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वक़्त की नब्ज़: निवेश की चुनौतियां

जिन्होंने जनता का पैसा लूटा है उनकी जगह वास्तव में जेल में होनी चाहिए, लेकिन इस प्रयास में अगर ईमानदार कारोबारियों को भी सताया जा रहा है, तो अच्छी बात नहीं है। ये लोग लुटेरे नहीं हैं, ये वे लोग हैं, जिन्होंने देश के लिए धन पैदा किया है।

Author Published on: October 20, 2019 2:17 AM
किस्मत जिनकी अच्छी होती है और भारत सरकार में मंत्री बन जाते हैं, तो मकान मिल जाता है लटयन्स दिल्ली में और इनके रहन-सहन के सारे खर्चे हम-आप उठाते हैं।

धनवान भारतीय दो किस्म के होते हैं। एक वे जो धन पैदा करते हैं अपना खून-पसीना बहा कर जीवन भर। बरसों की मेहनत के बाद ये लोग उस जगह पर पहुंचते हैं जहां वे इस लायक बन जाते हैं कि अपने लिए और अपने परिवार को वे सारी चीजें दे सकते हैं जो सिर्फ पैसों से खरीदी जा सकती हैं। जिनको विरासत में धन मिलता है उनको भी मेहनत करनी पड़ती है दिन-रात। दूसरे किस्म के धनवान वे हैं, जिन्होंने अपना धन कमाया है औरों का पैसा लूट कर। कहने को तो ये जनता के सेवक हैं, लेकिन इनकी ठाठ-बाट बिलकुल वैसी है जो देश के करोड़पतियों की होती है।

इनके बच्चे पढ़ते हैं विदेशी विश्वविद्यालयों में, इनकी बीवियों के जेवर महंगे से महंगे होते हैं, उनके कपड़े डिजाइनर होते हैं और इनके घर आलीशान। किस्मत जिनकी अच्छी होती है और भारत सरकार में मंत्री बन जाते हैं, तो मकान मिल जाता है लटयन्स दिल्ली में और इनके रहन-सहन के सारे खर्चे हम-आप उठाते हैं। हम इनसे कभी पूछते नहीं है कि इनके पास इतना धन कहां से आया है, न हम पूछते हैं कि इनके बच्चों के पास महंगी विदेशी गाड़ियां कहां से आई हैं। पूछने की हिम्मत नहीं बनती, क्योंकि हम जानते हैं कि इनका कवच है राजनीतिक ताकत।

समस्या हमारी यह है कि जो लोग वास्तव में देश के लिए धन पैदा करते हैं उनका कोई कवच नहीं होता, सो इनके पीछे पड़े रहते हैं टैक्स अधिकारी, इस हद तक कि उनका जीना हराम कर देते हैं। पिछले हफ्ते मुझे एक दोस्त ने फोन किया यह बताने के लिए कि वह अपना कारोबार बंद करने की कागार पर पहुंच गया है टैक्स अधिकारियों के कारण। पिछले बीस सालों में इस अति-ईमानदार इंसान ने दिन-रात मेहनत करने के बाद एक छोटा, लेकिन कामयाब कारोबार खड़ा किया है। समस्या यह है कि इसके ग्राहक अक्सर नगद पैसा देना पसंद करते हैं। टैक्स वालों की जाल में इसलिए फंस गया है, क्योंकि दो लाख से ज्यादा एक दिन में खर्च करने पर पाबंदी है। उसके शब्दों में, ‘मुझे जब भी कोई कैश देना चाहता है- और ऐसे बहुत ग्राहक हैं मेरे- तो मैं उस पैसे को अपने बैंक खाते में डाल कर उस पर टैक्स, जीएसटी वगैरह देता हूं। लेकिन अब मेरे ऊपर जुर्माना लगाना चाहते हैं ये लोग, इतना बड़ा कि मुझे अपना पूरा बिजनेस बेच कर देना होगा।’ टैक्सवालों ने खुद उसको कहा कि अगर दो लाख उसने किश्तों में लिए होते तीन-चार दिनों में, तो उस पर कोई जुर्माना नहीं लगता। यानी बेईमान बन जाने की नसीहत दे रहे हैं।

