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दूसरी नज़र: घायल है भारत की आत्मा

इन कदमों के पीछे जो इरादा है, वह मुसलमानों को इस बात का स्पष्ट संदेश देना है कि वे इस देश के समान नागरिक नहीं हैं। ये कदम गोलवलकर-सावरकर के ‘भारत एक हिंदू राष्ट्र’ के सिद्धांत को दोहराते हैं।

CAB, CAB news, CAB in india, citizenship amendment bill, citizenship bill, citizenship amendment bill 2019, assam, tripura, amit shah, police, teargas, police lathicharge, news in india, india news, news in hindiसीएबी को लेकर विरोध कम होने का नाम नहीं ले रहा है। (फोटोःपीटीआई)

नकाब उतर चुका है और पंजे दिखने लगे हैं। हिंदू राष्ट्र का अभियान रफ्तार पकड़ता जा रहा है। इसके इंजन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं और इसके मोर्चे पर गृहमंत्री अमित शाह हैं। इसका डिजाइनर-इंजीनियर आरएसएस है, जो बड़े मजे से अब इसे देख रहा है।

मुसलमानों को दो टूक संदेश
आश्चर्य सिर्फ इस बात का है कि चुनाव में जोरदार जीत के बाद भाजपा तेजी से अपने एजंडे को बढ़ाती जा रही है, जैसे- तीन तलाक का अपराधीकरण, असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी), संविधान के अनुच्छेद 370 को खारिज कर देना, और अब नागरिकता (संशोधन) विधेयक को पास करा लेना। ये सब हिंदू राष्ट्र परियोजना को आगे बढ़ाने की विस्तृत योजना का हिस्सा हैं। इन कदमों के पीछे जो इरादा है, वह मुसलमानों को इस बात का स्पष्ट संदेश देना है कि वे इस देश के समान नागरिक नहीं हैं। ये कदम गोलवलकर-सावरकर के ‘भारत एक हिंदू राष्ट्र’ के सिद्धांत को दोहराते हैं।

नागरिकता कानून, 1955 जन्म से नागरिकता, वंश से नागरिकता, पंजीकरण से नागरिकता, नागरिकता प्रदान करके नागरिकता, और क्षेत्र के विलय से नागरिकता को मान्यता प्रदान करता है। भारत में रह रहे बाकी दूसरे लोग ‘अवैध प्रवासी’ होंगे। विदेशी नागरिक कानून, 1946 और पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) कानून, 1920 इन पर लागू होगा और ये लोग निष्कासित किए जा सकेंगे। किसी व्यक्ति का धर्म चाहे वह नागरिक हो या अवैध प्रवासी, भारतीय नागरिकता की अवधारणा के प्रतिकूल है। नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2019 के पारित हो जाने के बाद ये सब बदल गए हैं। विधेयक संदिग्ध है। कई अध्येताओं और पूर्व जजों ने अपनी राय व्यक्त करते हुए इसे असंवैधानिक बताया है।

