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वक़्त की नब्ज़: यह समय है नेतृत्व दिखाने का

जो लोग नफरत फैला रहे हैं, एक तरह की गद्दारी कर रहे हैं देश के साथ। मगर करते हैं देशभक्ति के नाम पर, सो उनको न भारतीय जनता पार्टी का कोई बड़ा राजनेता रोक रहा है और न ही संघ की तरफ से उन पर लगाम कसने की कोशिश दिख रही है।

Author Published on: October 6, 2019 1:13 AM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (AP/PTI)

तवलीन सिंह

इमरान खान हर भाषण में इन दिनों कहते हैं कि भारत के प्रधानमंत्री फासीवादी राजनेता हैं, जो मुसलमानों से नफरत करते हैं। संयुक्त राष्ट्र में कही यह बात, बार-बार दोहराई अपने हर इंटरव्यू में, जो उन्होंने दुनिया के जानेमाने पत्रकारों को दिए। वतन वापस लौटे तो इस्लामाबाद के हवाई अड्डे पर अपने समर्थकों की एक विशाल सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने यही बात फिर से कही और कश्मीर के लिए जिहाद पर निकलने के लिए उनको उकसाया। भारत के प्रधानमंत्री ने इस तरह की तकरीरों का जवाब नहीं दिया, सो भारत की लाज रखी है। लेकिन क्या जानते हैं नरेंद्र मोदी कि उनके समर्थकों में कुछ ऐसे लोग हैं जो इमरान खान के इल्जामों को साबित करने में जुटे हुए हैं देशभक्ति के नाम पर?

कुछ मंत्री हैं इनमें, कुछ भाजपा प्रवक्ता, कुछ ऐसे लोग, जो गर्व से मोदी के लिए अपनी भक्ति का इजहार करते हैं। मौका जब भी मिलता है सोशल मीडिया पर या किसी टीवी चैनल पर बात रखने का, तो मुसलमानों के लिए नफरत व्यक्त करते हैं। इतनी वाहियात हैं इनकी बातें कि मैं यहां दोहराना नहीं चाहती हूं, लेकिन इनकी तरफ प्रधानमंत्री का ध्यान जरूर आकर्षित करना चाहती हूं, क्योंकि देश के माहौल में एक अजीब कड़वाहट पैदा होने लगी है। एक तरफ हैं मोदी के हिंदुत्ववादी समर्थक, जिनको लगता है कि उनका ‘टाइम आ गया है’। दूसरी तरफ हैं आम मुसलमान, जो महसूस करने लगे हैं कि उनको दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने की कोशिश चल रही है। दूरियां बढ़ती गर्इं इस देश की इन दोनों सबसे बड़ी कौमों में, तो अच्छे दिनों के बदले बहुत बुरे दिन आ सकते हैं।

मोदी खुद हमेशा कहते हैं कि उनकी शक्ति आती है देश के एक सौ तीस करोड़ लोगों से, लेकिन शायद भूल रहे हैं कि इनमें कोई पचीस करोड़ मुसलमान हैं, जो धीरे-धीरे अपने आप को असुरक्षित महसूस करने लगे हैं। वैसे तो उनका अनुच्छेद 370 हटाए जाने से कोई वास्ता नहीं है, लेकिन उनका कहना है कि जब से कश्मीर का विशेष दर्जा हटाया गया है, उनमें और हिंदुओं में एक अजीब तनाव बन गया है, जो खतरनाक है। सो मोदीजी, विनम्रता से अर्ज करना चाहती हूं कि एक नजर आप इस तनाव की तरफ देने का कष्ट करें। आपके पहले शासनकाल में गोरक्षकों की हिंसा की तरफ ध्यान देने में आपने इतनी देर कर दी थी कि दलित भी बनने लगे थे गोरक्षकों की हिंसा का शिकार।

