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कला के नाम पर विकृति

समानांतर सिनेमा के नाम से एक प्रभाग अवश्य रहा और अभी तक है।

Author Published on: February 9, 2020 1:48 AM
वेब शृंखलाओं की शुरुआत लगभग आठ-दस साल पहले हुई।

कहना होगा कि आज कला और ज्ञान के हर क्षेत्र में गुणवत्ता एकदम तकनीकी हो गई है। बल्कि कहना न होगा कि आज तकनीक ही कला हो गई है- जैसे सूचनाओं का संचय ही विश्वविद्यालयों में शोध मान लिया जा रहा है। इसी के साथ जीवन और कला दोनों में संवेदनाएं बहुत बेतकल्लुफ और मंशाएं निहायत व्यावसायिक हो गई हैं। और इन पैमानों पर बिल्कुल खरा उतरता है- बल्कि यों कहें कि इस वृत्ति का अगुआ बन कर उभरा है ‘वेब शृंखला’ (वेब सीरीज) नाम का अपेक्षाकृत नया कला माध्यम।

यों वेब शृंखलाओं की शुरुआत लगभग आठ-दस साल पहले हुई। पर 2014 में आई शृंखला ‘परमानेंट रूममेट्स’ से दर्शकों के बीच इसकी ऐसी पहचान बनी, जिसके बाद इसकी झड़ी-सी लग गई, जिनमें बेक्ड, टीवीएफ पिचर्स, मैन्स वर्ल्ड, बैंड बाजा बारात, आयशा, चाइनीज भसड़, टीवीएफ बैचलर्स, टीवीएफ ट्रिपलिंग, कॉलेज रोमांस, लस्ट स्टोरी, आॅफिशियल चुकियागिरी, सेके्रड गेम्स, मिजार्पुर और होस्टेज आदि की युवा पीढ़ी के बीच बढ़ती लोकप्रियता से ‘वेब शृंखलाएं’ पिछले दो सालों से निस्संदेह एक कला के रूप में प्रतिष्ठा पा रही हैं। इन नामों से उजागर है कि हिंदी में बनने वाली इन शृंखलाओं के नब्बे प्रतिशत नाम अंग्रेजी में हैं और कुछ तो बेहद ठेठ (टिपिकल) भी। यह भी प्रमाण है इनके कर्ता-धर्ताओं के संस्कार और समझदारियों का, सतही लियाकत और उधार की दियानत का!

वेब शृंखलाओं के लक्षणों से लगता है कि इसके बाद अब कलाक्षेत्र में रचने जैसा शायद ही कुछ बचे। वह कठिन कला-कर्म तो अब अज्ञात लोक में गर्क ही हो जाएगा- डूबने की शुरुआत तो पिछली सदी के अंतिम दो दशकों से हो गई थी। इसके पहले गुणवत्ताएं इस कदर साधनों की मोहताज नहीं होती थीं। तब कला-सिद्धियां साधनाओं से होती थीं- ‘क्रियासिद्धि: सत्त्वे भवति महतां नोपकरणे’। तब उद्देश्य होता था- आत्माभिव्यक्ति। फिर थोड़ा बदलाव आया, तो आत्म की अभिव्यक्ति से खिसक कर संप्रेषण यानी अपनी बात को सामने वाले तक पहुंचाने की सोद्देश्यता पर टेक आई। लेकिन इन दोनों रूपों में मनुष्य को बेहतर मनुष्य बनाने के मूलभूत कला-प्रयोजन पर आंच नहीं आती थी। फिर शताब्दी पूर्व शुरू हुई सिनेमा कला ने तीन घंटे में जीता-जागता, बोलता-चलता एक ऐसा अदद जीवन संभार नुमायां किया कि अक्षरों-चित्रों-मूर्तियों आदि की कालजयी कलाएं काफी पार्श्व में चली गर्इं। लेकिन कुछ ही दिनों में इस सिने-कला ने इसमें लगी हुई लागत की वापसी से शुरू करके थोड़े ही दिनों में सीधे-सीधे कला को बेचने की वैधता भी सिद्ध कर दी। यहीं से कला के हाथ खुल कर ‘अकोरहा’ होने शुरू हुए- यानी कुछ लेकर ही कुछ देने की विनिमय-वृत्ति। इसके तहत सिने-कला तो धीरे-धीरे खांटी व्यवसाय बन ही गई, अन्य कलाएं भी इससे अछूती नहीं रहीं।

