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वक़्त की नब्ज़: मंशा पर सवाल

जब किसी कानून में साफ शब्दों में लिखा जाता है कि सिर्फ मुसलिम शरणार्थियों को भारत में पनाह नहीं मिल सकती और सिख, हिंदू, जैन, बौद्ध, इसाई शरणार्थियों के लिए न सिर्फ पनाह मिलने का प्रावधान होगा, उनको नागरिकता भी मिल सकती है, तो मुसलमानों के लिए क्या संदेश दे रही है सरकार?

Author Published on: December 8, 2019 1:11 AM
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह। फोटो सोर्स: इंडियन एक्सप्रेस

पिछले हफ्ते भारत के गृहमंत्री ने एक बार फिर धमकाने वाले अंदाज और अपने खास गुजराती लहजे में कहा कि ‘चुन-चुन कर हम उनको निकालेंगे’। झारखंड में चुनावी भाषण दे रहे थे अमित शाह और उनका इशारा उन मुसलमानों की तरफ था, जो उनकी राय में बिना इस देश की नागरिकता के ‘दीमक की तरह’ फैले हुए हैं। अच्छा लगा मुझे जब उनके श्रोताओं की तरफ से जरा भी प्रशंसा नहीं दिखी : न तालियां, न नारे। झारखंड में ये ‘दीमक’ शायद कम दिखते हैं। लेकिन यह भी हो सकता है कि नागरिकता कानून में जो संशोधन मोदी सरकार अगले हफ्ते संसद में पारित कराना चाहती है, उसमें आम भारतीय को कोई खास रुचि नहीं है।

अपनी तरफ से स्पष्ट करना चाहती हूं कि मुझे जरूरत से ज्यादा रुचि है इस संशोधन में। इसलिए कि मुझे देश के लिए खतरा दिखता है, इसमें लाभ नहीं। जब किसी कानून में साफ शब्दों में लिखा जाता है कि सिर्फ मुसलिम शरणार्थियों को भारत में पनाह नहीं मिल सकती और सिख, हिंदू, जैन, बौद्ध, इसाई शरणार्थियों के लिए न सिर्फ पनाह मिलने का प्रावधान होगा, उनको नागरिकता भी मिल सकती है, तो मुसलमानों के लिए क्या संदेश दे रही है सरकार? क्या संदेश यह नहीं होगा कि मुसलमानों का दर्जा अलग हो गया है ‘नए भारत’ में?

भारत में इंडोनेशिया के बाद दुनिया की सबसे बड़ी मुसलिम आबादी है, सो अगर उनको इतनी तकलीफ दी जाती है भविष्य में कि उनके लिए देश छोड़ कर जाने की नौबत तक आ सकती है, तो जाहिर है कि देश एक बार फिर टूट सकता है। पाकिस्तान मेरा आना-जाना रहा है पिछले चालीस सालों से। वहां लंबे अरसे तक पत्रकारिता की है, सो यकीन मानिए, जब मैं कहती हूं कि उस देश के जरनैलों का पुराना सपना है कि भारत फिर से टूटेगा एक दिन और उसका कुछ हिस्सा पाकिस्तान में शामिल हो जाएगा ताकि बराबरी हो जाए दोनों देशों के बीच जमीन पर। जब ऐसे कानून बनाए जाएंगे, जिनमें मुसलमानों के लिए अलग दर्जा होगा, तो क्या इस सपने को साकार करने में भारत के शासक मदद नहीं कर रहे हैं पाकिस्तान का?

