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दूसरी नज़र: अर्थशास्त्रियों के बिना अर्थव्यवस्था

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करीब बारह साल तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे। उनकी वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में एमए की डिग्री हासिल की है। उन दोनों के बीच एक समानता है।

Gross Domestic Product, GDP, India, Narendra Modi, BJP, NDA, NDA Government, Shock, Quarter 2, Gross Domestic Product, GDP, Growth Rate, 4.5 Percent, Business News, Hindi Newsवित्त मंत्री निर्मला सीतारमण। (एक्सप्रेस आर्काइव फोटोः ताशी तोबग्याल)

पी चिदंबरम

हर व्यक्ति अर्थशस्त्री होता है- घरेलू चीजों का बजट तैयार करने वाली गृहिणी से लेकर गाय का दूध बेचने वाले ग्वाले तक और भवन निर्माण में इस्तेमाल होने वाली छोटी-छोटी चीजें बनाने वाले छोटे उद्यमी से लेकर बड़े भवन निर्माता तक, जो बड़े-बड़े अपार्टमेंट बना कर बेचता है। ये सभी चाहे मजबूरीवश हो या फिर अपने कारोबार के क्षेत्र विशेष से संबंधित ठेकों, कर आदि से जुड़े नियम-कानूनों के पालन की बाध्यता के चलते हो, कारोबार की सुगमता, अपने ग्राहकों/ समकक्षी कारोबारियों से संबंध बेहतर बनाए रखने के लिए हो, आर्थिक पहलुओं का ध्यान रखते ही हैं। ये सभी जानकार होते हैं, दरअसल ये सभी तथ्यों से भलीभांति अवगत होते हैं। सबसे बेहतर जाना-पहचाना तथ्य है पैसा। हमारी कहानी में वही नायक होता है, जो आमतौर पर जाने-पहचाने तथ्यों के आधार पर सटीक निर्णय करता है।

मगर नायक तब गलत साबित होता है, जब वह अज्ञात तथ्यों की तरफ मुड़ जाता है- दोनों, ज्ञात अज्ञात और अज्ञात अज्ञात। फिर एक समय के बाद नायक अज्ञात का विश्ेषज्ञ हो जाता है। वह नायक किसी राज्य का चुना हुआ मुख्यमंत्री भी हो सकता है, और हो सकता है उसने अपने राज्य में बहुत प्रभावशाली ढंग से शासन चलाया हो। लंबे समय तक नायक ने जाने-पहचाने ज्ञात- पैसा- और अन्य सारे ज्ञात और अज्ञात को संचालित किया हो। पर समस्या तब पैदा होती है जब नायक ज्ञात और अज्ञात से अलग दिशा में सफर तय करना शुरू करता है। उस समस्या को कहते हैं- बाजार। और जब बाजार में एक-दूसरे से असंबद्ध करोड़ों लोग हों, और वे भय और अनिश्चितता के वातावरण में अपने-अपने निजी फैसले करते हों, वे अलग-अलग उद्देश्यों से प्रेरित हों, तब बाजार सामान्य समस्या नहीं, बल्कि बहुत बड़ी समस्या बन जाता है।

अगर चूहा और आदमी दोनों को ध्यान में रख एक उत्कृष्ट योजना बनाई जाए, तो वह बाजार में जाकर विफल हो जाएगी। आकार और पैमाना मायने रखता है। परीक्षा पास करने के लिए संतुलित बजट तैयार करने में वैसी चुनौतियों का सामना नहीं करना पड़ता, जैसी चुनौतियां सरकार के लिए बजट तैयार करने में पेश आती हैं। इसी तरह एक राज्य चलाने में उन बहुत सारी चुनौतियों का सामना नहीं करना पड़ता, जो देश चलाने में सामने आती हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करीब बारह साल तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे। उनकी वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में एमए की डिग्री हासिल की है। उन दोनों के बीच एक समानता है- ऐसा वे सोचते हैं- और उन्हें सोचना भी क्यों नहीं चाहिए- कि वे दोनों कुशल अर्थशास्त्री हैं, वे भारतीय अर्थव्यवस्था को संचालित करने में सक्षम हैं। पर काश, वे दोनों भारतीय अर्थव्यवस्था की धीमी गिरावट और फिर आसन्न विध्वंस की जिम्मेदारी ले पाते! पिछली छह तिमाहियों के जो आधिकारिक आंकड़े उपलब्ध हैं, उनमें भारत की जीडीपी विकास दर क्रमश: 8.0, 7.0. 6.6, 5.0 और 4.5 है। हर मद से, जैसा कि सुना जा रहा है, प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री चिंतित हैं, मगर वे इसे जाहिर नहीं कर रहे- अभी तक तो ऐसा ही है। प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री की मेहनत में एकदम अंतर है : निर्णय प्रधानमंत्री कार्यालय लेता है और उन्हें लागू करने की जिम्मेदारी वित्त मंत्रालय की होती है। और दोनों के कार्यालयों में परस्पर संदेह और दोषारोपण का खेल चलता है।

