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वक्त की नब्ज: सेना के आधुनिकीकरण की जरूरत

हर रक्षा सौदे को घोटाला बनाते रहेंगे हम तो कैसे आधुनिकीकरण होगा हमारी सेनाओं का? समस्या सिर्फ वायु सेना की नहीं है, उतनी ही बड़ी समस्या थलसेना और नौसेना की भी है। चीन तो हमसे कोई पच्चीस साल आगे निकल चुका है रक्षा मामलों में, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि हमसे आगे पाकिस्तान भी निकल चुका है कई स्तरों पर।

Author March 17, 2019 3:36 AM
प्रतीकात्मक फोटो (फाइल)

एक फौजी अफसर की बेटी होने के नाते मैंने अपना सारा बचपन और आधी जवानी गुजारी है छावनियों में। कभी छावनियां बनी थीं ऐसी जगहों पर, जहां शहर नहीं थे। कुछ बेहाल-सी बस्तियां हुआ करती थीं आला अफसरों के लिए, जहां बिजली अपनी मर्जी से आती-जाती थी। पानी इतना गंदा हुआ करता था कि उबाल कर भी कीटाणु मुक्त नहीं होता था। हमारी बस्तियों से भी बेहाल बस्तियां जवानों की हुआ करती थीं। जवानों के लिए मनोरंजन के तौर पर खुले मैदानों में हफ्ते में एक शाम हिंदी फिल्में दिखाई जाती थीं हवा में झूलते परदों पर। सिनेमाघर लेकिन दूर तक कोई दूसरा नहीं था, सो हम भी देखने जाया करते थे।

अफसरों के लिए क्लब होते थे, बिलकुल वैसे जो अंग्रेजी राज से चले आ रहे थे। एक बड़े से पुराने किस्म के बंगले में बने हुए होते थे खाने-पीने के लिए डाइनिंग रूम और बार। और मनोरंजन के लिए बिलियर्ड रूम और महफिलों के लिए बड़े सारे बॉलरूम जहां बच्चों की बर्थडे पार्टियां भी होती थीं। इन क्लबों में शाम को फौजी अफसर जाया करते थे अपने बीवी-बच्चों को लेकर। इन्हीं क्लबों में मैंने पहली बार रक्षा मंत्रालय का नाम सुना होगा, जब मैं कोई पंद्रह-सोलह साल की थी। उस छोटी उम्र में भी मेरे अंदर एक पत्रकार की जिज्ञासा थी और बड़ों की बातों को चुपके से सुनने की आदत।

सो, अच्छी तरह याद है मुझे कि मेरे पिता और उनके दोस्तों में किस तरह गाली देकर बातें होती थीं रक्षा मंत्रालय में बैठे अधिकारियों की और दिल्ली में बैठे राजनेताओं की। गालियां इसलिए दी जाती थीं, क्योंकि फौजी अफसरों को शिकायत थी कि ‘इन कमबख्त दिल्ली वालों’ को जरा भी संवेदना नहीं है उनके लिए, जो अपनी जान पर खेल कर देश की सीमाओं की रक्षा करते हैं। याद है मुझे कि शिकायतें हुआ करती थीं पुरानी बंदूकों की, बेकार असलहे की और जवानों के लिए बुनियादी सुविधाओं के अभाव की। जब 1962 में चीन ने हमको युद्ध में हराया, तो बहुत बातें सुनने को मिलीं कि किस तरह हमने अपने जवानों को ढंग के बूट तक नहीं दिए थे युद्ध में भेजने से पहले। बहुत गुस्से से कहा करते थे कि नेहरुजी के रक्षामंत्री कृष्णा मेनन ने असलहा के कारखानों में कॉफी मशीनों का उत्पादन शुरू करवाया था।

