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दूसरी नज़र: अर्थव्यवस्था से बेपरवाह सरकार

करीब साढ़े ग्यारह सौ किलोमीटर दूर मुंबई महानगर जो आरबीआइ, सेबी, शेयर बाजारों, कई सूचीबद्ध कंपनियों के कारपोरेट मुख्यालयों और बैंकों का शहर है, में सिर्फ एक बात को लेकर ही चर्चा होती है- पैसा या इसकी कमी के बारे में।

पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम

राष्ट्रपति भवन सरकारी सत्ता का प्रतीक है। संसद के एक किलोमीटर के दायरे में प्रधानमंत्री कार्यालय, नॉर्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक हैं, जिनमें गृह, वित्त, रक्षा और विदेश मंत्रालय हैं। प्रधानमंत्री का सरकारी आवास भी इस एक किलोमीटर के दायरे में है जैसे कि उपराष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष, तीनों रक्षा प्रमुखों और ज्यादातर सांसदों के सरकारी आवास हैं।

कई तरह की चर्चाएं
सत्ता के इस घेरे में चर्चा क्या होती है? जम्मू-कश्मीर के विभाजन के बारे में, दोनों सदनों में विवादास्पद विधेयकों को पारित कराने, क्षेत्रीय सत्तारूढ़ दलों के हथियार डाल देने, नरेंद्र मोदी के दबदबे, कांग्रेस पार्टी में नेतृत्व का मुश्किल से निपटा मुद्दा और सुषमा स्वराज का दुखद निधन। अर्थव्यवस्था को छोड़ कर बाकी हर तरह की बातें होती हैं।

केंद्र से अगर बमुश्किल पचास किलोमीटर दूर हर दिशा में निकल कर देखें तो हर गांव और पड़ोस के हर गरीब शहरी इलाके में होने वाली बातचीत और चर्चाएं एकदम अलग ही होंगी और ये मुख्यरूप से अर्थव्यवस्था को लेकर ही होंगी, जिसमें वास्तविक मजदूरी और आमद में ठहराव या गिरावट, कामगारों की छंटनी, रोजगार की तलाश, बाढ़ और सूखे से होने वाली मौतें और नुकसान, पानी और बिजली की कमी का संकट और असमानता व मुश्किल हालात वाली दुनिया में जीने के लिए संघर्ष जैसी समस्याएं हैं।

करीब साढ़े ग्यारह सौ किलोमीटर दूर मुंबई महानगर जो आरबीआइ, सेबी, शेयर बाजारों, कई सूचीबद्ध कंपनियों के कारपोरेट मुख्यालयों और बैंकों का शहर है, में सिर्फ एक बात को लेकर ही चर्चा होती है- पैसा या इसकी कमी के बारे में। ये चर्चाएं बीएसई और एनएसई के सूचकांकों में भारी गिरावट, रुपए के अवमूल्यन, बांड्स पर बढ़ते प्रतिफल, सरकारी क्षेत्रों के बैंकों के बढ़ते घाटे, कठोर करों (और भारी-भरकम अधिकारों वाले कर अफसरों), विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों द्वारा हाथ खींचने और कैफे कॉफी डे के प्रमोटर वीजी सिद्धार्थ की आत्महत्या के बारे में होती हैं।

बेफिक्र सरकार
मेरे विचार से एक जिम्मेदार सरकार सबसे ज्यादा ध्यान कामकाजी लोगों और गरीबों के बीच होने वाली चर्चा पर देगी। कामकाजी तबके दूसरी चिंताओं को साझा कर सकते हैं और यहां तक कि वोट भी लोकप्रिय अवधारणाओं के मुताबिक ही देते हैं, लेकिन उनकी उम्मीद सिर्फ जिस एक चीज में होती है, वह है अर्थव्यवस्था। दुर्भाग्य से, ऐसा लगता है कि अर्थव्यवस्था सरकार की चिंताओं का सबसे आखिरी विषय है जिसे सरकार अपने जम्मू-कश्मीर अभियान की सफलता के बाद बमुश्किल छिपा पा रही है।

