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वक्त़ की नब्ज़: आधुनिकता बनाम संकीर्णता

हिंदुत्व शब्द सावरकर ने दिया है और इस सोच को भी, लेकिन उनके हिंदुत्व में गौमाता की पूजा करने वालों के लिए कोई जगह नहीं थी। उनका कहना था कि गौमाता की पूजा करते-करते भारतवासी खुद गाय की तरह शांत स्वभाव के बन गए हैं।

Author Published on: September 8, 2019 1:19 AM
बिहार के छपरा में मॉब लिंचिंग (फोटो सोर्स: इंडियन एक्सप्रेस)

कभी-कभी ऐसा लगता है मुझे कि जो थोड़ी-बहुत आधुनिकता आई है अपने इस भारत महान में, वह गलती से आई है। इस हफ्ते अगर यह खयाल मुझे कुछ ज्यादा सता रहा है, तो इसलिए कि एक तरफ तो हम चांद पर जाने के सपने देख रहे हैं और दूसरी तरफ हमारे मंत्रीयों की सोच ऐसी है आज भी जैसे किसी प्राचीन काल में जी रहे हों। जिस दिन चांद पर हम अपने ‘विक्रम’ को उतारने की तैयारी कर रहे थे, उस दिन मुंबई के एक अखबार में केंद्रीय पशुपालन मंत्री गिरिराज सिंह का बयान पढ़ा, जिसने मुझे हैरान कर दिया।

मंत्रीजी किसी गोशाले में खड़े होकर बात कर रहे थे पत्रकारों से और उनसे शायद किसी ने मॉब लिंचिंग के बारे में सवाल किया होगा। जवाब में उन्होंने कहा कि इस तरह की हिंसा को कम करने का तरीका उनके मंत्रालय ने ढूंढ़ रखा है, जो अगले कुछ सालों में रंग लाने वाला है। उपाय उनके पास यह है कि गायों को ‘आर्टिफिशियल इन्सेमिनेशन’ द्वारा गर्भवती किया जाए, ताकि बैलों की संख्या कम हो जाए। मंत्रीजी का मानना है कि इस उपाय के बाद गायों को लावारिस नहीं छोड़ा जाएगा, जैसे आज छोड़ा जाता है, इसलिए कि दूध जब तक देती है गाय, तो उसको किसान अपने पास रखते हैं।

आप अगर पूछ रहे हैं कि मॉब लिंचिंग से इस उपाय का क्या वास्ता है, तो यकीन मानिए कि इसी सवाल को मैंने भी बार-बार पूछा मंत्रीजी का बयान पढ़ने के बाद। शायद मंत्रीजी जानते नहीं हैं कि मुसलमानों की लिंचिंग जब भी हुई है, तो वे अपनी ही गायों को ट्रक में लेकर जा रहे थे, लावारिस गायों को नहीं। या फिर तब हुई है जब उनकी गाड़ियों में गोश्त पाया गया और भीड़ को शक रहा कि गाय को काट कर उसका गोश्त लेकर जा रहे हैं।

जब दलित बने हैं इस तरह की हिंसा का शिकार, तो अक्सर इसलिए कि उनको मृत गाय की खाल उतारते पाया गया। जो भी हो, गोरक्षकों ने भय का इतना माहौल बना दिया है उत्तर भारत में कि कई किसानों ने पशुपालन छोड़ दिया है और जिनका धंधा हुआ करता था बूढ़ी गायों को मारना, उन्होंने भी यह यह काम छोड़ दिया है। नतीजा यह कि लावारिस गायों की संख्या तीन-चार गुना बढ़ गई है उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में। झुंडों में घूमने लगे हैं लावारिस पशु और न सिर्फ किसानों की फसलें बर्बाद कर रहे हैं, बल्कि इंसानों पर भी हमला करना शुरू कर दिया है गायों ने। हाल में एक वृद्ध औरत को जान से मार दिया एक लावारिस गाय ने और इस हमले का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था।

मैंने कई बार गोरक्षकों की हिंसा की निंदा की है और दोष दिया है हिंदुत्ववादी सोच को, जो नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद खूब फैला है देश में। लेकिन पिछले हफ्ते वीर सावरकर पर दो किताबें पढ़ने के बाद मुझे अहसास हुआ कि उनकी सोच तो आज के राजनेताओं से कहीं ज्यादा आधुनिक थी। हिंदुत्व शब्द सावरकर ने दिया है और इस सोच को भी, लेकिन उनके हिंदुत्व में गौमाता की पूजा करने वालों के लिए कोई जगह नहीं थी। उनका कहना था कि गौमाता की पूजा करते-करते भारतवासी खुद गाय की तरह शांत स्वभाव के बन गए हैं। इसलिए भारत का प्रतीक अगर किसी पशु को बनाना ही हो तो नरसिंह होना चाहिए।

सावरकर के हिंदुत्व में जातिवाद के लिए कोई जगह नहीं है और बहुत बड़ी जगह है आधुनिकता के लिए, वैज्ञानिक विचारों के लिए, आधुनिक तकनीकों के लिए। सो, आज जीवित होते सावरकर तो उनको खुशी होती कि भारत चौथा देश है दुनिया में, जो चांद पर जाने का प्रयास करने में लगा हुआ है। साथ में उनको निराशा जरूर होती गौमता की इतनी पूजा देख कर। हिंदुत्व सोच का आधार है भारत के सनातन धर्म में आधुनिक सुधार लाना और उसमें से वहम और जादू-टोना जैसी खराबियों को निकाल फेंकना। जहां तक जातिवाद को समाप्त करने की बात है, सावरकर की सोच के साथ मेल खाती है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सोच, लेकिन जहां तक आधुनिकता की बात है, दोनों के रास्ते अलग हो जाते हैं। संघ परिवार को वास्तव में इस देश की सेवा करनी है, तो अच्छा होगा अगर मोहन भागवतजी थोड़ा समय निकाल कर सावरकर पर हाल में छपी उन दोनों किताबों को पढ़ें, जो मैंने पिछले हफ्ते पढ़ी हैं।

उनको पढ़ने के बाद शायद आरएसएस भी भारत की सभ्यता में असली आधुनिकता लाने का काम करने लगेगा। इतनी आधुनिक थी सावरकर की सोच कि महात्मा गांधी से मतभेद उनका अक्सर रहता था। उन्होंने गांधीजी का खुल कर विरोध किया, जब उन्होंने कहा था कि बिहार में भूकंप आया है इसलिए कि सवर्ण हिंदू दलितों को अछूत मानते हैं। जब शंकराचार्य ने इसी भूकंप का कारण बताया जाति-व्यवस्था को समाप्त करने की कोशिश, तो इनकी आलोचना भी सावरकर ने खुल कर की थी।

आज के भारत में सावरकर के हिंदुत्व की बहुत जरूरत है। ऐसा हिंदुत्व, जो देशभक्ति पर आधारित हो और आधुनिकता से रौशन हो, ताकि भारत वास्तव में जगद्गुरु बनने का सपना साकार कर सके। चांद तक जाने वाले भारत में कोई जगह नहीं होनी चाहिए ऐसे लोगों की, जो अपना धर्म मानते हैं इंसानों की जान लेना गोरक्षा के बहाने। कांग्रेस पार्टी ने सालों से प्रचार किया है कि सावरकर मुसलमानों के दुश्मन थे। सच यह है कि उनको शिकायत सिर्फ उन मुसलमानों से थी, जो भारत को अपनी पुण्यभूमि नहीं मानते हैं।

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