इसमें व्यावसायिक नैतिकता का आलम भी गजब है। शुरू होने की घोषित तिथि के पहले भी पैसे पाकर किसी सदस्य को फिल्म सुलभ करा दी जाती है। ‘कांस महोत्सव’ ने इस पर कड़ाई बरती है और ऐसी फिल्मों को शामिल न करने की सख्त चेतावनी दे दी है। लेकिन समानांतर सिनेमा के नाम से एक प्रभाग अवश्य रहा और अभी तक है, जहां कला की पिछली वृत्तियों के माकूल अवशेष जिंदा हैं। वरना तो व्यवसाय-वृत्ति का चरम इजाफा यों कि आज कमाई में ‘कितने सौ करोड़ी’ होने को ही कलात्मक उपलब्धि माना जाने लगा है। और दूरदर्शन धारावाहिक तो इसी व्यावसायिक युग की उपज हैं। लिहाजा, मनुष्य को बेहतर मनुष्य बनाने की राहें इतनी संकरी होती गर्इं कि इनमें समाज-निर्माण का कोई सपना बचा ही नहीं।

सामाजिक संरचना के इसी सपने और सांचे को क्षत-विक्षत होने से बचाने के लिए कला पर अंकुश लगाने की बात किसी न किसी रूप में अनादि काल से चली आ रही है, क्योंकि कलाओं को अपने सरोकारों में एक आवारगी की दरकार भी हमेशा रही है, जिस पर रोक और छूट को लेकर बहसें सतत चलती रहीं- कालिदास-भवभूति से मधुशाला और धूमिल तक। इस युग में उस मर्यादा का कानूनी या वैधानिक नाम है सेंसर बोर्ड, जिसके चलते फिल्मों के घोर व्यावसायिक और धारावाहिकों के दलाली होकर कमाई करने के सौ प्रतिशत इरादे के बावजूद अकूत मुनाफा नहीं हो पा रहा था। इसी क्षति की पूर्त्ति करती और सेंसर की बहसों को विराम देती हुई आई हैं वेब शृंखलाएं। सो, इनकी सफलता और बनाने की सुकरता का सबसे बड़ा मंत्र है निरंकुशता। उस पर कोई अंकुश रहा नहीं- न सरकारी, न निजी। जो चाहो, बनाओ। कहीं भी बैठ कर जब चाहो, देखो- बस में, लोकल और मेट्रो में। बंध-प्रतिबंध से इतना मुक्त है यह! इसी से खिंचे चले आए अनुराग कश्यप ‘सेक्रेड गेम्स’ लेकर और साफ कहा कि फिल्म बना कर महीनों सेंसर का चक्कर काटने से अच्छा है वेब शृंखलाएं बनाना। गरज यह कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कहने की बेलगामी के बीच जो फर्क है, उसे मिटाता हुआ आया है यह नया कलारूप।

सो, मनमानी और स्वच्छंदता ही इसके कलामूल्य हैं। जिन शब्दों-भावों, जिन दृश्यों-अदाओं आदि पर बंदिशें थीं, वही आज वेब-शृंखलाओं में आदृत हो रहे हैं, लोकप्रियता के सबब बन रहे हैं। इनमें भद्दी गालियों की भरमार है। भदेस संवाद आम हैं। इनके हिंसक दृश्य बदला या लड़ाई दिखाने वाले नहीं, बल्कि कुत्सित वृत्तियों को इरादन नुमायां करने वाले हैं। हिंसा और देहलीला का ‘खुला खेल फर्रूखाबादी’ चल रहा है- गिनी-चुनी सरोकारी शृंखलाओं के, जो पुन: निराबानी नहीं रह पातीं। इसी में आज फैली हैं शृंखलाएं, जो कल इसी के चलते एकरसता और दुहराव का शिकार होकर सिमटने के लिए अभिशप्त होंगी। संकेत दे दिया है ‘सेक्रेड गेम्स’ के दो भाग (सीजन) करने के बाद दुहराव और व्यर्थता की तोहमत लगा कर छोड़ जाने वाले सैफ अली खान ने। लेकिन ‘बोस’ करने के लिए सिर मुंड़ा कर राजकुमार राव का पिल पड़ना, अपराधी दुनिया की कहानियां सुनाने के लिए रामगोपाल वर्मा का कूद पड़ना, नवाजुद्दीन और विवेक ओबेरॉय आदि का शामिल होना, मिसालें हैं सांस्कृतिक पतनशीलता की।

