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दूसरी नजर: क्यों नाखुश होंगे तेरह अर्थशास्त्री

अर्थव्यवस्था को वैसे ही क्रांतिकारी सुधारों की जरूरत है जैसे 1991-96 में किए गए थे। सरकार को ऐसे सुधारों के लिए जनादेश मिला है। बेवजह सरकार ने आंकड़ों पर आधारित वृद्धि वाले सुधारों का रास्ता चुना है।

Author July 7, 2019 1:53 AM
पी चिदंबरम और नरेंद्र मोदी।

पांच साल पहले तत्कालीन मुख्य आर्थिक सलाहकार डा. अरविंद सुब्रमनियन ने जब अपना पहला आर्थिक सर्वे (2014-15) पेश किया था तब उन्होंने कहा था, ‘भारत एक अच्छे मुकाम पर पहुंच गया है, जो राष्ट्रों के इतिहास में दुर्लभ है, जिसमें इसे दो अंकों वाली मध्यम अवधि की विकास रणनीति में आखिरकार रखा जा सकता है।’ वे मोदी सरकार में अपना निर्धारित कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए, क्योंकि उन्होंने इस बात को स्वीकार किया था कि सरकार अपने वादे पूरे करने में नाकाम रही है। यह उनके उत्तराधिकारी डा. कृष्णामूर्ति सुब्रमनियन पर स्वीकार करने के लिए छोड़ दिया गया था कि मोदी-1 सरकार पिछले पांच साल में साढ़े सात फीसद औसत जीडीपी वृद्धि ही हासिल कर पाई।

साढ़े सात फीसद की वृद्धि दर संतोषजनक है लेकिन दो अंकों में वृद्धि का लक्ष्य कहीं से भी करीब नहीं लग रहा। इसके अलावा पिछले पांच साल में वृद्धि दर 7.4, 8.0, 8.2, 7.2 और 6.8 फीसद रही। पहले तीन साल में 7.4 से 8.2 फीसद की वृद्धि दर देख कर डा. अरविंद सुब्रमनियन खुश हुए होंगे, लेकिन मुझे संदेह है कि नवंबर 2016 में नोटबंदी के बाद हुई तबाही से परेशान हुए होंगे। तब से वृद्धि 8.2 से 7.2 और 6.8 फीसद की दर से गिरती चली गई।

मोदी-2 सरकार के सत्ता में आने तक गिरावट काफी ज्यादा हो चुकी थी। 2018-19 की तिमाहियों में वृद्धि 8.0, 7.0, 6.6 और 5.8 फीसद रही। यह इतनी खतरनाक स्थिति है कि नए मुख्य आर्थिक सलाहकार को मोदी-2 सरकार का लक्ष्य इस तरह तय करना पड़ा- ‘भारत का लक्ष्य 2024-25 तक अर्थव्यवस्था को पांच खरब अमेरिकी डॉलर की बनाना है जिससे भारत दुनिया में तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। सरकार ने रिजर्व बैंक से मौद्रिक नीति में मुद्रास्फीति चार फीसद रखने की जो बात कही है, उसके लिए आठ फीसद की जीडीपी वृद्धि दर जरूरी है।’ यह एक उचित लक्ष्य है। हमारे सामने सवाल यह है कि आर्थिक सर्वे में निर्धारित लक्ष्य ों को निर्मला सीतारमन का पहला बजट कहां तक पूरा कर पाएगा? हम सब लोग बिंदुवार कई मुद्दे रख सकते हैं और बजट भाषण के आधार पर खुद से पूछ सकते हैं कि कितने मामलों की वित्त मंत्री ने चर्चा की।

अक्तूबर 2018 में अंतरराष्ट्रीय ख्याति के तेरह अर्थशास्त्रियों, जो भारतीय या भारतीय मूल के हैं, ने चौदह पेपर तैयार किए थे जो 2019 में ‘वॉट द इकॉनोमी नीड्स नाउ’ शीर्षक से प्रकाशित हुए थे। डा. अभिजित बनर्जी और डा. रघुराम राजन ने विचारों की बड़ी बारीकी से जांच और विश्लेषण करके ‘भारत के समक्ष आठ बड़ी चुनौतियां’ को सूचीबद्ध किया था। इनमें हरेक का संबंध प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अर्थव्यवस्था से है। मैंने अपनी सूची के लिए पांच विचार इसी किताब से लिए हैं-

