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वक़्त की नब्ज़: यह पेशेवर तरीका नहीं

जो पाकिस्तान के जरनैल न कर सके वह काम भारत के पत्रकारों ने करके दिखाया है : पाकिस्तान को भारत के बराबर लाकर रख दिया है। क्या हासिल हुआ है इस तरह की पत्रकारिता से भारत को?

Author Published on: September 29, 2019 1:11 AM
मोदी और ट्रंप। फोटो: AP

शुरू करती हूं यह स्पष्ट करके कि मेरी नजर में पाकिस्तान किसी हाल में भारत की बराबरी नहीं कर सकता है। भारत को तोड़ कर जबसे बना है यह देश, इसके सैनिक शासकों की कोशिश रही है दुनिया के सामने साबित करने की कि वह भारत के बराबर है हर तरह से। इस कोशिश में उसने परमाणु हथियार बनाए। तीन बार भारत से उसने युद्ध किया कश्मीर हासिल करने के लिए और इसी कोशिश की वजह से खुद टूट गया पाकिस्तान दो हिस्सों में। लेकिन दुनिया की नजरों में अब भी सिर्फ एक छोटा, कंगाल देश है, जिसकी पहचान बन गई है जिहादी आतंकवाद के अड्डे की।

इसलिए मुझे बहुत तकलीफ हुई पिछले दिनों यह देख कर कि कुछ ‘राष्ट्रवादी’ भारतीय टीवी चैनलों ने पाकिस्तान को इतनी अहमियत दे रखी है कि उसको भारत के स्तर पर पहुंचा दिया है। जबसे अनुच्छेद 370 को खत्म कर दिया गया है, रोज किसी न किसी समाचार चैनल पर चर्चा होती है कश्मीर की स्थिति को लेकर। इन चर्चाओं में हिस्सा लेने आते हैं पाकिस्तानी पत्रकार, बुद्धिजीवी और पूर्व जरनैल। अक्सर ये लोग गुस्से में अपनी बातें रखते हैं चिल्ला-चिल्ला कर इतना ज्यादा कि उनकी आधी बातें समझ में ही नहीं आती हैं।

इसके बावजूद इनको बार-बार बुलाया जाता है और जब भी आते हैं, हमारे जाने-माने एंकर उनको जलील करने में लग जाते हैं। इतना जलील करते हैं कि देखने वालों में उनके लिए हमदर्दी-सी पैदा हो जाती है। जलील ही करना है, तो बुलाते क्यों हैं? पाकिस्तान का ऐसा फितूर चढ़ गया है मेरे कुछ टीवी पत्रकार बंधुओं के सिर कि ‘हाउडी मोदी’ वाले प्रधानमंत्री के अमेरिकी दौरे में पाकिस्तान को घड़ी-घड़ी घसीटा है इन्होंने, जैसे कि कोई मुकाबला चल रहा हो नरेंद्र मोदी और इमरान खान के बीच। इस हद तक गए हैं ये लोग कि कई पत्रकारों ने इस चीज को भी महत्त्वपूर्ण माना कि मोदी के स्वागत में एयरपोर्ट पर लंबा लाल कालीन बिछाया गया था और इमरान खान के लिए एक छोटा-सा लाल पायदान। क्या यह भी कोई कूटनीतिक जीत है?

