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वक्त की नब्ज: मुंबई हमले की बरसी पर

जब तक पाकिस्तान के प्रधानमंत्री रहेंगे जरनैलों और मौलवियों के पांव तले, तब तक शांति आने की संभावनाएं बहुत थोड़ी हैं। सो, हमारे राजनेताओं को चाहिए इस नए किस्म के युद्ध के लिए पूरी तैयारी करने की।

Author November 25, 2018 5:26 AM
26/11 ताज होटल आतंकी हमला (फाइल)

कल हम याद करेंगे उनको जो बेमौत मारे गए थे मुंबई शहर में उस जिहादी हमले में, जिसको 26/11 के नाम से जाना जाता है। याद करेंगे कल भारत भूमि पर किए गए सबसे घिनौने, दर्दनाक जिहादी हमले को, लेकिन फिर वैसे ही भूल जाएंगे जैसे हम हर साल इस हमले को एक दशक से भूलते आए हैं। हमारा भूलना शायद स्वाभाविक है, लेकिन हमारे राजनेताओं को इस हमले को कभी नहीं भूलना चाहिए, क्योंकि इस हमले के बाद पाकिस्तान के साथ हमारा रिश्ता बिल्कुल बदल गया है। इस हमले से पहले अमन-शांति का रास्ता मुश्किल जरूर था, लेकिन इतना मुश्किल नहीं जो आज हो गया है। इसलिए कि 26/11 वाले हमले ने साबित कर दिया कि पाकिस्तान और भारत के बीच मुख्य समस्या कश्मीर नहीं है।

इस हमले के बाद मालूम हुआ है कि पाकिस्तान कभी भारत की तरक्की नहीं स्वीकार कर सकता है। वह नहीं स्वीकार कर सकता है कि भारत में समस्याएं कई हैं और इनमें से कई बहुत गंभीर समस्याएं भी हैं, लेकिन इनके बावजूद यह देश चल पड़ा है एक रोशन भविष्य की तरफ। पाकिस्तान की कहानी और है। जिन सपनों को लेकर मुसलमानों के लिए भारत को तोड़ कर एक अलग इस्लामी देश बनाया गया था, वे सपने अब टूट कर मौलवियों और जरनैलों के पांव तले कुचल दिए गए हैं। इतना बुरा हाल है पाकिस्तान का कि दुनिया की नजरों में उसको एक नाकाम देश माना जाता है, एक ऐसा देश, जिसके पास परमाणु हथियार जरूर हैं, लेकिन आधुनिकता का सख्त अभाव।

इसकी मिसाल अनेक हैं, लेकिन सबसे ताजा मिसाल इमरान खान की वे तकरीरें हैं, जो उन्होंने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बनने के बाद दी हैं। करते हैं ‘नए पाकिस्तान’ बनाने की बातें, लेकिन जब इस नए पाकिस्तान का उदाहरण देते हैं, तो कहते हैं कि इस नए पाकिस्तान के लिए प्रेरणा उनको मिली है उस मदीना से, जो इस्लाम के रसूल के समय हुआ करती थी। यानी इस नए पाकिस्तान में भी हर मर्ज की दवा इस्लाम ही होगी। सो, जब उन्होंने आसिया बीबी की रिहाई का स्वागत किया अपने एक भाषण में, तो उनके पीछे पड़ गए मौलवी, जो अपने आप को इस्लाम के असली पहरेदार मानते हैं। इमरान खान के खिलाफ मोर्चे खड़े किए इन्होंने और सड़कों पर उतार लाए हजारों ‘असली’ मुसलमान, जिनकी मांग थी कि आसिया बीबी को उनके हवाले कर दिया जाए, ताकि उसको फांसी सरेआम दे सकें। यह भी कहा इन मौलवियों ने कि मदीना की बातें करने का इमरान खान को कोई हक नहीं है।

