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वक्त की नब्ज: लोकतंत्र के बरक्स

पहलू खान के घर से जब निकली उस दिन, तो मुझे एक गहरी मायूसी होने लगी। इसलिए कि जिन देशों में इस तरह की हत्याएं होती हैं और न्याय मिलने की उम्मीद भी नहीं होती है, उन देशों को अपने आपको सभ्य कहने का अधिकार नहीं रहता है।

Author March 24, 2019 3:13 AM
2017 में गौ तस्करी के आरोप में गौरक्षकों द्वारा पिटाई के बाद पहलू खान की मौत हो गई थी।

पिछले सप्ताह मैं बहरोड़ गई। कुछ चुनाव की हवा परखने, कुछ यह मालूम करने कि पहलू खान के हत्यारे दंडित हुए हैं कि नहीं। जिस बर्बरता से पहलू खान को मारा गया था, इस शहर में दो साल पहले, उसने भारत का सिर झुकाया दुनिया की नजरों में। एक देशभक्त के नाते मैं उन गौरक्षकों को देशद्रोही मानती हूं, जिन्होंने इस गरीब किसान की हत्या की थी अपने आपको देशभक्त समझ कर। इतना गर्व था इन हत्यारों को अपने काम पर कि उन्होंने हत्या का वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर अपलोड किया, यह सोच कर कि दुनिया उनको दाद देगी। दुत्कार मिली दुनिया से, लेकिन राजस्थान की भाजपा सरकार के गृहमंत्री ने उनका समर्थन किया, यह कह कर कि गलती दोनों पक्षों से हुई।

यही बात मुझे सुनने को मिली बहरोढ के बाजार में दुकानदारों से। ‘अच्छा हुआ जो उसको मारा गया। गलत काम जो करते हैं, उनको यही सजा मिलनी चाहिए।’ बोलने वाले तीन, चार छोटे दुकानदार थे। जब मैंने उनको कहा कि वह गायों को खरीद कर घर लेकर जा रहा था तो उनको मेरी बातों पर विश्वास नहीं हुआ, क्योंकि उन्हें बताया गया था कि पहलू खान गायों का तस्कर था। ‘सब जानते हैं जी, उसके बेटे को पहले भी यह काम करते हुए पकड़ा गया था।’

बाजार से रुख किया मैंने पुलिस थाने का। यहां सब ऐसे पेश आए, जैसे इस केस के बारे में उनको कोई जानकारी ही न हो। एक दफ्तर से दूसरे और तीसरे भेजे जाने के बाद एक ने कई फाइलें टटोलने के बाद मुझे बताया कि जिन छह लोगों को गिरफ्तार किया गया था, उसमें से दो बहरोड़ के थे, बाकी बाहर से आए थे। विपिन यादव, पुत्र संजय यादव, पास के नैनसुख मोहल्ले का रहने वाला है। मुझे उसने बताया। सो, मैं नैनसुख मोहल्ले में विपिन यादव का घर ढूंढ़ने गई। किसी को इसका नाम तक पता नहीं था। एक बंदे ने सुझाव दिया कि मुझे असली जानकारी मिलेगी कचहरी में। सो, वहां पहुंची। वहां भी कई अधिकारियों से बात करने के बाद मालूम पड़ा कि ‘उसका वकील आज वहां है ही नहीं।’
जाहिर हो गया कि बहरोड़ में मुझे कोई जानकारी नहीं मिलने वाली है। सो मैंने पहलू खान के गांव की तरफ रुख किया। उसी रास्ते से गई, जिस रास्ते से वह अपनी गाय ले जाने की कोशिश कर रहा था एक अप्रैल, 2017 को। तीन-चार घंटे लगे मुझे हरियाणा के नूह शहर तक पहुंचने में, जहां से जयसिंघपुर गांव दस किलोमीटर की दूरी पर है।
पहलू खान का टूटा-पुराना घर गांव की सीमा पर है। एक छोटे से आंगन में मेरी मुलाकात हुई उसकी विधवा जेबुनिया से, जिसने अपने बेटे को बुलवाया, जो उस समय घर में नहीं था। इतने में उसने मुझे बताया कि उसको अपने पति और बेटों पर हमले के बारे में तीन दिन बाद मालूम पड़ा, जब गांव में किसी ने ‘उस वीडियो को नेट पर देखा’। उन्होंने पहलू खान को पहचाना और उसके परिवार को खबर की। अब पशु पालना छोड़ दिया है हमने।’ जेबुनिया ने आगे कहा- ‘अब मेरे बेटे ट्रकों पर काम करने जाते हैं। उनकी कमाई से गुजारा करते हैं हम।’

