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बाखबर: सिंघम न्याय

जब अपने नामी सांसद संसद में ऐसे अपराधियों को ‘लिंच करो’, चौराहे पर ‘लटका दो’ की मांग करेंगे और अपने चैनल बिना आलोचना के उनको दिन-रात बजाएंगे, तो फिर कानून क्या करेगा? तब तो इसी तरह के ‘सिंघम न्याय’ की जयकार होगी!

hyderabad encounterएनकाउंटर वाली जगह मौजूद हैदराबाद पुलिस फोटो- एएनआई

सुधीस पचौरी

एक चैनल का एक एंकर एक हाथ में प्याज, एक में गनमाइक लेकर खान मार्केट में खड़े-खड़े पूछता फिरता है प्याज की महंगाई का राज! उधर दूसरे चैनल में प्याज के बढ़ती कीमतों को देख-देख कर दूसरे एंकर भैया जी भाजपा के प्रवक्ता के प्याज का तुलनात्मक अध्ययन करने की ढिठाई पर सात्विक क्रोध से भर कर बरस पड़ते हैं। प्रवक्ता कहने लगता है कि सन 2013 में यूपीए के शासन में भी तो प्याज के दाम बढ़े थे। यानी कि अब बढ़े हैं तो क्यों रोते हो! इस बेशर्मी को देख भैया जी धिक्कारते हुए चीखने लगते हैं कि आप लोग संसद में ‘हम प्याज नहीं खाते’ कह कर लोगों का अपमान करते हो और यहां बहस में आकर प्याज चर्चा का मजाक बनाते हो! जरा देखो तो : मदुरै में प्याज का दाम है एक सौ अस्सी रुपए किलो और चेन्नई में है डेढ़ सौ रुपए किलो।…

मगर भाजपा में प्रातिभों की कमी कहां? पार्टी को रक्षात्मक देख एक महामहिम जी को तुरत अपने बाह्मणत्व पर गर्व हुआ और बोल उठे कि हम तो ब्राह्मण हैं जी! हम प्याज-लहसुन नहीं खाते! गनीमत कि किसी ने यह न कहा कि जिसे प्याज खानी हो, पाकिस्तान चला जाए! संसद में प्याज पर बहस है। वित्तमंत्री जी कहती हैं कि मैं जिस परिवार से आती हूं उसमें प्याज-लहसुन का कोई मतलब नहीं है।…

इस एक घमंडी किस्म के वाक्य ने चैनलों में तूफान खड़ा कर दिया है। चैनल लाइन मारने लगते हैं : यह ‘एलीटिज्म’ है। दूसरे चैनल ने इसे ‘मेरी अंतोनियत का क्षण’ बताया (मेरी ने फ्रांसीसी क्रांति से पहले, अकाल की मारी फ्रांसीसी जनता को कहा था कि ‘जनता के पास रोटी नहीं तो केक खाए’)! यही नहीं, तिहाड़ से कल ही बाहर आए चिंदबरम भी इस पर एलीटिज्म पर एलीटिस्टी चुटकी लेते हुए कह उठे कि शायद वे ‘एवोकाडो’ (एक अनोखी वनस्पति) खाती हों!

लेकिन इस प्याज-पीड़ित सीजन में पूर्व पीएम मनमोहन सिंह ने पूर्व-पीएम गुजराल को याद करते हुए कह दिया कि अगर 1984 में गृहमंत्री नरसिंह राव ने गुजराल की यह सलाह मान ली होती कि कानून-व्यवस्था के लिए सेना को लगाओ, तो वे ‘मेसेकर’ (जनसंहार) न हुआ होता! इसके बाद तो कई एंकरों की बन आई। जो प्याज पर सरकार पर विफर रहे थे, वे अब मनमोहन सिंह से लेकर राजीव गांधी, सबको ठोकने लगे! एक एंकर ने गुजराल के पुत्र को जुटाया, जिनने कहा कि मनमोहन सिंह ने सच कहा, तो अकाली बोले कि सब राजीव गांधी को बचाने के लिए किया, लेकिन किसी को लगा कि राजीव को ठुकवाने के लिए किया!

