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तीरंदाज: तरक्की बनाम लड्डू

दीवाना राजा बन कर ऐश करने लगा। राजकाज की उसको समझ तो थी नहीं और न ही कुछ करने के चाह थी। उसे यकीन था कि सिर्फ लच्छेदार बातों से काम चल सकता है। आखिरकार मोहल्लापंथी से राजपंथी तक का सफर उसने अपनी बातों के बूते पर ही तय किया था। आगे भी जुबान जय कराएगी।

प्रतीकात्मक फोटो

बहुत साल पहले एक राजा था। वह योग्य और कर्मठ था। प्रजा के साथ न्याय करता था और उनकी भलाई के लिए कई प्रकार की योजनाओं को कार्यान्वित करने के प्रयास में दिन-रात जूझता रहता था। फलस्वरूप उसके राज्य में लगभग सभी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध थीं और शिक्षा, कला और विज्ञान का बोलबाला था। आर्थिक संवृद्धि भी जल्द ही राज्य को प्राप्त हो गई थी। लोग अपने बेहाली, बेकारी और लाचारी के दिन भूल चुके थे। एक दिन अचानक ही प्रजा को लगा कि राजा ने उनके लिए कम किया है। वह बहुत कुछ और भी कर सकता था। सबसे पहले एक मोहल्ले के दीवाने के जेहन में यह विचार उपजा। राजा सिर्फ इतना ही क्यों करता है? और क्यों नहीं कर सकता है? उसने सवाल उछाला। हां, और भी कर सकता है, लोगों ने जवाब दिया, चर्चा गरम होने लगी। हर तरफ इस बात को लेकर बहस होने लगी कि जब राजा और बहुत कुछ कर सकता है तो करता क्यों नहीं है! लोग एक दूसरे से सवाल करने लगे कि जो किया गया है, क्या वह काफी है? अगर राजा के लिए यह ही काफी है तो वह निकम्मा है।

राजा ने लोगों को समझाने की कोशिश की। अपनी सीमाएं बतार्इं, राज्य की तरक्की करने की क्षमता के बारे में जानकारी दी। पर मोहल्ले के दीवाने ने सब दलीलों को मुंडी हिला कर दरकिनार कर दिया। उसने लोगों से कहा कि यह सब तर्क बेकार है, इसीलिए दिए जा रहे हैं कि राजा दुश्मन राज्य के राजा से मिल गया है और जानबूझ कर कम काम करता है, ताकि उसका देश पूर्ण रूप से विकसित न हो पाए। उसने हाथ नचा-नचा कर सबको सम्मोहित कर लिया। उसकी बयानबाजी अचानक बहुत सारे लोगों को ईश्वरीय संदेश की तरह लगने लगी। ‘राजा दुश्मन से मिला हुआ है, इसीलिए उसने अपने शासन काल में कुछ नहीं किया’ का तर्क स्वयंभू रूप में प्रकट हो गया और उसने राजा की गद्दी हिला दी। उसको वनवास लेना पड़ गया। जाते समय उसने मोहल्ले के दीवाने से पूछा, ‘मैंने तो कुछ नहीं किया, पर यह तो बता दो कि तुम क्या करोगे?’ दीवाने ने अपने हाथ इधर-उधर लहराए और फिर जोर से ताली मारी, ‘अरे, जब मैं राजा बनूंगा तो लड्डू बंटवा दूंगा।’ लड्डू का नाम सुनते ही लोगों में खुशी की लहर दौड़ गई और उन्होंने दीवाने पर फिदा हो कर बार-बार उसका जयघोष किया। राजा मन ही मन मुस्कराया और जंगल की तरफ रवाना हो गया।