इतने में उसका बेटा आरिफ आ गया। उसने मुझे बताया कि बहरोड़ की कचहरी तक वह पहुंच ही नहीं पाते हैं। ‘नीमराना तक हम पहुंचे थे पिछली सुनवाई जब होनी थी और वहीं पर हमारी गाड़ी पर गोलियां चलने लगने लगीं और हमको वापस होना पड़ा। हमारे वकील कोशिश कर रहे हैं केस को अलवर ट्रांसफर करवाने के लिए।’ आरिफ अपने पिता के साथ था उस दिन। उसका कहना है कि ‘उनकी गाड़ी में दो दूध देने वाली गाएं थीं और दो बछड़े। हमने जयपुर के मेले से खरीदी थीं और हमारे पास सारे कागजात थे। लेकिन उनको तो उन्होंने फाड़ दिए और मेरे पिता की दाढ़ी देख कर कहने लग गए कि तुम तो मुसलमान हो। पिटाई उसके बाद शुरू हुई हमारी। मेरा और मेरे भाई का इतना बुरा हाल था कि पता नहीं कैसे बच गए हम। पुलिस आधे घंटे बाद आई और हमको अस्पताल ले गई थी।’ तीन दिन बाद पहलू खान तड़प-तड़प कर खत्म हो गया। आज तक न उसके परिवार को सरकारी मदद मिली है, न मुआवजा, न न्याय। राजस्थान में कांग्रेस सरकार आने के बाद भी किसी ने उनके लिए कुछ नहीं किया है। दुबई के एक रहमदिल बंदे ने उनको एक ट्रैक्टर भेंट किया है, जो वे किराए पर देते हैं उनको, जिनकी जमीनें हैं। पहलू खान के परिवार के पास जमीन नहीं है।

पहलू खान के घर से जब निकली उस दिन, तो मुझे एक गहरी मायूसी होने लगी। इसलिए कि जिन देशों में इस तरह की हत्याएं होती हैं और न्याय मिलने की उम्मीद भी नहीं होती है, उन देशों को अपने आपको सभ्य कहने का अधिकार नहीं रहता है। उस दिन मैंने कई लोगों से आने वाले चुनावों के बारे में भी पूछा और तकरीबन सबने कहा कि नरेंद्र मोदी दोबारा बनेंगे प्रधानमंत्री। कइयों का यह भी मानना है कि बालाकोट पर हमारे जवाबी हमले के बाद एक लहर बन गई है मोदी के लिए, बिल्कुल वैसे, जैसे 2014 में थी।
मैने नरेंद्र मोदी का खुल कर समर्थन किया है, सो मुझे मोदी की ‘भक्तन’ कहते हैं उनके आलोचक। सो एक ‘भक्तन’ के नाते प्रधानमंत्री जी, मेरी आपसे दरख्वास्त है कि अगली बार अगर बनती है आपकी सरकार, आप किसी दूसरे पहलू खान को इस तरह नहीं मरने देंगे। ऐसी हत्याएं होती हैं सिर्फ उन देशों में, जहां कानून-व्यवस्था के अभाव में चलता है जंगल राज। लोकतंत्र की जड़ें मजबूत होती हैं सिर्फ उन देशों में जहां कानून-व्यवस्था मजबूत होती है।

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