सो, एक ऐसे देश में जहां इस तरह की बातें होती हों उस देश के साथ हमारे बुतपरस्त देश का क्या रिश्ता हो सकता है? एक ऐसे देश के साथ, जिसमें हाफिज सईद जैसे दरिंदे को राजनीतिक दल बनाने का पूरा अधिकार हो, ऐसे देश से हमारा क्या रिश्ता हो सकता है। जब हम जानते हैं कि हाफिज सईद की लश्करे-तैयबा ने 26/11 की सारी साजिश रची थी। अजमल कसाब और उसके नौ साथी सिर्फ प्यादे थे, जिनको चला रहे थे पाकिस्तान में बैठे उनके आका। जब उनकी हिम्मत टूटने लगती थी, तो वहां से हाफिज सईद जैसे लोग उनको समझाते थे कि उन्हें अब रुकना नहीं चाहिए, क्योंकि उनको जल्द ही जन्नत नसीब होने वाली है।
हम यह भी जानते हैं डेविड हेडली की गिरफ्तारी के बाद कि 26/11 की साजिश में शामिल थे पाकिस्तानी सेना के आला अफसर। कहने का मतलब यह है कि 26/11 कोई मामूली जिहादी हमला नहीं था, एक नए किस्म के जंग की शुरुआत थी, नए योद्धाओं के साथ। इसका यह मतलब नहीं है कि अमन-शांति की बातचीत ही न हो पाकिस्तान के साथ। मगर जब भी हो, उसका अहम मुद्दा होना चाहिए 26/11 का हमला। कश्मीर नहीं। वरना बातचीत बेमतलब होगी। अमन-शांति के रास्ते पर चलने की पूरी कोशिश नरेंद्र मोदी ने की है। नवाज शरीफ को उन्होंने अपने शपथग्रहण समारोह में बुलाया था और वे आए भी थे, लेकिन सेना की मर्जी के बगैर। नतीजा यह हुआ कि नवाज शरीफ को राजनीतिक मैदान से पूरी तरह हटा दिया गया है आज।

जब तक पाकिस्तान के प्रधानमंत्री रहेंगे जरनैलों और मौलवियों के पांव तले, तब तक शांति आने की संभावनाएं बहुत थोड़ी हैं। सो, हमारे राजनेताओं को चाहिए इस नए किस्म के युद्ध के लिए पूरी तैयारी करने की। मुंबई में रहती हूं, सो यकीन के साथ कह सकती हूं कि इस पिछले दशक में कोई खास कदम नहीं उठाए गए हैं देश की सुरक्षा को मजबूत करने के लिए। इस महानगर में जब कोई वीआईपी आता है, तो कड़ी सुरक्षा दिखती है सड़कों पर। हथियारबंद सुरक्षाकर्मी घूमते हैं लोहे की गाड़ियों में, जो टैंकों जैसी दिखती हैं और आम नागरिकों को उन जगहों पर जाने से रोका जाता है, जहां वीआईपी ठहरते हैं। नाकाबंदी हो जाती है ओबेराय होटल और ताज होटल के आसपास और समंदर में नावों की आवाजाही भी रोक दी जाती है। मगर हम आम नागरिकों के लिए हालात वैसे ही हैं जैसे थे एक दशक पहले।

यह नहीं कह रही हूं मैं कि घंटों लग जाएंगे मानेसर से कमांडो आने में। शायद चौबीस घंटे नहीं लगेंगे, जैसे पिछली बार लगे थे। लेकिन जो प्रशिक्षण इस शहर के आम पुलिसकर्मियों को मिलना चाहिए इस नए युद्ध में लड़ने के लिए, वह अभी तक न मुंबई में शुरू हुआ है और न ही भारत के किसी दूसरे महानगर में। माना कि आत्मघाती जिहादियों को रोकना आसान नहीं है, लेकिन कम से कम उनको ढूंढ़ निकालने का प्रशिक्षण तो मिलना चाहिए देश के आम पुलिसकर्मी को। सो, कल जरूर याद करेंगे हम 26/11 को, लेकिन हमेशा की तरह परसों तक भूल जाएंगे।

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