दीवाना राजा बन गया। उसके समर्थकों में ज्यादातर वे लोग थे, जिन्हें मधुमेह था और हकीम लुकमान ने उनके लड्डू बंद कर रखे थे। पर राज्य घोषणा के बाद वे आश्वस्त हो गए थे कि हकीम साहेब को मुंह चिढ़ा सकते है। खूब लड्डू खाने के लिए वे लालायित हो उठे और जयकारा लगाने में लग गए।
दीवाना राजा बन कर ऐश करने लगा। राजकाज की उसको समझ तो थी नहीं और न ही कुछ करने के चाह थी। उसे यकीन था कि सिर्फ लच्छेदार बातों से काम चल सकता है। आखिरकार मोहल्लापंथी से राजपंथी तक का सफर उसने अपनी बातों के बूते पर ही तय किया था। आगे भी जुबान जय कराएगी।
अपने इस यकीन के चलते उसने मंत्रियों को राज्य कार्य से हटा कर जयकारा समारोह आयोजित करने में लगा दिया। काम सब ठप हो गया, पर दिन में दो-तीन विशाल जयकारा उत्सव होने लगे। लोग उनमें आते और अपने नए राजा की महिमा को सुन-देख कर विस्मय से भर जाते। उनको गर्व था कि वे दिन-रात एक करके उनसे अपना गौरव साझा कर रहा था। राजा की गौरव बखानी से प्रजा गौरवान्वित हो रही थी।
यह सिलसिला कुछ अरसे तक चलता रहा, पर फिर लोगों की राज्य के बिगड़ते हालात पर नजर जाने लगी। एक दिन वे जमा हुए और दीवाने के पास पहुंच गए।

‘दीवाने जी, यह सब क्या हो रहा है?’ उन्होंने बड़े अदब से पूछा। दीवाने ने हाथ नचा कर सवाल दागा- ‘क्यों, क्या तुम लोगों को मेरी सभाओं में मजा नहीं आ रहा है? कुछ और नया आइटम रखूं क्या?’ लोगों ने सिर हिलाया- ‘दीवाने जी, हम जयकारा सभाओं की बात नहीं कर रहे हैं। बहुत अच्छी चल रही है, पर आप हुजूर कुछ और भी तो करिए।’ दीवाने जी हंसे, ‘और क्या करूं बताओ।’
‘जो भी आपने करने को कहा था। जब पुराने राजा के खिलाफ आप बोलते थे कि उसने यह नहीं किया, वह नहीं किया। अब आप करिए।’ दीवाने ने लम्बी सांस ली। उसकी आखों से पश्चाताप छलक रहा था। उसने कहा- ‘हां, मैं अपना वादा भूल गया था। अच्छा किया जो याद दिला दिया तुम लोगों ने। आज ही मैं उसको पूरा करता हूं।’
लोग जयकारा करते हुए घर लौट गए। अगले दिन सुबह से हर चौराहे, गली और नुक्कड़ पर लड्डू बंटने शुरू हो गए। राज-प्रसाद पाकर मधुमेह वाले बेहद प्रसन्न हो गए और राजा का गगनभेदी जय-जयकार करने लगे। पर दूसरी तरफ कुछ लोग चिंतित हो गए। वे दीवाने के पास पहुंचे- ‘राजन, लड्डू क्यों बंट रहे हैं?’
दीवाने जी हंसे- ‘अरे तुम लोग कैसे भूल गए? याद है, मैंने कहा था कि अगर मैं राजा बन गया तो लड्डू बटवांऊंगा? याद है कि नहीं? बताओ।’
लोगों ने हामी भर ली। ‘तो लो, मैंने लड्डू बंटवा दिए। अपना वादा पूरा कर दिया। अब और क्या चाहिए तुम्हे?’
‘पर हम तो समझे थे कि आप तरक्की की बात कर रहे थे। पुराना राजा जो नहीं कर रहा था प्रजा के लिए वो करने की बात आप कर रहे थे।’
‘मैंने ऐसा कहा था? याद करो। मैंने पुराने राजा ने जो कुछ नहीं किया था उसके बारे में तुमको बताया था, उसको खुद करने को तो नहीं कहा था और तुमने जब पुछा था कि राजा बनने पर मैं क्या करूंगा तो मैं लड्डू बंटवाने का वादा किया था। सो मैंने बंटवा दिए। तुम्हारे दोनों हाथों में अब लड्डू है। जाओ खाओ और तरक्की को भूल जाओ।’
राज्य के लोग आज भी हाथों में लड्डू लिए टहल रहे हैं। उनके हाल बेहाल हैं, पर वे लड्डू पर निहाल है। मधुमेह वाले तो मीठा पाकर इतने उत्साहित हैं कि उन लोगों का मुंह नोच लेते है जो लड्डू के अलावा कोई और बात करते हैं। हकीम लुकमान ने अपनी दुकान बंद कर दी है। इंतजार कर रहे है कि कब लोगों के मन में लड्डू फूटने बंद होंगे और उनकी नकसीर फूटेगी।

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