एक चैनल पर नरसिंह राव के बेटे ने कहा कि ये राजीव गांधी को बचाने की कोशिश है। तब पीएम तो राजीव ही थे। आश्चर्य कि गुजराल ने राव से कहा, राजीव से नहीं कहा? क्यों? एक एंकर ने वितर्क किया कि गुजराल तो राजीव के बेहद करीबी थे, उनने उनसे न कह कर राव से कहा, यह समझ से परे है। राव का क्या कसूर! पीएम तो राजीव ही थे, तब जिम्मेदार तो वही हुए!
हा हतभाग कांग्रेस! जिस दिन प्याज पर भाजपा संसद में पिट रही थी, मनमोहन की इस टिप्पण के बाद उस शाम कांग्रेस चैनलों में खूब पिटी! एक ट्रक-छाप शायर ने कितना सच कहा है कि :
‘डुबोया मुझको अपनों ने गैरों में कहां दम था
मेरी कश्ती वहीं डूबी जहां पानी कम था!’
इसे कहते हैं ‘पोस्ट-ट्रुथ’! ऐसे ‘उत्तर सत्यवादी हरिश्चंद्र’ हैं हमारे पूर्व पीएम!
बहरहाल, जिस समय मालीवाल राजघाट पर नए और कड़े रेप विरोधी कानून बनवाने के लिए अनशन पर बैठी रहीं और खबरों से लगभग बाहर होने लगीं, तभी उन्नाव की एक रेप-जीविता को दो लोगों ने आग लगा दी! हैदराबाद की रेप-हत्या की नृशंस कहानी पूरी नहीं हुई थी कि उन्नाव ने एक और निष्करुण कहानी चैनलों को दे दी। यहां भी एक आला पुलिस अधिकारी ने फरमाया कि पीड़िता को आग लगाने वाले से प्रेम संबंध थे, लेकिन उसने शादी करने से मना कर दिया, तब पीड़िता ने रेप का आरोप लगाया। इसे कहते हैं ‘पोस्ट-ट्रुथ’ का निर्माण! केस रहा रेप जीविता को आग लगा कर मार देने का और बनाई जाने लगी ‘पोस्ट-ट्रुथीय’ प्रेम कहानी! धिक्कार है!

लेकिन शुक्रवार की सुबह, हैदराबाद की डॉक्टर के रेप और हत्या के बरक्स ‘तुरंता न्याय’ की सबसे मौलिक कहानी वहां की पुलिस ने बनाई। उसने बताया कि हम अपराध की जगह जाकर ‘अपराध के सीन’ की पुनर्रचना कर रहे थे कि एक अपराधी रिवाल्वर छीन कर भागा, तो जवाबी फायर में चारों मारे गए! एक चैनल का रिपोर्टर कुछ इस तरह से बताता रहा मानो ‘एनकाउंटर’ के वक्त वह वहीं मौजूद रहा हो! इस ‘एनकाउंटर’ की खबर देखते-देखते हर चैनल पर छा गई। देर तक कई एंकर इसे ‘जो हुआ सो सही हुआ’ के भाव से बताते रहे! कानून मंत्री बोले कि भगवान ने ‘न्याय’ किया! लोग पुलिस की जयकार करने लगे। उस पर फूल बरसाने लगे! यह कैसा एनकाउंटर था कि मुग्ध होकर जनता फूल बरसाने लगी?

‘सिंघम छाप’ इस ‘तुरंता न्याय’ का जादू चैनलों में ऐसा चला कि न्याय की भाषा फिल्मी हो गई। मायावती बोलीं कि यूपी पुलिस को वहां की पुलिस से प्रेरणा लेनी चाहिए। निर्भया की मां ने कहा कि पुलिस ने नजीर बनाई! रजा मुराद, ऋषि कपूर सबकी यही राय रही! कई एंकर भी पुष्पवर्षकों की तरह ही बोलते रहे।

कई एंकर रिपोर्टर इस कदर ‘तुरंता न्यायवादी’ हुए कि उनके लिए जांच, प्रमाण, कानून, बहस, अदालत और फैसला आदि सब बेकार हो गए! सिर्फ सीपीएम ने दो टूक कहा कि यह ‘एक्स्ट्रा जुडिशियल किलिंग्स’ है। तहसीन पूनावाला ने भी कहा कि ऐसी बातों से न्याय प्रक्रिया पर भरोसा कमजोर होता है! जस्टिस सोधी ने पूछा कि जब वे पुलिस ‘कस्टडी’ में थे ‘एनकांउटर’ कैसे संभव है? जब अपने नामी सांसद संसद में ऐसे अपराधियों को ‘लिंच करो’, चौराहे पर ‘लटका दो’ की मांग करेंगे और अपने चैनल बिना आलोचना के उनको दिन-रात बजाएंगे, तो फिर कानून क्या करेगा? तब तो इसी तरह के ‘सिंघम न्याय’ की जयकार होगी!

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