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दूसरी नजरः वे जो पीछे छूट गए

भारत में दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति है। 182 मीटर ऊंची इस मूर्ति को चीनी उत्पादों और मजदूरों की मदद से एक भारतीय ने गढ़ा और खड़ा किया है। इसकी अनुमानित लागत तीन हजार करोड़ रुपए है और इस धारणा के विपरीत कि इसके लिए राज्य सरकार ने पैसा दिया है, इसकी लागत का पूरा खर्च सार्वजनिक क्षेत्र के केंद्रीय उपक्रमों ने उठाया है।

Author November 11, 2018 5:02 AM
स्टैच्यू ऑफ यूनिटी (PTI Photo)

भारत में दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति है। 182 मीटर ऊंची इस मूर्ति को चीनी उत्पादों और मजदूरों की मदद से एक भारतीय ने गढ़ा और खड़ा किया है। इसकी अनुमानित लागत तीन हजार करोड़ रुपए है और इस धारणा के विपरीत कि इसके लिए राज्य सरकार ने पैसा दिया है, इसकी लागत का पूरा खर्च सार्वजनिक क्षेत्र के केंद्रीय उपक्रमों ने उठाया है। महात्मा गांधी के सिपहसालार, जीवनपर्यंत कांग्रेसी, जवाहरलाल नेहरू के सहयोगी और प्रखर देशभक्त, और एक रूढ़िवादी राष्ट्रवादी सरदार वल्लभ भाई पटेल की मूर्ति बनने से मैं खुश हूं। जब तक वे जीवित रहे, उन्होंने महात्मा गांधी की हत्या करने वाले उन्मादियों को कभी माफ नहीं किया (बतौर गृहमंत्री उन्होंने आरएसएस पर सत्रह महीने का प्रतिबंध भी लगाया था), लेकिन आरएसएस और भाजपा दोनों ने ही पाया है कि इतिहास के इस अध्याय को भूल जाने में ही समझदारी है। हम कुछ पलों के लिए उत्सव मना सकते हैं, पर उस क्षण के बीत जाने के बाद हमें हर हाल में दुनियादारी के मुद्दों पर लौटना चाहिए।

डरावने तथ्य
भारत कुछ अन्य मामलों में भी ‘ऊंचाई’ पर आसीन है।
अंतरराष्ट्रीय भुखमरी सूचकांक में भारत एक सौ तीनवें नंबर पर है जो भुखमरी की गंभीर स्थिति की ओर स्पष्ट इशारा है। इस सूचकांक में सिर्फ सोलह देश हमसे ऊपर हैं (मतलब हमसे भी खराब)।
लैंगिक असमानता सूचकांक में कुल एक सौ अट्ठासी देशों में भारत का स्थान एक सौ पचीसवां है।
आर्थिक स्वतंत्रता सूचकांक में एक सौ अस्सी देशों में भारत का स्थान एक सौ तीसवां है।
मानव विकास सूचकांक में कुल एक सौ नवासी देशों में हमारा स्थान एक सौ तीसवां है। भारत तीसरे पायदान के देशों में है।
प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में एक सौ अस्सी देशों में हमारा स्थान एक सौ अड़तीसवां है।
प्रति व्यक्ति जीडीपी के मामले में भारत एक सौ अट्ठासी देशों में एक सौ चालीसवें पर है। यहां भी हम सबसे नीचे तीसरे पायदान के देशों में हैं। शिक्षा सूचकांक में स्थिति और बुरी है : कुल एक सौ इक्यानबे देशों में हम एक सौ पैंतालीसवें नंबर पर हैं।
हम इस बात से संतुष्ट हो सकते हैं कि अधिकतम एक सौ इक्यानबे देशों में सर्वेक्षणों के बाद बनाए गए किसी भी सूचकांक में हम एक सौ बयासी की ‘ऊंचाई’ पर नहीं पहुंच पाए। यद्यपि सूचकांक में 103, 125, 130, 138, 140 और 145 पर होना कोई ऐसी संख्या नहीं है, जिसे हम संदेहास्पद आंकड़ों का हवाला देकर हल्के में खारिज कर दें। सूचकांक में हमारा क्रम या स्थिति हमें क्या बताते हैं? यह कि देश की ऊंची वृद्धि दर और आर्थिक क्षेत्र में अच्छी खासी उपलब्धियां और प्रगति भी आबादी के एक खासे बड़े हिस्से को अतिशय गरीबी से बाहर निकाल पाने में विफल रही है। हम इसकी संख्या या आकार पर बहस कर सकते हैं लेकिन अगर इसे बीस फीसद भी माना जाए तो इसका मतलब है कि पच्चीस करोड़ लोग पीछे छूट गए हैं। गरीबी यद्यपि हर धर्म, जाति और समुदाय में है, पर इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता है कि इस पच्चीस करोड़ अति निर्धनों में अधिकतर संख्या दलितों, आदिवासियों, अति पिछड़ी जातियों, अल्पसंख्यकों और दिव्यांगों की है।