इस बार देर करने की गुंजाइश नहीं है, क्योंकि दुनिया की नजरें कश्मीर पर टिकी हुई हैं। घाटी में दो महीने से कर्फ्यू नाफिस है कई इलाकों में और अशांति अब भी इतनी है कि सेलफोन सेवाएं और इंटरनेट अभी तक बंद हैं। अनुच्छेद 370 का हटाया जाना बेशक भारत में ज्यादातर लोगों को अच्छा लगा है, लेकिन दुनिया की मीडिया में हर दूसरे दिन छप रही हैं कश्मीरियों पर अत्याचार की खबरें। सो, जब इमरान खान कहते हैं कि मोदी कश्मीर घाटी में मुसलमानों के कत्लेआम की तैयारी कर रहे हैं, दुनिया गौर से सुन रही है। हम जानते हैं कि कत्लेआम की कोई तैयारी नहीं हो रही है, लेकिन कभी न कभी तो कर्फ्यू हटेगा घाटी में और कश्मीरियों को मालूम जब होगा कि पूरे देश में मुसलमानों के खिलाफ नफरत का माहौल बना हुआ है, तो कश्मीर में अमन-शांति कैसे आएगी?

सो, जो लोग नफरत फैला रहे हैं, एक तरह की गद्दारी कर रहे हैं देश के साथ। मगर करते हैं देशभक्ति के नाम पर, सो उनको न भारतीय जनता पार्टी का कोई बड़ा राजनेता रोक रहा है और न ही संघ की तरफ से उन पर लगाम कसने की कोशिश दिख रही है। माना कि इनको रोकना आसान नहीं है, इसलिए कि इनमें कई ऐसे लोग हैं, जिनके सत्तर साल पुराने जख्म भरे नहीं हैं। कोई इत्तेफाक नहीं है कि उत्तर भारत में आरएसएस के सबसे कट्टर समर्थक पंजाबी हैं, जो 1947 में शरार्थी बन कर आए थे पाकिस्तान से। बुजुर्गों ने अपने बच्चों को विरासत में दिए हैं अपने जख्म और उस दौर के खून-खराबे के किस्से, जिनमें खलनायक मुसलिम थे।

फिर 1990 में उन्होंने अपनी आंखों से देखा कि कैसे कश्मीर घाटी से पंडितों को भगा दिया था मुसलिम अलगवादियों ने, ऐसे कि आज तक वे अपने घर वापस नहीं जा सके हैं। ऊपर से समस्या है दुनिया भर में जिहादी आतंकवाद की, जो सबसे पहले भारत में आई थी, क्योंकि पाकिस्तान केंद्र बना रहा है इस घिनौनी जिहाद का। अगले महीने हम याद करेंगे उन लोगों को, जो बेमौत मारे गए थे 26/11 वाले हमले में मुंबई के होटलों में और बहुत बड़ी तादाद में इस महानगर के सबसे बड़े रेलवे स्टेशन पर। कहने का मतलब मेरा यह है कि कड़वाहट के कारण कई हैं, लेकिन इसको नफरत में बदलना गलत है।

नफरत जो फैला रहे हैं सोशल मीडिया पर वे तकरीबन सारे मोदी के भक्त हैं, मोदी के मतदाता भी। मोदी अगर इशारा करें कि उनको इस किस्म की नफरत पसंद नहीं है तो ज्यादा देर नहीं लगेगी माहौल को बदलने में। उनका दखल जरूरी हो गया है, क्योंकि सबसे ज्यादा बदनाम वे खुद हो रहे हैं दुनिया की नजरों में। याद आते हैं मुझे इजरायल के पूर्व प्रधानमंत्री शिमोन पैरेज के शब्द, जो उन्होंने यासीर अराफात को कहे थे, जब एक मंच पर बैठ कर अमन-शांति लाने की बातें हो रही थीं। दावोस में हुई थी उनकी यह मुलाकात और मैं हॉल में थी। अराफात ने जब कहा कि इजरायल की शर्तें फलस्तीनी लोगों को कभी मंजूर नहीं होंगी, तो पैरेज ने कहा कि नेताओं के लिए समय आता है नेतृत्व दिखाने का। मोदीजी, समय है नेतृत्व दिखाने का।

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