुनिया को दिया, लेकिन आज हाल यह है कि भारत के बच्चों को भास्कराचार्य और आर्यभट्ट के बारे में कम मालूम है और अमेरिकी गणितज्ञों के बारे में ज्यादा। इसलिए कि अंग्रेजों के जाने के बाद हमारे शासकों ने शिक्षा में परिवर्तन लाने की कोई कोशिश नहीं की, सो अंग्रेजों की बनाई गई शिक्षा प्रणाली पर आज भी हमारे बच्चे निर्भर हैं।

मैंने जब मोदी का समर्थन किया था 2014 में, तो इस उम्मीद से कि इन चीजों में वे परिवर्तन लाकर दिखाएंगे, यानी शिक्षा प्रणाली में भारतीयता लाएंगे। मुझे बहुत अफसोस होता है यह कहते हुए कि परिवर्तन जो आया है वह उसी किस्म का, जिसके द्वारा साध्वी प्रज्ञा जैसे लोग राजनीति में आए हैं। मोदी के विरोधी कहते हैं कि उनकी मंशा शुरू से यही थी कि वे देश में हिंदुत्व लाएंगे। थोड़ा-बहुत हिंदुत्व आना स्वाभाविक था, क्योंकि झूठी सेक्युलरिज्म ने बहुत नुकसान किया कांग्रेस के दौर में। हिंदुत्व अच्छी किस्म का भी ला सकते थे, जिसके आने से भारत का भविष्य रौशन दिखने लगे।

जिस किस्म के हिंदुत्व की प्रतीक साध्वी प्रज्ञा हैं वह सिर्फ अंधेरा ला सकता है, रोशनी नहीं। इस हिंदुत्व का आधार है नफरत और हिंसा। माना कि साध्वी प्रज्ञा पर जो आतंकवाद के आरोप लगे थे वे अदालत में साबित नहीं हुए हैं। माना कि उन्होंने जेल में कई साल काटे हैं, लेकिन इसको कैसे माना जाए कि अब उनकी जगह लोकसभा में होनी चाहिए?

यह भी याद रखना जरूरी है कि साध्वी प्रज्ञा के खिलाफ अब भी अदालतों में मुकदमे चल रहे हैं और लोकसभा में वैसे भी उन लोगों की कमी नहीं है, जिन पर गंभीर आरोप लगे हुए हैं। सो, क्या जरूरत थी इनकी जमात में एक और ऐसे व्यक्ति को लेकर आने की, जिस पर आतंकवाद जैसा आरोप लगा हुआ है। भारतीय राजनीति में अभाव अगर है तो राजनेताओं का, साध्वियों और साधुओं का नहीं।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App