यहां ये बिंदु दिए जा रहे हैं और यह भी कि क्यों मैं इन पर सही या गलत का निशान लगा रहा हूं-
वित्तीय घाटा नियंत्रित करना : वित्तीय घाटे को काबू कर पाने के मामले में मोदी सरकार का रिकार्ड बहुत ही खराब रहा है। पहले पांच साल में यह वित्तीय घाटे को 4.5 से 3.4 फीसद तक ले आने में कामयाब रही थी। दरअसल, वित्तीय घाटा चार साल से 3.4 और 3.5 फीसद पर बना रहा और 2019-20 के बजट में इसे 3.3 फीसद तक लाने के वादे किए गए हैं। 2018-19 के आंकड़े संदेहास्पद इसलिए हैं क्योंकि राजस्व का भारी नुकसान हुआ है और बजट से इतर उधारी बढ़ी है। इसलिए 2019-20 के लिए वित्तीय घाटे का अनुमान भी संदेहास्पद है।

क्षेत्रों (कृषि, बिजली, बैंकिंग) की खराब हालत : कृषि क्षेत्र के संकट से उबारने के लिए बजट भाषण में किसी कदम का जिक्र नहीं किया गया। बिजली क्षेत्र के बारे में मौजूदा योजना ‘उदय’ के वितरण कंपनियों के वित्तीय और परिचालन संबंधी लक्ष्यों को ही दोहरा दिया गया। इसमें ‘पुराने और अक्षम पड़ चुके संयंत्रों’ को हटाने की बात कही गई और ‘प्राकृतिक गैस की कमी को देखते हुए गैस संयंत्र क्षमता का कम उपयोग करने’ की बात कही। बैंकिंग क्षेत्र के बारे में, बजट में सरकारी बैंकों को सत्तर हजार करोड़ रुपए की पूंजी उपलब्ध कराने (जो कि पूरी तरह से नाकाफी है) का वादा किया है। इसके अलावा बैंकों को वित्तीय रूप से मजबूत गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) की संपत्तियां खरीदने के लिए एकबारगी छह महीने के लिए आंशिक तौर पर गारंटी देने का भी प्रस्ताव है (इसमें अपर्याप्त तरलता के बारे में कुछ नहीं कहा गया है)।

बेहतर कारोबारी माहौल : कारोबारी माहौल को ‘बेहतर’ बनाने के लिए कई तरह के विचार रखे गए हैं। अगर कारोबार उसी ढर्रे पर चलते रहे और वही काम उसी तरह से करते रहे तो कारोबार को आसान करने से फायदा क्या हुआ?
विशेष आर्थिक जोन (सेज) जरूरी नहीं कि निर्यात लक्ष्य पूरे करें; श्रम कानून बदलने की जरूरत है, सिर्फ उन्हें संहिताबद्ध करने या आसान बनाने की नहीं; स्टार्ट-अप शुरू करने और उन्हें बिना लाइसेंस या अनुमति के तीन साल तक कारोबार करने देने की जरूरत है, आदि, ऐसे विचार थे जो स्वीकार किए जा सकते थे।

कम बोझिल कानून : सबसे अच्छा समाधान तो व्यापक स्तर पर विकेंद्रीकरण था। इसकी शुरुआत के लिए, स्कूली शिक्षा राज्यों को सौंप दी जानी चाहिए-जैसा कि मूल संविधान में कहा गया है- और ऐसे ही अन्य विषय भी समवर्ती सूची से राज्य सूची में हस्तांतरित कर दिए जाने चाहिए। इसके ठीक उलट, स्कूली और कॉलेज शिक्षा में वित्त मंत्री केंद्र की बड़ी भूमिका को देख रही हैं! आरबीआइ, सेबी, भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआइ), सीबीडीटी, सीबीआइसी आदि को नियंत्रकों में बदल दिया गया है और नियमों को ज्यादा, कम नहीं, बोझिल बना दिया गया है।

ज्यादा नगदी हस्तांतरण : इस मोर्चे पर, सरकार ने डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के लिए कदम बढ़ाए हैं और बड़ी मात्रा में नगदी निकालने को निरुत्साहित किया है। यह स्वाभाविक है कि प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण के जरिए ज्यादा सहायता और नगदी लाभ दिए जा सकेंगे। हालांकि यह ‘सुधार’ सात साल पुराना है, इसलिए इस पर मैं सही का निशान लगाऊंगा।

अर्थव्यवस्था को वैसे ही क्रांतिकारी सुधारों की जरूरत है जैसे 1991-96 में किए गए थे। सरकार को ऐसे सुधारों के लिए जनादेश मिला है। बेवजह सरकार ने आंकड़ों पर आधारित वृद्धि वाले सुधारों का रास्ता चुना है। तेरह अर्थशास्त्री जो सभी भारतीय या भारतीय मूल के हैं, इससे निराश होंगे। ऐसे भी कई होंगे जो क्रांतिकारी सुधार की जड़ें तलाश रहे होंगे।

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