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तीरंदाज: जम्हूरियत के लिए

आज जो केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर प्रदेश के विभाजन का फैसला किया है, उसकी तरफ मई, 2017 में मैंने इशारा किया था। ‘ऐसा करने से पहले पुलिस और नागरिक प्रशासन को पूरी तरह से पुनर्गठित करना होगा।

Author August 11, 2019 2:05 AM
गृहमंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (Express photo by Amit Mehra/File)

अश्विनी भटनागर

जम्मू और कश्मीर से धारा 370 हटाए जाने और प्रदेश को दो केंद्र शासित भागों में बांटे जाने पर पिछले हफ्ते से बड़ी बहस चल रही है। कुछ लोग केंद्र के फैसले पर, जिस पर संसद ने भी मुहर लगा दी है, उद्वेलित हैं। वे भड़क कर कह रहे हैं कि लोकतंत्र की हत्या हुई है और कश्मीरियों से बिना पूछे उन पर यह फैसला थोप दिया गया है। ट्विटर और फेसबुक पर लोग कश्मीरी अवाम पर हुए इस ‘अत्याचार’ पर आंसू बहा रहे हैं। वे बिलख रहे हैं कि कश्मीर की संचार व्यवस्था ठप कर दी गई है और वहां पूरी आबादी नजरबंद है। पाकिस्तान भी कश्मीर मुद्दे को फिर से उछालने के लिए अपनी कमर कस चुका है।

पर शायद केंद्र ने कश्मीरियों की दबी हुई भावनाओं को ठीक से पहचाना और उसके मुताबिक यह साहसिक कदम उठाया है। एक पत्रकार की हैसियत से मेरा 1990 से कश्मीर आना-जाना लगा रहा है। दहशतगर्दी के काले दिन भी देखे और सियासी जलजले भी। ‘कश्मीर समस्या’ से रूबरू भी हुआ हूं और कश्मीरियों की समस्याओं से भी। शुरुआती दिनों को छोड़ कर, जब दहशतगर्दी का उन्माद चरम पर था, आम कश्मीरी वास्तव में पाक समर्थक नहीं था। उसको अच्छी तरह मालूम था कि पाकिस्तान के पास उसको देने के लिए कुछ नहीं है। उसको यह भी मालूम था कि पाकिस्तान के होते हुए आजादी उसके लिए संभव नहीं है। इसके बाबजूद अगर आजादी के नारे लगते थे और पाकिस्तानी झंडे लहराए जाते थे तो उसका कारण यह था कि जम्हूरियत, इंसानियत और कश्मीरियत को दहशतगर्दी की आंधी के बाद ठीक से रोपा नहीं गया। अटल बिहारी वाजपेयी का नीति सूत्र सिर्फ जुबानी जमाखर्च था ।

आज जो नैरेटिव चल रहा है, चाहे वह राजनीतिक हलकों में हो या फिर सामाजिक दायरों में, उसकी सुगबुगाहट को लेकर दो स्तंभों में मैंने अपना विश्लेषण प्रस्तुत किया था। 24 अप्रैल, 2016 के स्तंभ में मैंने एक आम कश्मीरी को उद्धृत किया था- ‘जम्हूरियत वोटबाजी का खालिस खेल है। सियासी नवाबों की शाम की शतरंज की बाजी की तरह। उन्होंने अपने वजीर तराशे हुए हैं और पैदल भी। सबको अपनी बिसात पर चलाते हैं और फिर डिब्बे में बंद कर देते हैं, अलगी बाजी तक। और जनाब, हुक्मरानों से इंसानियत की उम्मीद रखना मक्का में इंतिहा की बर्फबारी की उम्मीद रखने जैसा है। जहां तक कश्मीरियत का सवाल है, तो जनाब, कश्मीरियत तो साजिश की दोजख में कब की जल मरी।’ उसकी बात से साफ था कि वह राजनीति और अगलाववादियों की हिंसा से ऊब चुका है, वह हताश है। उसको रास्ता नहीं दिखा पा रहा है।

मैंने लिखा था- ‘वैसे कश्मीर समस्या के समाधान में मूल मंत्र के रूप में जम्हूरियत, इंसानियत और कश्मीरियत का फार्मूला कोई बुरा नहीं है। अगर हम कश्मीर घाटी को फिर से अमन, चैन, खुशहाली और रोशन खयाली की तरफ ले जाना चाहते हैं तो ये तीनो चीजें जरूरी हैं। कश्मीरियों की भी यह तम्मना है। पर ऐसा क्यों नहीं हो रहा है?… कश्मीर समस्या के ठोस समाधान के लिए सबसे पहले हमारी पाकिस्तान नीति साफ होनी चाहिए। यानी अगर हम मानते हैं कि कश्मीर में पाकिस्तान का हाथ है, तो हमें फौरन अधिकृत रूप से पाकिस्तान से मुंह मोड़ लेना चाहिए। भारत की ढुलमुल नीति की वजह से काफी नुकसान हो चुका है। उसको स्पष्ट करने से ही कश्मीरी अवाम केंद्र के नजरिए को गंभीरता से लेगा।’

