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बाखबर: पार्टी कहां गई!

ऐसे कार्यक्रमों से आत्मबोध हुआ कि जो कारपोरेट अपने नाना ब्रांडों की नाना भांति की कृपा से अब तक पानी का बंटाढार करते रहे, वही गांधी के नाम पर पानी को फिर से साफ करने और जनता को स्वच्छ और स्वस्थ रहने के सबक सिखा रहे हैं!

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सुधीश पचौरी

इस बार का दो अक्तूबर धन्य-धन्य होकर गुजरा। गांधी की एक सौ पचासवीं जयंती का दिन जो था। चैनल पहले ही सावधान कर चुके थे कि इस दिन इतना गांधी-गांधी होगा कि सब गांधी-युक्त हो जाएंगे और भारत खुले में शौच से मुक्त हो जाएगा। और हो भी गया! लेकिन हमारा आश्चर्य कि किसी भी चैनल को ‘मदर इंडिया’ की लेखिका ‘मिस मेयो’ याद नहीं आर्इं, जिन्होंने अंग्रेजों के जमाने में भारत को ‘एक विशाल खुली लेवेटरी’ कहा था और अब जब गांधी की महती प्रेरणा से भारत ‘खुली लेवेटरी’ के आरोप से मुक्त हो गया, तो किसी ने ‘मेयो’ को एक धन्यवाद तक न दिया कि मैडम न आप हमें इस कदर शर्मिंदा करतीं, न हम मुक्त होते।

अफसोस कि अंग्रेजी में नित्य दहाड़ने वाले एंकरों को भी नहीं मालूम दिखा कि मिस मेयो कौन थीं और उनकी किताब ‘मदर इंडिया’ कब आई थी? दैनिक और तुरता भाव से राजनीतिक हिसाब-किताब करने की आदत के मारे एंकरों को रोज का राजनीतिक हिसाब-किताब करने से फुरसत मिले तो कुछ पढ़ें! इस दिन भी हिसाब-किताब किया गया। एक सौ पचासवीं मनाने की जगह एक अंग्रेजी एंकर को यह लाइन लगाना जरूरी लगा कि गांधी का असली चेला कौन है? इसी सवाल का दूसरा पहलू था कि क्या कांग्रेस गांधी की विरासत के योग्य है? लेकिन अफसोस कि वह भक्त एंकर भी न जाने क्यों गांधी के असली चेले का नाम बताते-बताते रह गया और ‘दूरारूढ़ व्यंजना’ में रहने दिया।

कांग्रेस के गांधी की विरासत के अयोग्य होने के दृश्यों को तो खूब दिखाया, लेकिन ‘कौन योग्य है’ यह न बताया और न किसी प्रवक्ता ने एंकर को टोका कि यह बेहूदा सवाल क्यों?  गांधी का चेला होना क्या हंसी ठठ्ठा है? दो अंग्रेजी चैनलों ने जरूर कुछ नए तरीके से स्वच्छता की गंगा में डुबकी लगाई। एक चैनल स्वच्छ से स्वस्थ तक की चर्चा-यात्रा करता रहता और साथ ही ‘एंटी सेप्टिक ब्रांड’ के दर्शन कराता रहता, मानो संकेत देता हो कि हे अस्वच्छ प्राणियो! अगर तुमको स्वच्छ और स्वस्थ रहना है तो इस ब्रांड का एंटी सेप्टिक इस्तेमाल करना न भूलना।
(अब यह ‘एंटी सेप्टिक ब्रांड’ पानी में घुल कर पानी की ऐसी तैसी करे तो करता रहे। सानू की?)