मगर इन शृंखलाओं में फिल्मों-धारावाहिकों की रिक्तियों (गैप्स) को पूरने की सोच भी निहित रही है। एक ही विषय या सास-बहू जैसे घिस-पिट गए सैकड़ों कड़ियों और सालों तक चलने वाले अमेरिकी ‘सॉप ओपेरा’ के प्रभाव में बने धारावाहिकों और दो-तीन घंटों वाली फिल्मों से मुक्त होते हुए यह माध्यम पंद्रह से पैंतालीस मिनटों की दस से पंद्रह कड़ियों में पूरा कर देने का नया विधान लेकर आया, और मांग के मुताबिक फिल्म के ‘क्रिश 1-2-3’ की तरह सीजन 1-2-3… का चलन भी अपनाया। लेकिन कुछ गिने-चुने अपवादों को छोड़ दें, तो यह कहना भी सीधे आंख में धूल झोंकना है कि ‘जो कहानियां अब तक वर्जित (टैबू) होने के चलते बड़े परदे पर नहीं दिखाई जाती थीं या फिर फिल्मकार जिन कहानियों को कहने से हिचकते थे, वे भी अब वेब सीरीज में देखी जा सकती हैं।
दरअसल, यह ऐसा गड्डलिका प्रवाह है, जिसमें मनुष्य मात्र में मौजूद पाशवी प्रवृत्तियों को जगा कर उनका दोहन किया जा रहा है, जबकि इनका शमन और परिष्कार, इनसे बचना-बचाना ही साहित्य-संस्कृति का सुकर्म और कला का श्रेय-प्रेय रहा है। हैवानियत से बचने और इन्सानियत कायम करने का जरिया रहा।

आज उसी के जलजले दिखा कर दर्शकता-लोकप्रियता के मानक बनाए जा रहे हैं। अवाम को इन्हीं के साथ समय बिताने का रोगी (एडिक्ट) बनाया जा रहा है। तो इसे कला कैसे कहें? यह किसी भी सभ्य समाज में उचित और सही कैसे माना जाएगा? दरअसल, यह तो सामाजिक-सांस्कृतिक बदअमली है कि आप कुछ भी बना कर प्रस्तुत कर दें। सोशल मीडिया को भी इतनी छूट कैसे दी जा रही है कि आप जो चाहें, गोंज कर लेखक-कवि बन सकते हैं। कुछ भी बना कर फेसबुक, ‘यू-ट्यूब’ पर डाल दें। टेलीकॉम कंपनियां इसे सस्ते दर पर मुहैया करा रही हैं। साहित्य-संस्कृति-कला की अभिव्यक्ति का ऐसा बेजा इस्तेमाल इतिहास में खोजे न मिलेगा।

फिर इस कीमत पर ‘इसमें सबको रोजगार’ और ‘नया कंटेंट’ तथा ‘दर्शकों के लिए मनोरंजन का नया विकल्प’ मिलने और ‘कुशल युवाओं के लिए संभावनाओं के नए द्वार’ खुलने जैसी विरुदावलियां सिर काट कर बालों में खिजाब लगाने जैसी सिद्ध हो रही हैं। बस, तमाम बेरोजगार लोग अमीरी और सस्ती लोकप्रियता पा जा रहे हैं- धंधा भर चल निकला है।

कई बार ‘डिजिटल प्लेट्फॉर्म’ पर इन वेब शृंखलाओं की सारी कड़ियां एकबारगी प्रसारित कर दी जाती हैं, तो कई बार हर हफ्ते एक-एक कड़ी प्रदर्शित होती है। आजकल हिंदी और अंग्रेजी में तमाम नई-नई वेब शृंखलाएं और फिल्में यू ट्यूब के अलावा नेटफ्लिक्स, अमेजन, प्राइम वीडियो और हॉटस्टार जैसे डिजिटल पर्दों पर उपलब्ध हैं, जहां इन्हें आसानी से देखा जा सकता है। ‘गैंग्स आॅफ वासेपुर’ जैसी कुछेक फिल्मों को भी शृंखला में तब्दील किए जाने की वृत्ति बनी है। इन सबकी भरमार को देख कर कयास लग रहे हैं कि आने वाला युग वेब-शृंखलाओं का होगा। न जाने, उस युग की फितरत क्या होगी, कैसी होगी!

सत्यदेव त्रिपाठी

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