इस लेख में लिखा था- ‘कश्मीरियत पिछले दो दशकों में फिरकापरस्त तबके की जायदाद बन गई है। वही उस पर काबिज होकर कट्टरवाद चला रहा है, जबकि कश्मीरियत का जज्बा सूफी, ऋषि, संत, शैव, बुद्ध और इस्लाम के समागम से बनता है। जम्हूरियत और इंसानियत का भी यही तकाजा है कि असली कश्मीरियत को फिर से सींचा जाए, जिसमें हर तरह के लोग हिलमिल कर रह सकें। कश्मीर में न्याय तभी होगा जब शिया सुन्नी, सूफी और अहमदिया, शेख और ऋषि, पंडित और बौद्ध अपनी-अपनी जगह पर तशरीफ फरमा हों। कश्मीर का अवाम भी यही चाहता है- उसकी कश्मीरियत सदियों से यही रही है। रोजमर्रा के हादसों के बावजूद, केंद्र और राज्य सरकारों को हिम्मत और लगन से जम्हूरियत, इंसानियत और कश्मीरियत के तीनों सूत्रों को सिर्फ जुमले तक नहीं रखना है, बल्कि अमली जामा पहनाना है। तीनों सूत्रों पर एक साथ काम करके उनको अपनी-अपनी मंजिल देनी है।’

कश्मीर पर मेरा दूसरा लेख 7 मई, 2017 को ‘माफिया के शिकंजे में कश्मीरी अवाम’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ था। उसमें लिखा था कि कश्मीरी मुसलमानों का कथित पाकिस्तान प्रेम का कोई औचित्य नहीं है। कश्मीरी जानते हैं कि ‘पाकिस्तान से विलय कर के उन्हें कोई लाभ नहीं मिलने वाला, बल्कि नुकसान ही ज्यादा होगा। पाकिस्तान के कब्जे में जो कश्मीर का हिस्सा है, उसके आर्थिक हालात सर्विदित हैं। साथ ही उस देश का राजनीतिक माहौल भी ऐसा नहीं है, जिससे कश्मीरी अवाम आकर्षित या प्रेरित हो। भारत के कश्मीरी अच्छी तरह जानते हैं कि मजहब के आलावा वह पाकिस्तान से एकदम भिन्न है। दूसरी तरफ हो रहे कश्मीर में दमन का सिलसिला भयावह है, जबकि भारत के कश्मीर में लोकतांत्रिक व्यवस्था है, जो सुचारु रूप से काम कर सकती है, अगर अलगाववादी बीच में अड़चन न पैदा करे। वास्तव में उनका लक्ष्य इसको ध्वस्त करना है, जिससे वह मजहब के नाम पर मनमानी कर सके।’

वैसे मजहब की आड़ में कश्मीर पिछले तीस साल से भू-माफिया के हाथ में है। ‘यह माफिया लगभग पचास से सौ लोगों का है, जिसने अपने इर्दगिर्द उसी तरह से अपराधी पाले हुए हैं जैसे मुंबई में दाउद जैसे माफिया सरगना पाले हुए थे। ये हिंसा उकसाते हैं या खुद करते हैं और फिर उसमें आम कश्मीरियों को लपेट लेते हैं। और जैसा मुंबई में था वैसा यहां भी है- नेता, पुलिस आदि सब मिले हुए हैं और इनको इसमें शामिल रखने के लिए बाहर से पैसा आता है।’
‘वास्तव में कश्मीर में लड़ाई न इस्लामियत की है और न आजादी की। पाकिस्तान को कश्मीर उसके लोगों की ‘आजादी’ के लिए नहीं चाहिए, बल्कि उसकी जमीन की वजह से चाहिए, जिस पर वे कई और देशों से सौदेबाजी कर सकें। दोनों जमातों का कश्मीरी लोगों की बेहतरी से कोई लेना-देना नहीं है।’
‘वैसे कहने को अक्सर कहा जाता है कि कश्मीर समस्या बड़ी जटिल है, जिसका समाधान अंतरराष्ट्रीय कूटनीति से लेकर ‘हीलिंग टच’, विकास आदि या फिर पाकिस्तान से आरपार की लड़ाई के विकल्पों के बीच में कहीं छिपा है। कई दशक से भारत सरकार इन्ही विकल्पों से आंख मिचौनी खेल रही है, पर कुछ हाथ नहीं आया है।’

आज जो केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर प्रदेश के विभाजन का फैसला किया है, उसकी तरफ मई, 2017 में मैंने इशारा किया था। ‘ऐसा करने से पहले पुलिस और नागरिक प्रशासन को पूरी तरह से पुनर्गठित करना होगा। स्थानीय प्रशासन, खासकर पुलिस, का सालों से चली आ रही अव्यवस्था को जारी रखने में निहित स्वार्थ हैं। असली जम्हूरियत की खातिर और इंसानियत की खातिर इस व्यवस्था को जड़ से उखाड़ना जरूरी है। सियासी गलियारों में हलचल जरूर मचेगी, क्योंकि निहित स्वार्थ ऐसा नहीं चाहेंगे, पर राज्य सरकार को ऐसा करना ही होगा। जम्हूरियत इससे तंदुरुस्त होगी। एक प्रो एक्टिव प्रशासन ऐसा कर सकता है, यह असंभव नहीं है।’

 

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