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शिक्षा: फर्जीवाड़े के परिसर

शिक्षा में फर्जीवाड़े समेत कई मर्ज हैं, जैसे देश में शायद ही कोई ऐसी जगह बची हो जहां पर्चे लीक न हो रहे हों और परीक्षाओं में नकल न कराई जा रही हो। फर्जी डिग्री लेने या नकल से परीक्षा पास करने में आखिर फर्क क्या है! दोनों ही तरीकों से एक अयोग्य व्यक्ति शिक्षा तंत्र को ठेंगा दिखाते हुए उसका मखौल उड़ाता है।

Author Published on: November 25, 2018 5:35 AM
अंकिव बसोया (फाइल)

प्रमाणपत्रों पर टिके हमारे शिक्षातंत्र में कैसे-कैसे झोल मौजूद हैं, यह दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्र संघ अध्यक्ष का चुनाव जीतने वाले अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के अंकिव बसोया के मामले में स्पष्ट हो गया है। बौद्ध अध्ययन में हासिल की गई उनकी स्नातक डिग्री को लेकर विरोधी एनएसयूआई ने तिरुवल्लुवर यूनिवर्सिटी से संपर्क साधा, तो वहां से साफ कर दिया गया कि बसोया ने उनके यहां से यह डिग्री नहीं ली है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने अंकिव को जांच पूरी होने तक निलंबित कर दिया और दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्र संघ का पद छोड़ने को कह दिया गया। विभिन्न पाठ्यक्रमों में दाखिले और नौकरी के लिए फर्जी डिग्री-सर्टिफिकेट का सहारा लेने का यह कोई पहला मामला नहीं है। हाल के वर्षों में जैसे-जैसे घोटाले हुए और जिस स्तर के लोग इसमें फंसे हैं, उससे सवाल उठा कि आखिर इसका कोई तकनीकी इंतजाम क्यों नहीं बन पा रहा है, जो इसकी पुख्ता रोकथाम कर सके।

यह सवाल उन पर तो है ही, जो अपने लिए जाली डिग्री-सर्टिफिकेट का जुगाड़ करते हैं, उन शिक्षण और नौकरी देने वाले संस्थानों पर भी है, जो बिना समुचित जांच किए महज अंकपत्रों और डिग्री के आधार पर दाखिला या नौकरी दे देते हैं। फर्जी डिग्री-डिप्लोमा या सर्टिफिकेट दिलाने का यह गोरखधंधा कोई नया नहीं है। बीते कई वर्षों से ऐसे रैकेट चलाने वाले लोग अखबारों में ज्ञापन छपवा कर दावा करते हैं कि कैसे बिना हाईस्कूल पास किए छात्र स्नातक परीक्षा में बैठ सकते हैं और कैसे महज बारहवीं पास बीएड आदि की डिग्रियां ले सकते हैं। यही नहीं, कई ऐसे विदेशी संस्थानों की डिग्रियां भी बड़े पैमाने पर घर बैठे दिलाई जाती हैं, जिनकी कहीं कोई मान्यता नहीं होती, पर ऐसी डिग्री पाकर लोग फूले नहीं समाते और कई बार ऐसे लोग नौकरियों या सार्वजनिक जीवन में ऊंचे ओहदे तक पहुंच जाते हैं। विदेशी शिक्षण संस्थानों का मोह भी ऐसे फर्जीवाड़े की जमीन तैयार कर रहा है, क्योंकि उनके संस्थानों और डिग्रियों की जांच तक संभव नहीं हो पाती है, जब तक कि कोई बड़ा घोटाला न हो जाए।

पिछले साल दिल्ली में फर्जी डिग्री बनाने-बेचने के एक बड़े गोरखधंधे का खुलासा हुआ था। पकड़े गए गिरोह के सदस्यों से पता चला कि उन्होंने बीते दो वर्षों में ही देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों और स्कूली बोर्डों के पचास हजार से ज्यादा जाली अंकपत्र और डिग्रियां बना कर लोगों को बेची थीं। इस दौरान बाकायदा अखबारों में विज्ञापन देकर और वेबसाइट बना कर चलाए गए इस नेटवर्क पर पुलिस की नजर क्यों नहीं पड़ी, यह आश्चर्य का विषय है। ऐसे मामलों में थोड़ा-बहुत खुलासा तब होता है जब किसी नौकरी में, किसी अन्य शैक्षिक आवश्यकता या फिर पासपोर्ट आदि के लिए अभ्यर्थी द्वारा जमा कराए गए प्रमाणपत्रों और दस्तावेजों की जांच और सत्यापन की कार्रवाई होती है।

