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बाखबर: साधारण का सौंदर्य

मालूम हुआ कि होने वाले सीएम का घर किसी आम गांव वाले का-सा है, जिसमें खाना धाती पर बैठ कर चूल्हे की आंच पर बनाया जाता है। इस सीएम के बीवी-बच्चे भी सामान्य कपड़ों में ही दिखे।

jharkhandहेमंत सोरेन (फोटो सोर्स: इंडियन एक्सप्रेस)

झारखंड के चुनाव के परिणाम जैसे-जैसे आते दिखे, वैसे-वैसे कइयों के चढ़े हुए तेवर ढीले होते दिखे, लेकिन मजाल कि हारा हुआ अपनी हार स्वीकार करे! टीवी पर कोई भी हारा हुआ नहीं दिखना चाहता! एंकरों ने मजे काटे। कोंच-कोंच कर अपनी सतत जीत का दावा करते प्रवक्ताओं से पूछते रहे कि सरजी, जब जीत का श्रेय उनको देते हैं तो इस हार का श्रेय किसे देंगे? और ऐसे तंग करने वाले सवालों का एक ही प्रकार का अवसरवादी जवाब आता कि वहां ‘लोकल इशूज’ थे, उन्होंने हराया, लेकिन हमारा वोट कमोबेश बराबर का रहा है।

वही, ‘हार नहीं मानूंगा’ वाला वीर भाव! एंकरों ने देर तक आनंद लिया। बार-बार दिखाते रहे कि आज से कुछ पहले तक भाजपा भारत के तीन-चौथाई नक्शे पर काबिज थी, अब एक चौथाई पर सिमट गई। एक एंकर ने अपनी बहस में इस करारी हार पर नमक रगड़ते हुए प्रवक्ताजनों से पूछा कि आप तो कहा करते थे कि आप भारत को कांग्रेसमुक्त बनाने वाले थे, लेकिन ये क्या? कहीं भाजपा-मुक्त भारत तो नहीं होने जा रहा है?

पहली बार नए सीएम का उम्मीदवार किसी साधारण आदमी की तरह कैमरों के आगे आया। जब परिणाम आ रहे थे, तब वह एक मामूली-सा कोट-पैंट पहने वह एक पुरानी साइकिल पर चक्कर काट रहा था। चैनलों ने उसका घर भी दिखाया और मालूम हुआ कि होने वाले सीएम का घर किसी आम गांव वाले का-सा है, जिसमें खाना धाती पर बैठ कर चूल्हे की आंच पर बनाया जाता है। इस सीएम के बीवी-बच्चे भी सामान्य कपड़ों में ही दिखे। सीएम अपने पिता के चरण-स्पर्श करते दिखा।

यह ‘साधारणता का सौंदर्य’ था जो डिजाइनर राजनीति के दिनों में अपनी तरह की सहजता से युक्त था! नागरिकता विरोधी आंदोलन के दो रणबांकुरों की टाइमिंग एकदम सही नजर आई। एक ने बंगलुरु से सीन दिया। एक ने दिल्ली में दिया। बंगलुरु वाले सर जी एक्शन की जगह एक हाथ में आंबेडकर दूसरे में गांधी के चित्र लेकर गए थे और भाषण दे रहे थे कि दुष्ट पुलिस ने उनको खींच लिया और चार-पांच घंटे बाद छोड़ा। शाम तक वे दो अंग्रेजी चैनलों पर राज्य सत्ता की निरंकुशता का विश्लेषण करते दिखे! सर जी, लेनिन ने तो कब का कह दिया था कि ‘स्टेट’ होती ही ‘शासक वर्ग की डिक्टेटरशिप’ है!

