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चर्चा: संभावनाओं का आकाश

वेब शृंखला की फिल्में किस रूप में मनोरंजन की दुनिया और समाज को प्रभावित कर रही हैं, इस बार की चर्चा इसी पर।

Author Published on: February 9, 2020 1:35 AM
कंपनी ने अनुराग कश्यप के साथ इसी तरह की भारतीय वेब शृंखला बनाने का करार किया।

वेब शृंखला के इतिहास में 28 अगस्त, 2015 का दिन हमेशा याद किया जाएगा। उस दिन दुनिया की सबसे बड़ी ओटीटी (ओवर द टॉप) कंपनी नेटफ्लिक्स ने अपनी सबसे चर्चित वेब शृंखला ‘कार्लोस’ का पहला खंड जारी किया। यह सुपरहिट साबित हुआ और देखते-देखते नेटफ्लिक्स कंपनी सातवें आसमान पर पहुंच गई। इस शृंखला का आखिरी खंड एक सितंबर, 2017 को प्रसारित हुआ। कोलंबिया के ड्रग माफिया पाब्लो एस्कोबार के उत्थान और पतन की दिलचस्प कहानी को दुनिया भर के दर्शकों ने बेहद पसंद किया। अस्सी के दशक में कहा जाता था कि कोलंबिया में जितना टेलकम पाउडर नहीं है उससे अधिक मादक पदार्थ पाब्लो एस्कोबार के तलघर में हैं। पाब्लो एस्कोबार कोलंबिया का राष्ट्रपति होते-होते रह गया, क्योंकि उसके दुश्मनों ने मीडिया में उसकी एक पुरानी तस्वीर जारी कर दी, जिसमें उसे एक संगीन जुर्म में सजायाफ्ता दिखाया गया था। नेटफ्लिक्स की दूसरी वेब शृंखला ‘हाउस ऑफ कार्ड्स’ और ‘औरेंज इज द न्यू ब्लैक’ आदि ने तो इस कंपनी को दुनिया भर में सिरमौर बना दिया।

जब जनवरी 2016 में नेटफ्लिक्स कंपनी भारत आई, तो उसे कार्लोस जैसी भारतीय वेब शृंखला की तलाश थी। कंपनी ने अनुराग कश्यप के साथ इसी तरह की भारतीय वेब शृंखला बनाने का करार किया। अनुराग कश्यप और उनकी मित्र मंडली के पास कोई मौलिक पटकथा तैयार करने का न तो समय था, न ही सामर्थ्य। उन्हें विक्रम चंद्रा की किताब मिली ‘सेक्रेट गेम्स’ जिसके नायक गायतोंडे का उत्थान-पतन कार्लोस के नायक पाब्लो एस्कोबार से मिलता-जुलता था। चूंकि भ्रष्टाचार, धोखा और कामचोरी बॉलीवुड के डीएनए में है, इसलिए भारत में ‘सेक्रेट गेम्स सीजन 2’ बुरी तरह पिट गया और नेटफ्लिक्स ने आगे की दर्जनों वेब शृंखला परियोजनाओं पर ताला लगा दिया।

इस समय भारत में लगभग चालीस ओटीटी मंच हैं, जो वेब शृंखला के व्यवसाय में हैं और बहुत जल्द इनकी संख्या सैकड़ों में होने वाली है। नेटफ्लिक्स और एमेजॉन प्राइम के पास निवेश करने के लिए बेशुमार दौलत है और घाटा उठाने का साहस भी, इसलिए ये दोनों कंपनियां इस इलाके में सबसे आगे हैं और ताकतवर भी। एमएक्स प्लेयर, जी 5, उल्लू, हॉट स्टार, आल्ट बालाजी, टीवीएफ, सोनी लिव, एप्पल टीवी तो सक्रिय हैं ही, फ्लिप कार्ट और रिलायंस जियो भी आने वाले हैं। भारत में वेब शृंखला का यह नया दौर है। अधिकांश निर्माता इसलिए पैसा लगा रहे हैं कि भविष्य में उन्हें भारी मुनाफे की उम्मीद है। पर अभी तो ऐसा लगता है कि हर कोई वेब शृंखला करने में लगा हुआ है।

भारत में वेब शृंखला की शुरुआत की कहानी थोड़ी दूसरी है। आइआइटी खडगपुर ग्रेजुएट अरुणाभ कुमार ने यूट्यूब पर 2012 में टीवीएफ (द वायरल फीवर) चैनल खोला। अपने कुछ आईआईटी ग्रेजुएट दोस्तों के साथ शार्ट फिल्में, न्यूज गैग्स बनाना शुरू किया। फिर 2014 में टीवीएफ ने पहली हिंदुस्तानी वेब शृंखला बनाई ‘परमानेंट रूममेट्स’, नए चेहरे सुमित व्यास और निधि सिंह को लेकर। यह युवाओं और टीवी धारावाहिक न देखने वालों के बीच बहुत चर्चित हुआ। फिर इस शृंखला का दूसरा सीजन 2016 में आया, वह भी कामयाब रहा। 2015 में टीवीएफ अपनी दूसरी वेब शृंखला लेकर आया ‘पिचर’, जिसमें प्रोफेशनल लड़के कॉरपोरेट और इंजीनियरिंग की नौकरी छोड़ कर अपना स्टार्ट-अप शुरू करना चाहते हैं। ‘पिचर’ भी बहुत कामयाब रही। इसके बाद हिंदुस्तान में वेब शृंखला बनाने की होड़ लग गई।