अब कहानी के दो मुख्य नायक निरीह प्याज की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जिसे लेकर गरीब और मध्यवर्ग में हाहाकार है। क्या उन बहुत सारी चीजों के बीच ‘प्याज’ कहीं गलत भी हो सकता है, जिनका हम सामना कर रहे हैं? इसके अलावा, राष्ट्रीय सांख्यिकी सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) के अनुसार घरेलू खपत घटी है। लोगों को ग्रामीण मजदूरी नहीं मिल पा रही है। उत्पादन की कीमतें घटी हैं, खासकर किसानों के उत्पादन की। दिहाड़ी मजदूरों को महीने में पंद्रह दिन से अधिक काम नहीं मिल पा रहा है। मनरेगा में काम की मांग बढ़ी है। टिकाऊ और गैर-टिकाऊ दोनों तरह की उपभोक्ता वस्तुओं की बिक्री में कमी आई है। थोक मूल्य सूचकांक बढ़ कर 1.92 प्रतिशत तक पहुंच गया है और खुदरा उपभोक्ता मूल्य सूचकांक 4.62 प्रतिशत पर पहुंच गया है। ताप उर्जा संयंत्रों यानी थर्मल प्लांट का उत्पादन 49 प्रतिशत पर पहुंच गया है। इसका अर्थ है कि बिजली की खपत घटने की वजह से कुल तापीय ऊर्जा क्षमता का आधा हिस्सा बंद हो गया है।

फिर भी सरकार सोचती है कि आसन्न विध्वंसक संकट दूर हो जाएगा। दरअसल, यह सब सरकार अपने अतीत के जिदवश किए गए अतार्किक फैसलों को अविवेकपूर्ण ढंग से छिपाने की मंशा से कर रही है, जैसे नोटबंदी, त्रुटिपूर्ण जीएसटी, कर आतंकवाद, नियामक अतिवाद, प्रधानमंत्री कार्यालय में संरक्षणवाद और निर्णयों का केंद्रीकरण। नोटबंदी के जरिए 8 नवंबर, 2016 को मानव निर्मित तबाही आई थी। तमाम चेतावनियों के बावजूद सरकार ने स्टाक लेना बंद नहीं किया था। ‘द इकोनॉमिस्ट’ ने सरकार को अर्थव्यवस्था का ‘अक्षम प्रबंधक’ कहा था। जब दूसरे विकल्प नहीं बचे, तो मंत्रियों ने झूठ बोलने और प्रपंच का सहारा लेना शुरू कर दिया था।

सरकार ने स्वीकार किया है कि अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी है, मगर उसने किसी प्रकार की ऐसी ‘संरचनात्मक’ गड़बड़ी से इनकार किया है, जिसे दुरुस्त करने की जरूरत है। सरकार ने इसे ‘चक्रीय’ समस्या माना है। उसके अनुसार यह बहुत छोटी सी ‘मौसमी’ समस्या है, जिसका वह आकलन नहीं कर पाई। भारत की अर्थव्यवस्था बिना किसी अर्थशास्त्री की सलाह और सहयोग के चल रही है। आखिरी आदमी थे डॉ. अरविंद सुब्रमण्यन। कल्पना कीजिए कि बिना किसी प्रोफेसर के कोई शोध पाठ्यक्रम चलाया जाए या फिर बिना किसी डॉक्टर के कोई गंभीर आपरेशन किया जाए, तो क्या होगा! बिना किसी प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री के- और अक्षम प्रबंधकों की मदद से- अर्थव्यवस्था को चलाना भी कुछ वैसा ही है।

प्रतिशत में
2016-17 2017-18 2018-19 2019-20
कृषि विकास दर  6.3 5.0 2.9 2.1
औद्योगिक उत्पादन 4.6 4.4 3.9 2.4
मुख्य क्षेत्र विकास 4.8 4.3 4.4 0.2
एमएसएमई ऋण वृद्धि 0.9 -0.4 2.3 2.7
निर्माण -1.2 1.7 -1.4 0.7
अंतिम निजी उपभोग खर्च 56.1 56.3 56.9 55.7
बेरोजगारी 9.65 4.03 5.14 7.03

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