दिल्ली वाले सीन की हीरोइन एक अंग्रेजी लेखिका बनीं, जिन्होंने विरोध प्रदर्शन के कुछ ऐसे अद्भुत आइडिया दिए कि नागरिकता विरोधी आंदोलन ही ‘सबवर्ट’ हो गया। उन्होंने कहा कि जब वे आपके पास आएं तो अपना नाम ‘रंगा बिल्ला’ बता दीजिए ‘कुंगफू कुत्ता’ बता दीजिए। अपना पता सात रेसकोर्स दे दीजिए! आसपास खड़े प्रशंसक उनके इस बारीक व्यंग्य पर खूब विहंसे! चैनलों ने उनको जम के दिखाया। कितना सुंदर और सुरक्षित समर्थन कि असली प्रदर्शनकारी कड़ाके ठंड में पूरे-पूरे दिन नारे लगाते हुए खटते रहे और मैडम आर्इं और लाइन दे गर्इं कि कानून का भितरघात करो, यानी झूठ बोलो! क्षमा करें मैडम! सत्याग्रह की जगह आप तो उनको ‘जिम ग्लब’ पहन ‘असत्याग्रह’ सिखा रही हैं!

चैनल इन प्रदर्शनों की व्याख्या को लेकर विभाजित नजर आए! पूरे सात दिन कई अंग्रेजी-हिंदी चैनल प्रदर्शनों को दंगों का पर्याय-सा बताते रहे। कई चैनल बताते रहे कि उनके पास आठ ऐसे वीडियो हैं जो प्रदर्शनकारियों का असली चेहरे का पर्दाफाश करते हैं। वे प्रदर्शन के नाम पर पत्थर मारने, आगजनी करने और गोली चलाने आए थे। ये वीडियो इनके खिलाफ पक्के प्रमाण की तरह हैं। कई एंकर वीडियो की अंगुली के सहारे व्याख्या तक करते नजर आते थे कि ये देखिए… ये है जिसने पिस्तौल निकाली और फायर किया! ऐसे चैनल संपत्ति जब्त करने के जरिए हर्जाना वसूलने की लाइन की सराहना-सी करते दिखे।

लेकिन हमारे देखे दो अंग्रेजी चैनल ऐसे भी रहे, जिन्होंने उन माता-पिता को भी दिखाया, जिनके बच्चे पकड़े गए थे, जिनके कारण संपत्ति जब्त की गई थी। एक चैनल में एक पिता रो-रोकर कहता रहा कि वे आए और हमारे घर को तोड़फोड़ कर चले गए। कुछ न बचा। एक मां रो-रोकर कहती रही कि वे सब कुछ खत्म कर गए। तीन लाख का सोना था, वह भी। जब स्टेट ही बेदर्द हो जाए तो कोई क्या कहे? फिर भी, टीएमसी की तुरंता राजनीति का जबाव नहीं। एक दिन उसने अपने कुछ नेताओं को उत्तर प्रदेश के पीड़ितों से मिलने के लिए भेजा, लेकिन वहां की पुलिस ने हवाईअड्डे पर ही रोक दिया। इसी तरह शुक्रवार की खबर रही कि टीएमसी वाले अब बंगलुरु जाने वाले हैं, ताकि वहां के आंदोलनकारी पीड़ितों से मिल सकें! कल भाजपा वाले ऐसे ही भेजेंगे तो दीदी भी रोकेंगी ही न!

सत्ताइस दिसंबर के शुक्रवार के दिल्ली के कवरेज में ‘शांति कमेटी’ और ‘शांंित की अपील’ पर जोर नजर आया। सीलमपुर की मस्जिद के कवरेज की यही बात खास रही। यों इस शुक्रवार को हिंदी चैनल का रिपोर्टर सुबह से ही जामा मस्जिद आकर किसी बड़ी स्टोरी की तलाश में तैनात हो गया था और जिज्ञासा बढ़ाता जा रहा था कि आज क्या होगा। लेकिन मिग विमानों की पुरानी खेप की वायु सेना से विदाई के समारोह की कहानी ने जामा मस्जिद की कहानी बीच में ही रोक दिया! कई चैनल सरकार की तरह संदेश देते रहे कि कृपया शांति बनाए रखें। एक हिंदी चैनल ने स्क्रीन पर ‘राष्ट्रवाद जिंदाबाद’ ही लिख डाला! टीवी पर कोई भी हारा हुआ नहीं दिखना चाहता! एंकरों ने मजे काटे। कोंच-कोंच कर अपनी सतत जीत का दावा करते प्रवक्ताओं से पूछते रहे कि सरजी, जब जीत का श्रेय उनको देते हैं तो इस हार का श्रेय किसे देंगे?

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