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दूसरी नजर: पुराने को उतार फेंकने का वक्त

तमिलनाडु में त्योहार को भोगी कहा जाता है। देश के दूसरे हिस्सों में इसे लोहड़ी कहते हैं। फसल कटने का वक्त करीब है। यह वह समय है जब सांडों, गायों और हलों को पूजा जाता है, इसी समय किसानों के साथ जश्न भी मनाया जाता है। नई सुबह के जश्न से पहले हमें फटे-पुराने कपड़ों, खेती के टूटे-फूटे औजारों और साल भर जमा हुईं बेकार की चीजों को बाहर कर देना चाहिए।

Author January 27, 2019 3:25 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर। (Express Photo)

तमिलनाडु में त्योहार को भोगी कहा जाता है। देश के दूसरे हिस्सों में इसे लोहड़ी कहते हैं। फसल कटने का वक्त करीब है। यह वह समय है जब सांडों, गायों और हलों को पूजा जाता है, इसी समय किसानों के साथ जश्न भी मनाया जाता है। नई सुबह के जश्न से पहले हमें फटे-पुराने कपड़ों, खेती के टूटे-फूटे औजारों और साल भर जमा हुर्इं बेकार की चीजों को बाहर कर देना चाहिए। भोगी के दिन हम इन चीजों को सांकेतिक रूप से जला देते हैं। अगला दिन पोंगल या संक्रांति का होता है, फसल का पर्व। तमिलनाडु में जल्लीकट्टू (सांडों की लड़ाई) इन आयोजनों का हिस्सा होता है। ‘पुराने को उतार फेंकने, नए को धारण करने’ में भी फसल के चक्र से जुड़ी भावना निहित है। लोकसभा चुनावों के मौके पर मैं खुद अपने से पूछ रहा हूं कि नई सरकार का स्वागत करने से पहले हमें किसका परित्याग कर देना चाहिए। कुछ थोड़े-से बिंदु ही मैं बना पाया।

बल प्रयोग की नीति
सबसे पहले तो हमें उन जटिल समस्याओं के प्रति बल प्रयोग की मानसिकता को छोड़ना होगा, जो सत्ता की ताकत के प्रदर्शन से हल नहीं हो सकती हैं। जम्मू और कश्मीर में बल प्रयोग की यह नीति जिस सबसे बुरे रूप में सामने आई, उससे यह धारणा बनी कि यह बल प्रयोग, सैन्य ताकत और बहुमत की राय लिए हुए है, और इसने राज्य की पूरी आबादी को अपनी जद में ले लिया और नौजवानों को आतंकवाद की ओर धकेला। एक होशियार नौजवान और 2010 के आइएएस टॉपर ने इसी हताशा और निराशा में सिविल सेवा से इस्तीफा दे दिया। पूर्वोत्तर राज्यों में इसी बल प्रयोग की नीति के तहत राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर तैयार करने का काम तेज किया गया और चालीस लाख सात हजार सात सौ सात लोग ‘राज्य से बाहर’ कर दिए गए। अब यही बल प्रयोग का विचार जातीय आबादी पर नागरिक संशोधन विधेयक का डंडा चला रहा है, जिनमें दूसरे देशों, खासतौर से बांग्लादेश के ‘उत्पीड़ित अल्पसंख्यक’ हैं।

बल प्रयोग की इस नीति को छोड़ना होगा। दूसरा, उन कानूनों को हटाना या नए सिरे से बनाना होगा जो अन्यायपूर्ण हैं। इस सूची में सबसे ऊपर भारतीय दंड संहिता की धारा 124 ए है, जो देशद्रोह से संबंधित है। इसे एकदम खत्म कर दिया जाना चाहिए। इसी तरह सशस्त्र बल (विशेष शक्तियां) कानून है जो सैन्य बलों को किसी को भी मार डालने का अधिकार देता है, इसे वापस लिया जाए या फिर इसमें व्यापक सुधार किए जाएं।
वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) से संबंधित कानूनों को नए सिरे से तैयार किया जाना चाहिए। अगर कोई केंद्रीय जीएसटी कानून के मसविदे को (जिस रूप में इसे पारित किया गया, कानूनी अंग्रेजी भाषा में) समझ लेने का दावा करता है तो ऐसे व्यक्ति को वकील बनने के लिए कानून की परीक्षा पास करने की जरूरत नहीं है! जीएसटी कानूनों में मुनाफाखोरी रोकथाम प्रावधान को खत्म करना चाहिए। स्टार्ट-अप पर से ऐंजल टैक्स खत्म किया जाना चाहिए।