‘शो बिजनेस’ का खेल वहीं हो सकता है जहां दर्शक हों। आज मोबाइल मनोरंजन का सबसे बड़ा परदा बन चुका है। इस उपभोक्ता युग में जब कपड़े, जूते, बर्तन, किताबें सभी आॅनलाइन बिकने लगे हैं, फिर मनोरंजन क्यों नहीं? भारत में टीवी और सिनेमा के बीच की इसी जरूरत से वेब शृंखला की क्रांति आई। मनोरंजन अब दर्शकों के मूड और वक्त पर उपलब्ध है। यात्रा करते, किसी का इंतजार करते, अपने फुर्सत के क्षणों में जब चाहे, जितनी देर चाहे वेब पर मनोरंजन का लुत्फ उठाया जा सकता है। सबसे बड़ी बात कि वेब पोर्टल पर अपनी-अपनी रुचि की अनगिनत शृंखलाएं हैं, दर्शकों के सामने विकल्प है अपनी पसंद की चीजें देखने का।

हिंदुस्तानी फिल्म निर्माताओं के लिए डिजिटल मंच वरदान साबित हुआ है। उनकी रचनात्मक अभिव्यक्ति पर कोई पाबंदी नहीं है। वे जैसे चाहें वैसे अपना मनोरंजन बिना किसी सेंसर के परोस सकते हैं। फिल्म के लिए फिल्म निर्माता को डेढ़ या दो घंटे की फिल्म बनाना लाजमी होता है, वैसे ही धारावाहिक आप बाईस या पैंतालीस मिनट से कम अवधि का नहीं बना सकते। लेकिन वेब शृंखला ने समय का बंधन तोड़ दिया है। दस या पंद्रह मिनट की बेहतरीन लघु फिल्में बनाई जा रही हैं। ‘लस्ट स्टोरीज’, जिसमें अनुराग कश्यप, करन जौहर, जोया अख्तर और दिवाकर बनर्जी ने ऐसी ही चौदह से अठारह मिनट की अलग-अलग ‘शार्ट स्टोरीज’ बना कर एक साथ रिलीज कर दी, जो बहुत सफल रहीं।

अनुराग कश्यप जैसे फिल्म निर्माता को तकलीफ यह रही है कि उनकी ज्यादातर फिल्मों के सैटेलाइट अधिकार नहीं बिकते हैं, क्योंकि ‘बोल्ड कंटेंट’ और गाली-गलौज के कारण उनकी फिल्में टीवी पर दिखाई नहीं जातीं। इसके दो नुकसान हैं। एक, सैटेलाइट अधिकार का पैसा फिल्म निर्माता को नहीं मिल पाता और दूसरा, एक बड़ा दर्शक वर्ग, जो सिर्फ टीवी पर फिल्में देखता है, वह देख नहीं पाता।

डिजिटल आ जाने से अनुराग की फिल्म ‘गैंग्स आॅफ वासेपुर’ के दोनों खंडों की आठ कड़ी में वेब शृंखला जारी होने जा रही है। आज फिल्म निर्माता को जरूरी नहीं है, तीन घंटे की फिल्म बनाना, वह बीस मिनट की दस कड़ी की शृंखला बना सकता है। राजकपूर की फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ के विफल होने की एक वजह थी चार घंटे की अवधि। अगर उस वक्त डिजिटल मंच होता तो दस कड़ी की वेब शृंखला बना कर आर्थिक नुकसान से बचा जा सकता था। डिजिटल मंच का बहुत बड़ा फायदा नए फिल्म निर्माताओं को हुआ है, जो सिर्फ अच्छी विषय-वस्तु वाली बिना स्टार की फिल्में बनाते हैं, जिनको न वितरक मिल पाता है और न ही थिएटर। वे फिल्म निर्माता अपनी फिल्में सीधे डिजिटल मंच पर रिलीज कर देते हैं, जिनको एक बहुत बड़ा दर्शक वर्ग मिल जाता है और साथ-साथ लागत के पैसे भी निकल आते हैं। वेब शृंखला आज के समय की आवाज और जरूरत दोनों है। इसलिए जनवरी 2016 में नेटफ्लिक्स इंडिया में आया और छा गया।

वेब शृंखला मनोरंजन की दुनिया में दर्शकों की आजादी और महारत लेकर आई है। इसने रोजगार के बेशुमार अवसर प्रदान किए हैं। पहले हम वही फिल्में देख पाते थे, जो सिनेमा घरों में जारी होती थीं। उसके बाद टेलीविजन आया और सैकड़ों चैनलों ने हमें देखने के विकल्प दिए। तब भी हमारी निर्भरता प्रसारकों पर बनी हुई थी। आज हमें जो विषय-वस्तु चाहिए, वह मोबाइल पर उपलब्ध है। इसका यह मतलब कतई नहीं है कि सिनेमा घर खत्म हो जाएगा और केवल ओटीटी मंच पर फिल्में रिलीज होंगी। सिनेमा कभी नहीं मर सकता। अंधेरे हॉल में सामूहिक रूप से फिल्म देखने का अनुभव कभी भी मोबाइल स्मार्ट फोन नहीं दे सकता, चाहे वह तकनीकी रूप से कितना ही समृद्ध हो जाए।

अजित राय

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