संयुक्त राष्ट्र की आमसभा में जब मोदी पहुंचे, तो वहां भी इसी किस्म की पत्रिकारिता पेश आई। सो, सवाल उठाए कई पत्रकारों ने कि डोनाल्ड ट्रंप ने इमरान खान के साथ ज्यादा समय गुजारा कि मोदी के साथ। संयुक्त राष्ट्र में इस साल कई महत्त्वपूर्ण मुद्दे थे, जिन पर चर्चा हो सकती थी। जलवायु परिवर्तन का मुद्दा था, जिसमें भारत की भूमिका का जिक्र हो सकता था। ईरान और अमेरिका के बीच जो जंग की स्थिति बनती जा रही है, उसमें भारत की भूमिका की चर्चा हो सकती थी। चीन और अमेरिका के बीच जो व्यापार को लेकर झगड़ा चल रहा है उसमें भारत की भूमिका की बात हो सकती थी। इन सब मुद्दों को अनदेखा करके जाने-माने पत्रकारों ने ध्यान दिया सिर्फ पाकिस्तान पर। इस हद तक कि मोदी और ट्रंप जब पत्रकारों से इकट्ठा मुखातिब हुए, तो यहां भी तकरीबन सारे सवाल पाकिस्तान पर थे। कहने का मतलब मेरा यह है कि जो पाकिस्तान के जरनैल न कर सके वह काम भारत के पत्रकारों ने करके दिखाया है : पाकिस्तान को भारत के बराबर लाकर रख दिया है। क्या हासिल हुआ है इस तरह की पत्रकारिता से भारत को?

पत्रकार देशभक्त हो सकते हैं और अक्सर होते भी हैं, लेकिन समझदार पत्रकार कभी अपनी पत्रकारिता में देशभक्ति इस हद तक नहीं लाते कि पत्रकार न रह कर सरकारी प्रवक्ता बन जाएं। अफसोस कि ऐसा अमेरिका में मोदी के इस दौरे की खबर देते हुए किया है इतना कि उनमें और पाकिस्तान से गए पत्रकारों के बीच बहुत कम फर्क रह गया था। ट्रंप ने इमरान के साथ जब पत्रकारों को संबोधित किया तो पाकिस्तानी पत्रकारों ने भारत को लेकर इतने उलटे-सीधे सवाल उनसे पूछे कि ट्रंप ने इमरान को कहा, ‘क्या यह आपके टीम के लोग हैं? या स्वतंत्र पत्रकार? काश कि मुझे भी मिल जाते इस किस्म के पत्रकार।’ बाद में इन्होंने यही बात कही भारतीय पत्रकारों के बारे में।

देशभक्ति की जितनी अहमियत है उतनी ही अहमियत है असली पत्रकारिता की। मीडिया को लोकतंत्र का चौथा खंभा इसलिए माना जाता है, क्योंकि राजनेताओं और सरकारों की हरकतों पर निगरानी रखना मीडिया का दायित्व है। इस दायित्व को अगर हम निभा रहे होते ईमानदारी से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद, तो कम से कम इतना तो पूछते अपने शासकों से कि कश्मीर में अगर अब अमन-शांति बहाल हो गई है, तो अब भी नजरबंद क्यों हैं वहां के सारे बड़े राजनेता। स्थिति कश्मीर घाटी में अब पूरी तरह सामान्य हो गई है, तो अभी तक फोन सेवाएं क्यों बंद हैं?

इन सवालों के जवाब हम भारतीय पत्रकार जब नहीं मांगते हैं, तो इनको मांगने लगते हैं विदेशी पत्रकार, जिनमें कई ऐसे लोग हैं, जिनकी नीयत खराब है भारत को लेकर। मैं राष्ट्रवाद और देशभक्ति को बहुत अहमियत देती हूं, लेकिन यह भी मानती हूं की जब ये भावनाएं अपनी सीमाएं लांघ जाती हैं, तो लोगों को अंधा कर देती हैं। पत्रकारों के लिए ये खासतौर पर खतरनाक हैं। प्रधानमंत्री के ‘हाउडी मोदी’ दौरे पर जो पत्रकारिता देखने को मिली है भारत के तकरीबन हर टीवी चैनल पर, उसमें राष्ट्रवाद ज्यादा और खबरें कम दिखी हैं। ऐसा लगने लगा है कि कश्मीर को लेकर हम पत्रकार इतने राष्ट्रवादी हो गए हैं कि यथार्थ दिखना बंद हो गया है। ऐसे राष्ट्रवाद ने पाकिस्तान की मदद ज्यादा की है, अपनी भारत माता की कम। कड़वा सच है यह, लेकिन जरूरी हो गया है इस कड़वे सच को उगलने का। पत्रकारिता का मिश्रण राष्ट्रवाद से नहीं होना चाहिए।

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