सवाल कई, जवाब कोई नहीं
यह विधेयक किसलिए है? यह तीन देशों- अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान को चुनता है। यह छह ‘अल्पसंख्यक समुदायों’- हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई को चुनता है। यह मानकर चलता है कि इन तीन देशों में से किसी भी एक देश में इन छह समुदायों में से किसी एक भी समुदाय के व्यक्ति, जिसने 31 दिसंबर, 2014 या इससे पहले भारत में प्रवेश किया था, वह अपने गृह देश में ‘प्रताड़ित’ था और इसलिए कार्यपालिका के आदेश के जरिए उसे विदेशी नागरिक कानून और पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) कानून से छूट प्रदान की जाती है। ऐसा व्यक्ति ‘अवैध प्रवासी’ नहीं होगा।
संक्षेप में इस संशोधन विधेयक ने नागरिकता पाने का नया रास्ता बना दिया है- कार्यकारी व्यवस्था से नागरिकता।
कई सवाल खड़े होते हैं। ये सवाल पूछे गए, लेकिन सरकार के पास इनका कोई जवाब नहीं था-
1- इस विशेष व्यवहार के लिए सिर्फ तीन देशों को क्यों चुना गया और श्रीलंका, म्यांमा, भूटान और नेपाल जैसे पड़ोसी देशों को छोड़ दिया गया?
2- इस विशेष रियायत के लिए सिर्फ छह अल्पसंख्यक समुदायों को ही क्यों चुना गया और दूसरे समुदायों को छोड़ दिया गया, जो अपने गृह देश में भेदभाव के शिकार हैं, क्योंकि वे वहां बहुसंख्यक नहीं हैं, जैसे अहमदिया, हाजरा, बलूच, रोहिंग्या, यहूदी आदि?
3- इब्राहीम धर्म तीन हैं, सिर्फ ईसाई धर्म को ही क्यों शामिल किया गया, यहूदी धर्म और इस्लाम को क्यों छोड़ दिया गया?
4- हिंदुओं को क्यों शामिल किया गया, और क्यों श्रीलंकाई हिंदुओं को बाहर कर दिया गया? क्यों ईसाइयों को शामिल किया, लेकिन भूटान के ईसाइयों को छोड़ दिया गया?
5- विधेयक का आधार धार्मिक उत्पीड़न है। लेकिन जो लोग भाषायी, राजनीतिक, सांस्कृतिक, जातीय आदि आधार पर प्रताड़ित किए जा रहे हैं, उनके बारे में क्या है? गृह युद्ध का उत्पीड़न झेलने वालों के बारे में क्या है?
6- निर्धारित तिथि 31 दिसंबर, 2914 ही क्यों रखी गई? असम समझौते में रखी गई निर्धारित तारीख 25 मार्च, 1971 पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है? क्या 25 मार्च, 1971 वाली निर्धारित तिथि को खारिज कर दिया गया है?
7- संविधान की छठी अनुसूची में शामिल असम, मेघालय, मिजोरम या त्रिपुरा के आदिवासी इलाकों और बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर रेग्यूलेशन, 1873 के तहत अधिसूचित ‘द इनर लाइन’ के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों को संशोधित कानून के प्रावधानों से छूट देने का मकसद क्या है? इस छूट के नतीजे क्या होंगे?
8- क्या सीएबी और एनआरसी एक दूसरे से जुड़े हुए नहीं हैं? किसे पहले लागू किया जाएगा, सीएबी को या फिर एनआरसी को?
9- जो लोग ये दावा करेंगे कि वे भारत में पैदा हुए हैं या 25 मार्च, 1971 के पहले भारत में आए हैं, क्या अब उनको कहानी बदलनी पड़ेगी और यह दावा कि वे अपने गृह देश में धार्मिक उत्पीड़न के शिकार थे? कौन-सा दावा झूठ होगा और कौनसा सही?

मुसलमानों को छोड़ने के नतीजे
अगर सीएबी और एनआरसी दोनों लागू हो जाएंगे तो एनआरसी के तहत बाहर किए गए गैर-मुसलिम सीएबी के तहत शामिल कर लिए जाएंगे। कुल मिलाकर नतीजा यह होगा कि सिर्फ मुसलमान अवैध प्रवासियों के तौर पर पहचाने जाएंगे और उन्हें बाहर किया जाएगा। इसके नतीजे बहुत ही डरावने होंगे। एक बार बाहर किए जाने के बाद सरकार को निकाले गए लोगों को हिरासत केंद्रों में तब तक रखना होगा जब तक कि कोई देश या संबंधित देश उन्हें स्वीकार करने के लिए सहमत नहीं हो जाते। ये हिरासत शिविर कहां बनाए जाएंगे और ऐसे कितने शिविरों की जरूरत पड़ेगी? क्या ‘अवैध प्रवासी’ अपनी बाकी जिंदगी तक इन शिविरों में गुजारेंगे? उनके बच्चों की कानूनी स्थिति क्या होगी?

इसके अलावा भारत और विदेशों में इसके सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक नतीजे भी होंगे, लाखों मुसलमान अनिश्चित काल के लिए बंदी बन कर शिविरों में कैद हो जाएंगे। और भारत में इस सफाए का असर यह होगा कि श्रीलंका, म्यांमा और पाकिस्तान में रह रहे हिंदुओं पर देश छोड़ने के लिए दबाव बढ़ेगा। यह स्पष्ट था कि सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 और मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा के संदर्भ में जांचे जाने पर सीएबी की संवैधानिक वैधता पर सोच-समझ कर विचार नहीं किया। असम और पूर्वोत्तर के राज्यों में हिंसक प्रदर्शन शुरू हो चुके हैं। देश की आबादी का बड़ा हिस्सा, जिनमें सबसे ज्यादा हिंदू हैं, वे भी प्रदर्शन में शामिल हो गए हैं। सीएबी और चारों ओर भड़की अशांति से उपजे सवालों के बावजूद संसद ने कार्यपालिका के साथ मिल कर इस असंवैधानिक विधेयक को पास करा लिया। अब समानता और संवैधानिक नैतिकता की बहाली का काम न्यायपालिका के पाले में जाएगा।

 

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