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वक़्त की नब्ज़: इस मंदी के दौर में

गरीबी हटाने का एक दूसरा तरीका है, जिसे वे लोग अपनाते हैं जो अपने आप को समाजवादी नहीं मानते हैं। यह तरीका है ऐसा आर्थिक माहौल बनाना, जिसमें निवेशक दौड़े-दौड़े सामने आएं और निवेश इतने बड़े पैमाने पर करने लगें कि करोड़ों नई नौकरियां पैदा होने लग जाएं।

Author Published on: November 10, 2019 1:30 AM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (फोटोः PTI)

तवलीन सिंह

वित्तमंत्री देर से पहुंचीं एक्सप्रेस अड््डा में पिछले हफ्ते। सो, मुझे फुर्सत मिली वहां आए बड़े उद्योगपतियों और कारोबारियों के साथ बातें करने की। बातें शुरू होने से पहले उन्होंने मुझसे आश्वासन मांगा कि उनके नाम नहीं छपेंगे। आवाज धीमी करके उन्होंने कहा, ‘माहौल खराब है इसलिए मुंह खोलने से डरते हैं हम।’ आश्वासन दिया मैंने तो उन्होंने खुल कर बातें कीं। कहा कि अर्थव्यवस्था पर जो मंदी के बादल छाए हुए हैं पिछले कुछ सालों से, अब और घने हो गए हैं, इसलिए कि जो उम्मीदें उनको मोदी के दूसरे दौर के पहले बजट से थीं, वे पूरी नहीं हुई हैं। ‘यही कारण है कि अब भी लोग निवेश करने से कतराते हैं और यही कारण है कि हजारों की तादाद में भारतीय निवेशक देश छोड़ कर भागे हैं। हमने सोचा था कि बजट में कुछ राहत मिलेगी हमें, लेकिन उल्टा हुआ।’

आगे उन्होंने कहा कि उनको खबर है कि बजट भारत सरकर के आला अफसरों ने तैयार करके वित्तमंत्री को दिया। ‘इसमें निर्मला सीतारमण का हाथ नहीं था, ऐसा कहा जाता है, इसलिए बजट के बाद उन्होंने कई घोषणाएं की हैं निवेशकों के हौसले बढ़ाने के लिए। शायद इनसे थोड़ा-बहुत फर्क पड़ेगा माहौल में, लेकिन फिलहाल मायूसी फैली हुई है।’

एक्सप्रेस अड््डा एक पांच सितारा होटल के आलीशान, चमकते महलनुमा कमरे में रखा गया था। मैं वहां जल्दी पहुंची थी इस इरादे से कि मंच के पास जगह मिल जाए, ताकि वित्तमंत्री से मैं उस सवाल को पूछ सकूं, जो कई दिनों से पूछना चाहती थी। सवाल वित्तमंत्री के एक बयान से जुड़ा हुआ था। बजट पेश करने के बाद वित्तमंत्री से जब पूछा गया कि उन्होंने ‘सुपर-रिच’ (अति-अमीर) लोगों पर क्यों एक नया टैक्स लगाया है, जो उनकी मुश्किलें और बढ़ाएगा, तो वित्तमंत्री ने जवाब दिया कि इस सुपर-रिच श्रेणी में सिर्फ पांच हजार लोग आते हैं। इस तरह कही यह बात मंत्रीजी ने जैसे उनको गर्व है कि हमारे इस ‘समाजवादी’ देश में अमीरों की तादाद इतनी थोड़ी है। मैं उनसे पूछना चाहती थी कि उनको इस बात की शर्मिंदगी नहीं होती है कि सवा सौ करोड़ आबादी वाले इस देश में इतने थोड़े लोग इस श्रेणी में आते हैं। सो, मौका मिलते ही मैंने यह सवाल मंत्रीजी से पूछा। पट जवाब आया- ‘मुझे खुशी होगी जब इस श्रेणी में लाखों लोग शामिल होंगे।’ एक्सप्रेस अड््डा में मंत्रीजी ने उस दिन स्पष्ट किया कि वे अपने आप को समाजवादी नहीं मानती हैं।

अच्छा लगा इस बात को सुन कर, क्योंकि मोदी के दौर में गलती यही हुई है कि जिन समाजवादी आर्थिक नीतियों ने देश को गरीब रखा है, उनको मोदी ने त्यागने के बदले अपनाया है। इन नीतियों की बुनियाद है गरीबों के लिए बड़ी-बड़ी योजनाएं तैयार करना, जिनमें इतने सूराख होते हैं कि गरीबों तक पहुंचने से पहले आधा पैसा गायब हो जाता हैं। गरीबी हटाने का एक दूसरा तरीका है, जिसे वे लोग अपनाते हैं जो अपने आप को समाजवादी नहीं मानते हैं। यह तरीका है ऐसा आर्थिक माहौल बनाना, जिसमें निवेशक दौड़े-दौड़े सामने आएं और निवेश इतने बड़े पैमाने पर करने लगें कि करोड़ों नई नौकरियां पैदा होने लग जाएं। ऐसा दौर तब देखा हमने जब लाइसेंस राज हटा कर निजी निवेशकों को प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने आमंत्रित किया था, अर्थव्यवस्था में भाग लेने के लिए।

देखते-देखते माहौल ऐसा बदला कि कम से कम तीस करोड़ लोग गरीबी रेखा से ऊपर आकर माध्यवर्ग में शामिल हो गए थे। भारतीय निजी कंपनियां इतनी धनी हो गई थीं इस दौर में कि विकसित देशों में निवेश करने लायक हो गई थीं। भारत की छवि बनने लगी थी एक आर्थिक महाशक्ति की। फिर सोनिया गांधी जब आर्इं तो उन्होंने उन्हीं गरीबी हटाओ आर्थिक नीतियों को अपनाया, जो उनकी सास इंदिरा गांधी की पहचान हुआ करती थीं। सो, मनरेगा जैसी योजनाएं बनने लग गर्इं, जो रोजगार देने के बदले बेरोजगारी भत्ता देने का काम करने लगीं। मोदी जब पहली बार प्रधानमंत्री बने थे, तो उन्होंने खुल कर मनरेगा की आलोचना की थी लोकसभा के अंदर, लेकिन उसके बाद इस योजना में निवेश कम करने के बदले उन्होंने दुगना कर दिया। वही समाजवादी आर्थिक माहौल बना रहा है। इसको बदलने के लिए वित्तमंत्री को साबित करना होगा अपनी नीतियों से कि उनकी सोच समाजवादी नहीं है।

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