गरीबों के प्रति भेदभाव
तीसरा, गरीबों के लिए बनाई गर्इं खामियों भरी और भेदभाव वाली योजनाओं को बंद किया जाना चाहिए और उनकी जगह ऐसी योजनाएं लागू की जानी चाहिए जो गरीब को फायदा पहुंचाने वाली हों। इसकी लंबी सूची है- मुद्रा लोन, स्वच्छ भारत (क्लीन इंडिया) जिसके तहत ऐसे शौचालय बनाए गए, जिनका या तो इस्तेमाल ही नहीं किया गया, या इस्तेमाल करने लायक ही नहीं थे, फसल बीमा योजना जिसने किसानों को लूटा और बीमा कंपनियों को मालामाल बनाया, कौशल विकास योजना से सिर्फ अट्ठाईस फीसद प्रशिक्षणार्थियों को ही फायदा मिल पाया, और आयुष्मान भारत योजना के लिए पर्याप्त पैसा नहीं है और वे गरीब इससे बाहर हो गए हैं, जो निजी अस्पतालों में जा नहीं सकते। अगर आपका किसी योजना से पाला पड़ा है तो अपने अनुभव के आधार इस सूची में उसे भी जोड़ सकते हैं। इन योजनाओं में जो खामियां हैं उन्हें दूर किया जाना चाहिए।

चौथा, आधार का दायरा जो जरूरत से ज्यादा फैला दिया गया है, उसे बदला जाना चाहिए। आधार कानून सरकार को सिर्फ ‘अनुदानों, लाभों और सेवाओं’ के हस्तांतरण के लिए अधिकृत करता है। सरकार ने तो इसके दायरे को जरूरत से ज्यादा फैला दिया, कई कामों के लिए इसे जरूरी बना दिया और इसके नाम पर लोगों का निजी डाटा जमा कर लिया। गैरकानूनी रूप से जो डाटा जमा किया गया है उसे खत्म किया जाना चाहिए। इसे कैसे खत्म किया जा सकता है, यह एक सवाल है, जिसका जवाब अगली सरकार को देना होगा।

ईवीएम बनाम मतपत्र
और आखिर में, ऐसे सजग नागरिक हैं, जो इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) की विदाई और मतपत्र प्रणाली की वापसी चाहते हैं। दूसरी ओर, निर्वाचन आयोग और सरकार को ईवीएम पर अटूट भरोसा है। मैं ईवीएम का समर्थक इसलिए हूं, क्योंकि वैध मतदान के लिए यह सबसे आसान है, लेकिन जिस बड़ी संख्या में इन मशीनों को लेकर गड़बड़ी की घटनाएं सामने आर्इं, उन्होंने मुझे हैरान कर दिया। इसी के बाद में वीवीपैट की बात की थी। अब, (हर विधानसभा क्षेत्र में) एक ईवीएम और एक वीवीपैट का मिलान किया जा रहा है। औसत रूप से एक निर्वाचन क्षेत्र में ढाई सौ से तीन सौ मतदान केंद्र होते हैं। इसलिए इलैक्ट्रॉनिक यूनिटों में गड़बड़ी का पता लगने की संभावना एक फीसद से भी कम होती है। इसलिए मैंने यह कहा था कि हरेक ईवीएम में मतों की गणना का मिलान वीवीपैट पर्चियों से किया जाना चाहिए। इसके पीछे मतगणना और नतीजों में देरी का जो तर्क दिया गया, वह कमजोर है। अगर नतीजे आने में तीन-चार घंटे देरी हो भी जाती है तो इससे कुछ नहीं बिगड़ने वाला, बल्कि इससे ईवीएम में लोगों का जो भरोसा बनेगा, वह कहीं बड़ा हासिल होगा।

मुझे पक्का भरोसा था कि मेरे और अन्यों का सुझाव मतपत्र प्रणाली की वापसी की मांग करने वालों के लिए संतोषजनक जवाब होगा, लेकिन मेरा उत्साह तब ठंडा पड़ गया जब मैंने एक अखबार (द हिंदू, 22 जनवरी, 2019) में जी. संपत का इस बारे में तर्क पढ़ा। लेखक के अनुसार, मतपत्र प्रणाली मत, गोपनीय मतपत्र और प्रत्यक्ष मतगणना के तीन परीक्षणों को ही संतुष्ट करेगी। ईवीएम-वीवीपैट प्रणाली इन तीनों ही परीक्षणों के मामले में खरी नहीं उतरती, जैसा कि जर्मनी की एक संवैधानिक अदालत ने अपने फैसले में यह बात कही है। लेखक या जर्मनी की अदालत से असहमति व्यक्त कर पाना मुश्किल है। इसलिए जब मैं यह नहीं कह सकता कि ईवीएम को हटाया जाए, तो हमें यह मांग करनी चाहिए कि सभी मतदान केंद्रों पर ईवीएम और वीवीपैट पर्चियों का मिलान किया जाए। अगर हम इस गंभीर संकट से अपने को बचा पाए, तो शायद हम तालाब से पानी पी सकते हैं।

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