इसी तरह एक अन्य चैनल पानी बचाने की चिंता में दुबला होता रहा। एंकर और चर्चक, एनजीओ टाइप पानी विशेषज्ञ और उसके बचाओ विशेषज्ञ अपनी निर्मल अंग्रेजी में पानी बचाने की चिंता करते रहे, जिसे सुन-सुन कर हम स्वयं ‘पानी पानी’ होते रहे। हमारे ही जैसे मूढ़मतियों को समझाने के लिए चैनल स्क्रीन पर नल की एक टोंटी बनाई। उससे एक दो-बूंद पानी टपकता दिखाया, ताकि पानी का संकट हम सबको महसूस हो। संग में लगा दिया एक ‘एंटी बैक्टीरियल ब्रांड’, जिसकी महती कृपा से पानी साफ करने की विद्या दी जा रही थी, मानो संकेत से कहा जा रहा था कि हे गंदे प्राणी! समझ ले कि जल ही जीवन है। उसे अकारथ न जाने दे और सुबह जब घर का फर्श साफ करे तो इस एंटी बैक्टीरियल ब्रांड का उपयोग कर! तेरा कल्याण होगा! यह ‘एंटी बैक्टीरियल ब्रांड’ पानी में घुल कर धरती और पानी का कैसा ‘शुद्धीकरण’ करेगा? इससे हमें क्या?

ऐसे कार्यक्रमों से आत्मबोध हुआ कि जो कारपोरेट अपने नाना ब्रांडों की नाना भांति की कृपा से अब तक पानी का बंटाढार करते रहे, वही गांधी के नाम पर पानी को फिर से साफ करने और जनता को स्वच्छ और स्वस्थ रहने के सबक सिखा रहे हैं! लेकिन इंद्र भगवान को स्वच्छता का यह ‘छल’ मंजूर न हुआ और वे पटना पर इतना बरसे कि सारे शहर की दबी-छिपी गंदगी को ऊपर तैरा दिया और घर-घर में घुसा दिया।

इस बिडंबना को देख खबर चैनल लपके और गंदगी में खड़े होकर दिखाने लगे कि देखो यह रहा स्थानीय भाजपा के मुखिया का मकान। पानी अंदर घुसा है, लेकिन छत पर झंडा सजा है। और यह देखिए, यह रहे बिहार के उपमुख्यमंत्री जी, जिनके घर में इतना पानी घुस आया कि उनको घर से बाहर निकालना पड़ा। देखिए ये खड़े हैं शॉटर््स और टीशर्ट में उप-मुख्यमंत्री जी! इसके आगे एंकर सुशासन बाबू की खबर लेने लगे कि यह है सुशासन बाबू का सुशासन!

सिर्फ एक चैनल ने साफ किया कि पानी निकासी का इंतजाम देखना तो नगरपालिका का काम था, जिसमें भाजपा है। इसमें सुशासन बाबू का क्या दोष? एक भक्त चैनल एक भक्त की ‘नई पुस्तक’ पर चर्चा करा रहा था और बात किसी तरह ‘डाटा’ पर आ टिकी, तो एक चर्चक कह उठा कि भारत में सही डाटा कभी मिलता ही नहीं। कोई किसी डाटा को गलत कहता है, तो उसे ‘राष्ट्रद्रोही’ करार दे दिया जाता है… अभी हमारी इकोनॉमी ढाई ट्रिलियन की है। अगर उसे पांच साल में पांच ट्रिलियन की बनाना है, तो हर बरस पंद्रह प्रतिशत की विकास दर चाहिए, जबकि आज वह सिर्फ छह प्रतिशत के आसपास है!

पता नहीं क्यों इस भक्त एंकर ने ऐसी संशयात्मा को भी एंटीनेशनल नहीं कहा! कहंीं एंकर का दिल भक्तिमार्ग से कुछ हट तो नहीं रहा? इस मायालिप्त संसार में कौन आत्मा किधर लुढ़क जाए, किसे मालूम? लेकिन वृहस्पतिवार का हमारा दिन बनाया कांग्रेस के तीन देवताओं के एक ‘महाप्रश्न’ ने, जिसके जन्म की कथा को एक चैनल ने अपनी स्क्रीन पर बार-बार दिखाया। सीन था : संसद भवन के साए में खड़े तीन कांग्रेसी देवता चर्चा में लीन नजर आते हैं और एक चैनल बातचीत को चुपके से रिकार्ड कर रहा है : एक पूछता है, उसको कितनी सीटें मिलीं? जवाब : ‘एक’, फिर कहा ‘दो’ फिर कहता है ‘चार’ फिर कहता है कि ‘चौदह’… ऐसे में एक देवता पूछ उठता है : हे तात! पार्टी कहां गई?
पार्टी गई तेल लेने!

 

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