इस संशोधन से शिकायतें मुझे और भी हैं। एक तो इसकी जरूरत नहीं दिखती है मुझे। जरूरत तब होती, अगर अमेरिका की दक्षिण सीमा की तरह हमारी किसी सीमा पर शरणार्थियों की कतारें लगी होतीं। यूरोप में भी कुछ साल पहले लाखों की तादाद में सीरिया से शरणार्थी पहुंचे थे इतनी बड़ी संख्या में कि उनको रोकना मुश्किल हो गया था। हमारी किसी भी सीमा पर ऐसा हाल नहीं है। एक समय था जब बांग्लादेश से लाखों लोग आए थे और जिनके आने से असम जैसे राज्य में आबादी की शक्ल तक बदल गई थी। ये लोग दिल्ली में भी आए थे इतनी बड़ी संख्या में कि निजामुद्दीन औलिया की मजार के आसपास इनके कैंप लगे थे। आज दिल्ली में दिखते तक नहीं हैं। ऊपर से बांग्लादेश का आर्थिक हाल इतना बेहतर हो गया है कि कई सामाजिक और आर्थिक मापदंड दिखाते हैं कि भारत से आगे निकल गया है। सो, कहां हैं ये ‘दीमक’ जो गृहमंत्री को इतनी तकलीफ दे रहे हैं?

हमारी उत्तरी सीमा से कुछ अफगान जरूर आए हैं, जो तालिबान सरकर के समय आए थे, उसकी तशद्दुद से भाग कर। इनमें से कुछ थोड़े बहुत हैं, जो दिल्ली में बस गए हैं। रही बात पाकिस्तान की, तो वहां से मुसलिम सैलानी भी आजकल नहीं आते हैं, क्योंकि माहौल दोनों देशों के बीच तनाव भरा है। आते हैं अवैध तरीकों से सिर्फ जिहादी आतंकवाद फैलाने, जिनको काफी हद तक सीमा पर ही खत्म कर दिया जाता है। इन देशों से जितने भी हिंदू और सिख आए हैं भाग कर उनको वैसे भी पनाह मिल जाती है, सो इस संशोधन की जरूरत ही क्या है?

गृहमंत्री ने ऐलान कर दिया है कि देश भर में अब नागरिकता स्थापित करने के लिए मुहिम चलेगी, जैसे असम में चलाई गई थी। असम में कोई सोलह सौ करोड़ रुपए खर्चे जाने के बाद मालूम हुआ कि उन्नीस लाख लोग हैं, जिनके पास नागरिकता के सबूत नहीं हैं। इनमें आधे तो बंगाली हिंदू हैं। जिन मुसलमानों को पकड़ा गया है, उनको खास जेलों में रखा गया है, जब तक उनको वापस बांग्लादेश न भेजा जा सके। समस्या यह है कि बांग्लादेश उनको वापस लेने को तैयार नहीं है। सो, देश भर में अगर हम खोज कर निकालने की कोशिश करेंगे मुसलिम शरणार्थियों को तो अनुमान लगाइए कि जनता का कितना पैसा लगेगा इस मुहिम पर। अनुमान यह भी लगाइए कि अगर इसी में उलझी रहेगी मोदी सरकर, तो कहां से पूरे होंगे वे परिवर्तन और विकास के वादे।

निजी तौर पर मुझे इस संशोधन विधेयक से सबसे बड़ी शिकायत यह है कि इस कानून के तहत छोटे-मोटे सरकारी अफसरों को अधिकार मिलेगा तय करने का कि हममें से भारत के असली नागरिक कौन हैं और कौन नहीं हैं। और जैसे अपने देश में अक्सर होता है, इसका परिणाम यह होगा कि भ्रष्टाचार आसमान छूने लगेगा, क्योंकि थोड़ी-सी रिश्वत देकर कोई भी नागरिक बन जाएगा भारत का। तकलीफ उन गरीब मुसलमानों को ही होगी, जिनके पास रिश्वत देने की क्षमता नहीं है। अक्सर इतने गरीब हैं इस देश के मुसलमान कि उनके छोटे से घरों में कागजात रखने की भी जगह नहीं होती है, अगर कागजात हों भी अपनी नागरिकता साबित करने के। जब ऐसे लोगों को बंद कर दिया जाएगा खास जेलों में, तो ऐसी अशांति और अराजकता फैलेगी मुसलमानों में कि जिहादी संस्थाओं का काम आसान हो जाएगा। इसलिए मुझे इस कानून से खतरा ही दिखता है देश के लिए, लाभ एक भी नहीं।

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