अनाड़ी सरकार
सामाजिक और राजनीतिक स्थितियों ने गरीबी को और बुरी शक्ल दे दी है। हमें स्कूली ढांचे, शिक्षकों और पढ़ाई के तरीकों को लेकर चिंतित होना चाहिए। हम चिकित्सकों, नर्सों, पैरा मेडिकल स्टाफ और तकनीशियनों की गंभीर कमी का सामना कर रहे हैं। उदारीकरण के बावजूद, अब भी बहुत सारे नियंत्रण हैं, नियामक ही नियंत्रक बनते जा रहे हैं। दखलंदाजी वाले कानूनों, करों की ऊंची दर, फायदा लेकर अनुचित लाभ पहुंचाना और निरीक्षकों तथा जांचकर्ताओं के पास दंडात्मक शक्तियों- जैसी चीजों के जरिए सरकार की सख्ती ने उद्यमिता को हतोत्साहित किया है। लैंगिक असमानता महिलाओं को अवसरों से वंचित करती है और आर्थिक वृद्धि पर बुरा असर डालती है। मीडिया जगत में भय का माहौल है। ये बुराइयां हमेशा से ही रही हैं, लेकिन राजनीतिक और सामाजिक माहौल के दिनोंदिन बेहतर और अधिक स्वतंत्र होते जाने के बजाय ये चार वर्ष बढ़ती असहिष्णुता, कानून का डर खत्म होने, भीड़ की हिंसा, भय और घृणा के प्रसार के साक्षी रहे हैं- और सरकार तमाशबीन है।
सबसे बड़ी निराशा संसद और विधायिका के चलने- या कहें कि न चलने- को लेकर है। संसद के प्रति कार्यपालिका का बर्ताव तिरस्कार का है। नतीजे में कार्यपालिका की ज्यादतियां और अकर्मण्यता दोनों ही भरपूर बढ़ी हैं। इस विधायी-प्रशासकीय शून्यता को भरने के लिए अदालत आगे आई और उसने न्यायपालिका के प्राधिकार को खासा विस्तारित कर दिया है। ऐसा प्रतीत होता है कि मुक्त अर्थव्यवस्था और सुव्यवस्थित बाजार में भरोसा कम ही है। मेरी राय में उदारवाद की सुई घड़ी के तीन बजे पर पहुंचा दी गई है और शायद इसे बारह बजे तक भी पहुंचा दिया जाए। इसमें घाटे में अर्थव्यवस्था रहेगी लेकिन इससे भी ज्यादा घाटा पीछे छूट गए उन लोगों का होगा जो अब काफी पीछे रहेंगे। एक आंकड़ा आंख खोलने वाला है : इस देश में औसत मासिक घरेलू आय 16480 रुपए है। आप उन परिवारों की गरीबी और दुर्दशा की कल्पना कर सकते हैं, जो इस औसत आंकड़े से नीचे या अत्यधिक नीचे हैं।

ताकि हम उन्हें भूल न जाएं
यह बहस पुरानी है कि सरकारी संसाधनों पर पहला अधिकार किसका है। धर्म, जाति, लिंग या दिव्यांगता के आधार पर दावे किए जाते हैं। मेरी राय में, इनमें कोई भी प्रासंगिक नहीं है। सरकार के संसाधनों पर सबसे पहला अधिकार उस बीस फीसद आबादी का है जो पीछे छूट गई है।
गरीबी, जिसे कि हम सामान्य अर्थ में समझते हैं, आय की गरीबी है; यद्यपि आय की यह गरीबी-भोजन, आवास, पानी, रोजगार, अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य- व तमाम अन्य वंचनाओं का भी कारण बनती है। इससे आगे, जब तक सबसे नीचे के बीस फीसद लोगों के पास पर्याप्त आमदनी नहीं होती, वे प्रतिकूल सामाजिक और राजनीतिक माहौल के शिकार बने रहेंगे। इसलिए, हमें सरकार या शासन प्रणाली पर नए सिरे से विचार करना होगा, बजट बनाने के सिद्धांतों को पुनर्लेखित करना होगा और उस माडल तथा प्रणाली को बदलना होगा जिसके जरिए सरकार अपनी योजनाओं के लाभ लोगों तक पहुंचाती है।
‘पीछे छूट गए लोग’ पिछले चार साल में सरकार के कुशासन से पूरी तरह उकता गए हैं और फिलहाल घटित हो रही चीजों और वादों से भौंचक्के हैं- भव्य मंदिर का निर्माण, शहरों के नाम बदलना और नई योजनाओं का एलान जिनके पास न पर्याप्त बजट है न फंड। किसी भी वादे का असली इम्तहान यह है कि वह पिरामिड में सबसे नीचे के लोगों के जीवन में क्या बदलाव ला सकती है।

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