यहां अर्थव्यवस्था की एक झलक पेश है-
1- जीडीपी की वृद्धि दर लगातार गिर रही है। पूरे वर्ष के लिए 6.8 फीसद और 2018-19 की आखिरी तिमाही में 5.8 फीसद रहने के बाद 2019-20 की पहली तिमाही उम्मीदों से भरी नजर नहीं आती। आरबीआइ और अन्य 2019-20 के लिए अनुमान घटा कर 6.9 फीसद कर चुके हैं। इसलिए हम सौभाग्यशाली होंगे, अगर पहली तिमाही में भी 5.8 फीसद की वृद्धि दर देखने को मिल जाए।
2- प्रमुख क्षेत्र की वृद्धि दर पचास महीने में सबसे कम स्तर यानी 0.2 फीसद पर आ गई है। सभी विनिर्माण क्षेत्रों में क्षमता उपयोग औसत यानी सत्तर फीसद से कम है।
3- रुपया इस वक्त एशिया की सबसे खराब हालत वाली मुद्रा बन गया है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अगस्त में यह 3.4 फीसद तक गिर चुका है।
4- जून 2019 में समाप्त तिमाही में नई परियोजनाओं (निजी और सरकारी) में निवेश पिछले पंद्रह साल में सबसे कम यानी 71,337 करोड़ रुपए रहा। इस तिमाही में पूरी हुई परियोजनाओं का मूल्य गिर कर पांच साल के न्यूनतम स्तर यानी 64,494 करोड़ रुपए पर आ गया। अप्रैल-जून 2019 में रेलवे को कोयला, सीमेंट, पेट्रोलियम, उर्वरक, लौह अयस्क आदि की ढुलाई से जो कमाई हुई उसमें सिर्फ 2.7 फीसद का ही इजाफा हुआ, जो पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले 6.4 फीसद कम है।
5- इस साल अप्रैल से जुलाई के बीच निर्यात (कारोबारी और सेवाएं) 3.13 फीसद ही बढ़ा है, जो पिछली अवधि में भी यही था, जबकि आयात में 0.45 फीसद की गिरावट आई है, जो अर्थव्यवस्था की निराशाजनक हालत को बताता है।
6- खपत में जैसी कमी आई है वैसी पहले कभी नहीं रही। 2019-20 की पहली तिमाही में कारों की बिक्री 23.3 फीसद, दुपहिया वाहनों की 11.7 फीसद, व्यावसायिक वाहनों की साढ़े नौ फीसद घट गई। ट्रैक्टरों की बिक्री में 14.1 फीसद की कमी आई है। जुलाई में हालत सबसे खराब रही। उद्योग संगठनों- सियाम और फाडा ने दो लाख तीस हजार नौकरियां जाने की बात कही है। इसके अलावा दो सौ छियासी डीलर अपना कारोबार बंद कर चुके हैं। मार्च 2019 के अंत तक निर्माण उद्योग में बारह लाख अस्सी हजार फ्लैट बिना बिके पड़े थे।
7- त्वरित उपभोग वाली वस्तुओं (एफएमसीजी) की खपत भी संतोषप्रद नहीं रही। हिंदुस्तान लीवर, डाबर, ब्रिटानिया इंडस्ट्रीज और एशियन पेंट्स सहित कई कंपनियों की कुल कारोबारी वृद्धि इस साल की पहली तिमाही में आधी रह गई या पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले कम रही।
8- थोक मूल्य सूचकांक जुलाई में 1.08 फीसद था। इस सूचकांक में विनिर्माण क्षेत्र की मुद्रास्फीति 0.3 फीसद रही। ये अच्छे संकेत नहीं हैं। ये मांग में गिरावट को बताते हैं।
9- मौजूदा वित्त वर्ष (2019-20) की पहली तिमाही में केंद्र सरकार का सकल कर राजस्व 1.4 फीसद ही बढ़ा है जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 22.1 फीसद रहा था। यह हमें बताता है कि कारपोरेट और वैयक्तिक आय में कमी आ रही है और खर्च में भी गिरावट आ रही है।

योजना है कहां?
हम अर्थव्यवस्था को चलाने वाले इन चार प्रमुख कारकों के मंत्र पर लौटते हैं- सरकारी खर्च, निजी निवेश, निजी खपत और निर्यात। स्पष्ट है, इनमें से कोई भी कारक गति नहीं पकड़ पा रहा है और इससे अर्थव्यवस्था को भी रफ्तार नहीं मिल पा रही है। कई लोग (जिनमें मशहूर अर्थशास्त्री भी हैं) कई बार यह कह भी चुके हैं, लेकिन सरकार सुनने की इच्छुक ही नहीं है, न समझना चाहती है न कोई कदम उठाना चाहती है। अर्थव्यवस्था एक ऐसा क्षेत्र है, जिसमें बाहुबल वाला राष्ट्रवाद काम नहीं करेगा। इसके उलट, यह अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने का काम कर सकता है।

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