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वक़्त की नब्ज़: उम्मीद के बरक्स

नरेंद्र मोदी से हम जैसों ने उम्मीद रखी थी कि वह इस तरह की गलत समाजवादी नीतियों को कूड़ेदान में फेंक कर एक नया आर्थिक रास्ता ढूंढ़ेंगे। अब भी वक्त है मोदीजी चल पड़िए उस नए रास्ते पर जिसका सपना आपने दिखाया था।

नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत, स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय संयोजक अश्वनी महाजन और अमेजन के मालिक जेफ बेजोस। फोटो: Indian Express

पहले सुनिए मेघना की कहानी। मेघना का जन्म मुंबई के एक फुटपाथ पर हुआ था और कोई आठ साल की थी जब मेरी उससे और उसकी छोटी बहन रज्यलक्ष्मी से मुलाकात हुई। उनकी मां कूड़ा बीना करती थी दिन भर और रात को शराब के नशे में धुत रहा करती थी। होश में जब होती थी तो मुझसे मिन्नतें किया करती थी अपनी बच्चियों को बचाने के लिए। सो, मैंने अपने एक पारसी दोस्त की मदद से दोनों को एक अच्छे प्राईवेट बाल भवन में जगह ढूंढ़ कर दाखिल करवाया। अब मेघना अठारह साल की हो गई है और एक सरकारी हॉस्टल में रहती है। पिछले हफ्ते उसने मुझे फोन करके पूछा कि क्या उसको नौकरी दिलवाने में मदद कर सकती हूं। मैंने जब पूछा कि कैसी नौकरी करना चाहती है, तो उसने कहा, ‘मैंने फैशन डिजाइनिंग का कोर्स किया है तो फैशन लाइन में जाना चाहती हूं। किसी बुटीक में क्या नौकरी दिलवा सकती हैं आप?’ बहुत दुख के साथ मुझे कहना पड़ा कि मंदी इतनी चल रही है कि नौकरियां ढूंढ़ना बहुत मुश्किल है।

जहां जाती हूं इन दिनों, मुझे मिलते हैं मेघना जैसे युवा भारतीय, जो अक्सर मेरी मदद मांगते हैं नौकरी ढूंढ़ने के लिए। ये नौजवान भारतीय शिक्षित हैं, इनके पास सेलफोन होते हैं और इनका लिबास पश्चिमी होता है। इनके माता-पिता जब इनकी उम्र के थे तो काफी होता था उनके लिए किसी अमीर घर में आया या कुक का काम करना। उनके बच्चों के सपने, उनकी आकांक्षाएं और हैं। इसलिए मुझे आश्चर्य हुआ पिछले सप्ताह, जब दुनिया का सबसे अमीर व्यक्ति भारत आया और उसका स्वागत करने के बदले उसको जलील किया भारत के व्यापार मंत्री और भारतीय जनता पार्टी के एक अधिकारी ने।

 

जब अमेजन के मालिक ने कहा कि उनका इरादा है भारत में इस साल एक अरब डॉलर का निवेश करने का, तो पीयूष गोयल ने टीवी पर जवाब दिया कि ऐसा करके जेफ बेजोस कोई ‘अहसान’ नहीं कर रहा है भारत पर। बेजोस ने अपने देश की प्रशंसा करने की कोशिश की यह कह कर कि उनकी राय में इक्कीसवीं सदी भारत की सदी होगी, तो भाजपा के एक अधिकारी ने ट्वीट करके कहा- ‘यह बात आप अपने मुलाजिमों को कहो जो मोदी सरकार के बारे में गलत खबरें छापते रहते हैं।’ बेजोस वॉशिंगटन पोस्ट अखबार के भी मालिक हैं। लगता है कि मोदी सरकर आदी हो गई है अपने देश के आला पत्रकारों से अपनी तारीफ सुनने की। और सच यह भी है कि मेरे कई पत्रकार बंधु उनकी तारीफ करते नहीं थकते हैं। यही कारण है शायद कि टीवी चर्चाएं ज्यादातर राजनीतिक और राष्ट्रवादी मुद्दों पर होती हैं, आर्थिक मुद्दों पर बहुत कम।