कहने का मतलब यह है मेरा कि हमारा देश ऐसा बन गया है, जिसमें लुटेरे और बेईमान खुशी से अपना जीवन गुजार रहे हैं और धन पैदा करने वाले फूंक-फूंक कर कदम रखने पर मजबूर हैं। यह नतीजा है प्रधानमंत्री के काले धन की लगातार खोज का। इस खोज को सफल बनाने के लिए मोदी सरकार ने टैक्स अधिकारियों को गिरफ्तार करने का भी हक दे रखा है, सो इतने ताकतवर बन गए हैं ये सरकारी अफसर कि कुछ भी कर सकते हैं, लेकिन पकड़ते हैं सिर्फ उनको जिनके पास राजनीतिक कवच न हो। उनको दिखता है कि राजनेता आजकल रहते हैं उद्योगपतियों की तरह और उनके पास काला धन मिल सकता है ढेर सारा, अगर उसको खोजा जाए, लेकिन उस कवच के कारण उनको कोई हाथ नहीं लगा सकता है जब तक सरकार में रहते हैं।

ऐसा नहीं कि धन पैदा करने वालों के पास काला धन नहीं होता है। जरूर होता है। छोटे कारोबारियों के पास इसलिए होता है, क्योंकि टैक्स देना अपने आप में एक बहुत बड़ी समस्या है। जीएसटी आने के बाद यह और मुश्किल हो गया है। मेरे दोस्त जो जीएसटी देते हैं, अक्सर छोटे कारोबारी हैं, जो बताते हैं कि इतनी लालफीताशाही में लिपट कर आया है यह नया टैक्स कि किसी अकाउंटेंट की मदद लिए बगैर काम नहीं बनता है। बहुत दिनों से सुन रहे हैं कि इस टैक्स की पेचीदियां आसान करने की कोशिश चल रही है, लेकिन अभी तक यह हुआ नहीं है, सो कई छोटे कारोबारी अपना कारोबार बंद ही कर चुके हैं।

रही बात बड़े उद्योगपतियों की, तो उनके पास काला धन अक्सर इसलिए होता है क्योंकि चुनावों के आते ही फोन आने लगते हैं राजनेताओं से चंदा के लिए। इसको चेक से दिया नहीं जा सकता है, सो इसको चुपके से नगद में दिया जाता है उन लोगों को जो राजनीतिक दल नियुक्त करते हैं चंदा इकट्ठा करने के लिए। आर्थिक मौसम जब सुहाना होता है, तो मुश्किल नहीं है चंदा इकट्ठा करना, लेकिन मंदी के इस दौर में भारतीय जनता पार्टी के आला मंत्री डराते-धमकाते हैं उन लोगों को, जिनके पास मंदी के कारण क्षमता नहीं है करोड़ों रुपए चंदा देने की।

ऐसे माहौल में कहां से आएगी निवेशकों में निवेश करने की इच्छा? निवेशक नहीं आते हैं खुश होकर तो मोदी का सपना 2024 तक भारत की अर्थव्यवस्था को पांच ट्रिलियन डॉलर तक ले जाने का सपना ही रहेगा। पिछले हफ्ते मोदी ने अपने एक चुनावी भाषण में गर्व से कहा कि उन्होंने देश का धन लूटने वालों को जेल भेज कर जनता से अपना वादा पूरा किया है।

जिन्होंने जनता का पैसा लूटा है उनकी जगह वास्तव में जेल में होनी चाहिए, लेकिन इस प्रयास में अगर ईमानदार कारोबारियों को भी सताया जा रहा है, तो अच्छी बात नहीं है। ये लोग लुटेरे नहीं हैं, ये वे लोग हैं, जिन्होंने देश के लिए धन पैदा किया है। इनका सम्मान होना चाहिए, बेइज्जती नहीं।

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