तबसे लेकर आज तक आधी शताब्दी बीत गई है, लेकिन हाल वही है। कोई दो हफ्ते पहले प्रधानमंत्री मोदी ने इंडिया टुडे कॉनक्लेव में जब कहा था कि अगर वायु सेना के पास रफाल विमान होते, तो पाकिस्तान में जिहादी केंद्रों पर हमला ज्यादा आसानी से हो सकता और हमारे पायलट भी ज्यादा सुरक्षित होते। नरेंद्र मोदी के आलोचक फौरन लग गए उनकी आलोचना करने में, लेकिन मेरी राय में उन्होंने बिल्कुल ठीक कहा। रफाल लड़ाकू विमानों को खरीदने का प्रयास हम कर रहे हैं एक पूरे दशक से और आज भी उनके आने की संभावना नहीं दिख रही है अगले कुछ वर्षों में। इसलिए कि इस सौदे को घोटाले की शक्ल दे चुके हैं कांग्रेस अध्यक्ष। कहते हैं अपने हर भाषण में कि प्रधानमंत्री ने ‘भारत की जनता का तीस हजार करोड़ रुपए चुरा कर अनिल अंबानी की जेब में डाल दिया है।’ पिछले हफ्ते यह रकम पैंतालीस हजार करोड़ रुपए तक पहुंचा दी राहुल गांधी ने, लेकिन आज तक उन्होंने सबूत नहीं पेश किए हैं। सिर्फ आरोप लगाए हैं।

सबूत हैं उनके पास, तो पेश करना जरूरी हो गया है। बोफर्स सौदे में सबूत की बुनियाद पर आरोप लगे थे। सबूत था कि बोफर्स की रिश्वत का कुछ पैसा ढूंढ़ निकाला था मेरी दोस्त चित्रा सुब्रमण्यम ने उन स्विस बैंक खातों में, जो ओत्तावियो और मारिया क्वात्रोकी के नाम पर थे। क्वात्रोकी खाद बेचने का काम करते थे, सो उनको अगर बोफर्स ने रिश्वत का पैसा दिया था तो सिर्फ इसलिए कि उनकी पहुंच भारत के प्रधानमंत्री के परिवार तक थी, सो बोफर्स कंपनी के काम आए होंगे।
क्या ऐसा कोई सबूत रफाल सौदे में है उनके पास, जो इस सौदे को रोकने की कोशिश में लगे हुए हैं? अनिल अंबानी को अगर नरेंद्र मोदी ने सौदे का आधा पैसा दिलवाया है, तो इसका सबूत पेश करना लाजमी है। अभी तक जो दस्तावेज सामने आए हैं वे सिर्फ यह साबित करते हैं कि इस सौदे में प्रधानमंत्री कार्यालय से हस्तक्षेप हो रहा था। सवाल यह है कि इतने बड़े सौदे में क्या प्रधानमंत्री का हस्तक्षेप अनिवार्य नहीं होना चाहिए? हस्तक्षेप अगर सिर्फ इसलिए था कि मोदी अनिल अंबानी को सौदे से पैसा चुरा कर देना चाहते थे, तो इसका सबूत पेश करो, वरना वायु सेना को मेहरबानी करके यह विमान जल्दी से जल्दी दिलवाने का काम करो। ऐसा करना देश के हित में है।

हर रक्षा सौदे को घोटाला बनाते रहेंगे हम तो कैसे आधुनिकीकरण होगा हमारी सेनाओं का? समस्या सिर्फ वायु सेना की नहीं है, उतनी ही बड़ी समस्या थलसेना और नौसेना की भी है। चीन तो हमसे कोई पच्चीस साल आगे निकल चुका है रक्षा मामलों में, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि हमसे आगे पाकिस्तान भी निकल चुका है कई स्तरों पर। चुनावों के बाद जो भी बनता है भारत का अगला प्रधानमंत्री, उसको रक्षा मंत्रालय पर विशेष ध्यान देना होगा, ताकि ऐसा न होता रहे कि पाकिस्तान जैसा घटिया, जिहादी देश भी हमारे घर के अंदर आकर हमको मारता रहे। मेरा एक दोस्त है, जो रक्षा मामलों में खासी रुचि रखता है, क्योंकि वह खुद सेना में होता था। उसका कहना है कि भारत की सीमाएं तभी सुरक्षित होंगी जब हम अपने रक्षा बजट को दोगुना बढ़ाएंगे, लेकिन रक्षा सौदों में झूठे घोटाले ढूंढ़ना भी बंद करना होगा।

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