देश का आर्थिक हाल अब इतना बुरा है कि कुछ अर्थशास्त्री कहने लगे हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था अब आइसीयू में पहुंच गई है। मोदी का एजेंडा दुबारा प्रधानमंत्री बन जाने के बाद ज्यादातर राजनीतिक रहा है, सो बड़े-बड़े कदम उठाए गए हैं राजनीतिक तौर पर। अनुच्छेद 370 को हटा दिया गया है और नागरिकता कानून में संधोधन ऐसा लाया गया है, जिसने आम नागरिकों को सड़कों पर ला दिया है। विरोध इस संशोधन का शुरू हुआ था विश्वविद्यालयों में और शुरू में शायद सिर्फ इस संशोधन का विरोध था, लेकिन अब अगर ध्यान आकर्षित करने की तकलीफ करेंगे प्रधानमंत्री तो शायद उनको दिखेगा के देश के नौजवान मायूस हैं हर तरह से। इस मायूसी को दूर करने का एक ही रास्ता है और वह है अर्थव्यवस्था को आइसीयू से बाहर निकालना, ताकि बेरोजगारी कम होने लगे। बेजोस ने कहा है कि अमेजन द्वारा वह 2025 तक दस लाख नई नौकरियां पैदा करने का इरादा रखते हैं। ऐसे व्यक्ति को अपमानित करने के बदले बाहें खोल कर स्वागत नहीं करना चाहिए था क्या?

भारत को एक नहीं, हजारों बेजोस की जरूरत है। क्या मोदी भूल गए हैं कि किस तरह देंग श्याओ पिंग ने चीन में जब विदेशी निवेशकों के लिए दरवाजे खोले तभी जाकर उस देश में आधुनिक सड़कें, रेलवे सेवाएं, शहर और बंदरगाहों के निर्माण का काम शुरू हुआ था? एक समय था जब भारत विकास के तौर पर चीन से आगे था। अब चीन हमसे इतना आगे निकल गया है कि अमेरिका से मुकाबला कर रहा है। हम हैं कि नागरिकता जैसे मसलों में उलझ कर यह भी नहीं देख पाए हैं कि बांग्लादेश से अब हमारी सीमाएं पार करके बहुत कम ‘घुसपैठिए’ आते हैं, इसलिए कि बांग्लादेश भी हमसे आगे निकल गया है रोजगार के नए अवसर उपलब्ध कराने में और कई अन्य आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों में।

सो, प्रधानमंत्रीजी अब जब आपने हिंदुत्व का तकरीबन पूरा एजेंडा दिलवा दिया है देश को अब मेहरबानी करके जरा आर्थिक मसलों को प्राथमिकता देना शुरू कर दें। बहुत कुछ है करने को। घाटे में चल रही जितनी भी सरकारी कंपनियां हैं उनका निजीकरण शुरू करने का काम कीजिए। निजी क्षेत्र में जो बड़ी-बड़ी कंपनियां सरकारी हस्तक्षेप और गलत नीतियों के कारण कंगाल हो रही हैं, उनकी सहायता करने का प्रयास करें। निजी क्षेत्र में रोजगार देने पर जो कानूनी पाबंदियां हैं उनको हटाने का प्रयास करें। और अपने उन अधिकारियों पर लगाम लगाएं, जिनके दिमाग में अब भी लाइसेंस राज जिंदा है।

कड़वा सच यह है कि समाजवाद के नाम पर अपने इस गरीब देश में तरक्की हुई अगर किसी की तो सरकारी अफसरों और राजनेताओं की और उनके कुछ मुट्ठी भर उद्योगपति दोस्तों की। नरेंद्र मोदी से हम जैसों ने उम्मीद रखी थी कि वे इस तरह की गलत समाजवादी नीतियों को कूड़ेदान में फेंक कर एक नया आर्थिक रास्ता ढूंढ़ेंगे। अब भी वक्त है मोदीजी चल पड़िए उस नए रास्ते पर जिसका सपना आपने दिखाया था।

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