दरअसल, हमारे शिक्षा तंत्र की तमाम बीमारियों में डिग्रियों-प्रमाणपत्रों का फर्जीवाड़ा एक छोटी-सी मिसाल है। यहां तो हाल यह है कि देश में सैकड़ों कॉलेज-विश्वविद्यालय बिना मान्यता के चलते हैं और उनकी सत्यता जांचने का ज्यादा जिम्मा उन्हीं लोगों पर छोड़ा गया है, जो उनमें पढ़ना या उनकी डिग्रियां लेना चाहते हैं। इस बारे में यूजीसी की तरफ से यह तो अवश्य किया गया है कि देश में मान्यताप्राप्त कॉलेजों और यूनिवर्सिटियों की सूची उसकी वेबसाइट पर प्रकाशित की जाने लगी है। ऐसे में अगर कोई छात्र या अभिभावक को किसी कॉलेज या यूनिवर्सिटी की मान्यता को लेकर संदेह होता है तो उस सूची से मिलान करके जानकारी पाई जा सकती है। पर अगर कोई यह जांच नहीं कर पाता या किसी अन्य कॉलेज-यूनिवर्सिटी में दाखिला नहीं मिलने की सूरत में इरादतन उसमें दाखिला लेता या उसकी डिग्री लेने की कोशिश करता है, तो उसे ऐसा करने से रोकने का क्या उपाय है? इसी तरह एक बड़ी समस्या यह है कि देश में कई नामी तकनीकी संस्थान किसी यूनिवर्सिटी की संबद्धता के बगैर चलते रहे हैं। एमटेक, एमफार्मा, बीटेक, एमसीए जैसे पाठ्यक्रमों में दाखिला लेने वाले छात्रों को कई बार यह जानकारी काफी देर से मिल पाती है कि जिस पाठ्यक्रम और कॉलेज में उन्होंने दाखिला लिया है, वह किसी यूनिवर्सिटी से जुड़ा हुआ नहीं है।

ऐसा ही एक मामला 2014 में उत्तर प्रदेश में सामने आ चुका है। यूपीटीयू यानी उत्तर प्रदेश टेक्निकल यूनिवर्सिटी ने यह पाया था कि प्रदेश के एक सौ दस इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट संस्थान बिना किसी संबद्धता के चल रहे थे, हालांकि उन्होंने सत्र 2013-14 में करीब पच्चीस हजार छात्रों को विभिन्न पाठ्यक्रमों में दाखिला दिया था और इसके बदले भारी फीस ली थी। इस बारे में नियम यह है कि ऐसा कोई भी निजी तकनीकी और प्रबंधन संस्थान एआईसीटीई यानी इंस्टीट्यूट आॅफ इंडिया काउंसिल आॅफ टेक्निकल एजुकेश की मान्यता या संबद्धता के बिना कोई पाठ्यक्रम नहीं चला सकता। इसी नियम के तहत 2013 में देश भर के तीन सौ छत्तीस संस्थानों को अवैध घोषित किया गया था।

ऐसे निजी संस्थान खोल लिए जाते हैं, जिनकी इमारतें तो काफी बड़ी और शानदार होती हैं, लेकिन उनमें पढ़ाई का स्तर और पढ़ाने वाले शिक्षकों की योग्यता आदि का अभाव होता है। दलालों के माध्यम से ऊंचे-ऊंचे दावे करके उनमें हजारों छात्रों का दाखिला भी करा लिया जाता है। उनमें से अगर कोई संस्थान की मान्यता का सवाल उठाता है, तो उसे यह आश्वासन देकर शांत कर दिया जाता है कि इसकी फाइल संबंधित यूनिवर्सिटी के पास लंबित है और जल्द ही उसे स्वीकृति मिल जाएगी। इस तरह बिना मान्यता लिए खड़े किए गए ये फर्जी संस्थान हर साल हजारों छात्रों और उनके अभिभावकों को ठग रहे हैं। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि यूजीसी और एआईसीटीई के पास ऐसे संस्थानों पर सीधी कार्रवाई का कोई अधिकार नहीं है। यही नहीं, ये संस्थाएं ऐसे मामलों में खुद संज्ञान लेकर कार्रवाई नहीं करती हैं, जिसका खमियाजा वे छात्र उठाते हैं, जो इन संस्थानों के बारे में खुद कोई जांच नहीं करते या उच्च-तकनीकी शिक्षा के अन्य विकल्पों के न रहने की सूरत में इनमें दाखिला लेने की भूल कर बैठते हैं। उन्हें इसका अहसास किसी नौकरी के लिए आवेदन करते वक्त होता है, जब उन्हें यह जानकारी मिलती है कि जिस संस्थान से उन्होंने शिक्षा हासिल की है उसे यूजीसी या एआईसीटीई की मान्यता ही नहीं प्राप्त है।

हालांकि शिक्षा में फर्जीवाड़े समेत कई मर्ज हैं, जैसे देश में शायद ही कोई ऐसी जगह बची हो जहां पर्चे लीक न हो रहे हों और परीक्षाओं में नकल न कराई जा रही हो। फर्जी डिग्री लेने या नकल से परीक्षा पास करने में आखिर फर्क क्या है! दोनों ही तरीकों से एक अयोग्य व्यक्ति शिक्षा तंत्र को ठेंगा दिखाते हुए उसका मखौल उड़ाता है। ऐसी घटनाओं का सबसे ज्यादा असर प्रतिभावान और मेहनती छात्रों पर पड़ता है। नौकरियों में फर्जी डिग्री वाले को ऊंचे अंकों की वजह से बढ़त मिल जाए, तो यह और भी खतरनाक बात है।

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