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बाखबर: शाहीन बाग का मतलब

सीएए-एनआरसी को लेकर उनके मन में आशंकाएं हैं। ये लागू हुए तो वे और उनके बाल-बच्चे कहां जाएंगे?

इंदिरा जयसिंह और कंगना रानौत की तू तू मैं मैं भी शाहीन बाग की कहानी को किनारे नहीं कर पाती है।

शाहीन बाग! शाहीन बाग! शाहीन बाग! शाहीन बाग!
एक शाहीन बाग! दो शाहीन बाग! तीन शाहीन बाग! चार शाहीन बाग! हजार शाहीन बाग! यहां शाहीन बाग! वहां शाहीन बाग! पूरे देश में शाहीन बाग! शाहीन बाग खबर नहीं, अब एक प्रतीक है!
शाहीन बाग यानी विपक्ष। शाहीन बाग यानी कांग्रेस। शाहीन बाग यानी देशद्रोही टुकड़े टुकड़े गैंग। शाहीन बाग यानी छद्म सेक्युलर लटयन्स गैंग, खान मार्केट गैंग, लिबरल-लेफ्ट गैंग… शाहीन बाग एक ‘प्रोटेस्ट टूरिस्ट स्पॉट’। एक बिरयानी कोर्ट, विरोध का स्टाइल स्टेटमेंट… निरंतर लाइव कवरेज ने उसे एक ‘मिथक’ बना दिया है!

निर्भया के आरोपितों को एक फरवरी को लगने वाली फांसी की खबर तक किनारे हो गई है। इंदिरा जयसिंह और कंगना रानौत की तू तू मैं मैं भी शाहीन बाग की कहानी को किनारे नहीं कर पाती है।
अड़तीस दिन से शाहीन बाग जारी है। प्राय: बुरके और हिजाब में दिखने वाली औरतों को भी शाहीन बाग के लाइव कवरेज ने बोलना और नारे लगाना सिखा दिया है।
सीएए-एनआरसी को लेकर उनके मन में आशंकाएं हैं। ये लागू हुए तो वे और उनके बाल-बच्चे कहां जाएंगे? उनको शिकायत है कि यह सरकार के उनसे बात क्यों नहीं करती?
कई चैनलों के लिए शाहीन बाग का यह धरना एक नया ‘डिसरप्शन’ है। वह नए किस्म का स्त्रीवादी प्रतिरोध है, जो किसी के काबू में नहीं आ रहा (या शायद कोई काबू करना ही नहंीं चाहता)!

अड़तीस दिन से मुख्य रास्ता रुका है। पड़ोस के लोग परेशान हैं, लेकिन शाहीन बाग जारी है। कई हिंदी-अंग्रेजी एंकर उसे ‘लिमिट’ करने, उसे ‘कंट्रोल’ करने, उसे बंद करने की जुगत में हर रोज निंदात्मक चर्चाएं कराते हैं, लेकिन एक लयभरी अहिंसक-सी जिद शाहीन बाग के टी-पॉइंट पर ठहर गई है।
शाहीन बाग का क्या किया जाय? उससे कैसे निपटा जाय? धरना कैसे उठाया जाय? भक्त एंकर करें तो क्या करें?
कुछ एंकरों और पैनलिस्टों के लिए शाहीन बाग सिर्फ मुसलिमों का है। कुछ की नजर में उसमें सभी समुदाय शामिल हैं।

‘मूंदहु आख कतहुं कछु नाहीं’ की तर्ज पर एक मंत्री कह देते हैं कि तीन सौ विश्व विद्यालयों में सिर्फ तीस विश्वविद्यालयों के कुछ छात्र ही तो इसमें शामिल हैं…
जवाब आता है कि यह सिर्फ मुस्लिमों का नहीं है, बल्कि इसके पीछे बाकी युवाओं का भी संचित गुस्सा है। आर्थिक बेहाली और बेरोजगारी का दर्द तो है ही, यहां से हकाल दिए जाने की आशंकाएं भी हैं। इसका प्रत्युत्तर आता है कि यह सब विपक्ष की राजनीति है, कुप्रचार है। एक सवाल : इनसे बात क्यों नहीं की जा रही है? जवाब : हम तो सारे देश से बात कर रहे हैं, सीएए के पक्ष में रैलियां कर रहे हैं…

देश के ‘मूड’ को बताने वाले एक सर्वे को खोलते हुए एक अंग्रेजी चैनल का एंकर बताता है कि पीएम की पापूलरिटी रेटिंग में तीन प्रतिशत की गिरावट दिखाई दे रही है, जो एक चिंतनीय बात है… एंकर कहता है : क्या इसका कारण सीएए लाने की उतावली है? क्या यह सरकार का ‘मोशा (मोदी शाह) मोमेंट’ है… एक वरिष्ठ पत्रकार कहता है कि इन दिनों ‘ध्रुवीकरण सभी को पसंद है’ यानी कि शाहीन बाग नए धु्रवीकरण में मदद कर रहा है।
चैनलों के नित्य के लाइव कवरेज और गरमागरम चर्चाओं ने शाहीन बाग को जनतांत्रिक प्रोटेस्ट का नया अहिंसक प्रतीक बना दिया है।

शाहीन बाग के नए मानी खोजता एक रिपोर्टर कुछ गृहस्थिनों के बयानों को लाइव किए जा रहा है। वे सभी एक ही बात कहती हैं कि हमसे कोई बात क्यों नहीं करता? वे लोग हमसे आकर बात करें। हमें समझाएं…
अंत में उसे एक अतीव वृद्ध मिलती है, जिसके चेहरे पर झुर्रियां हैं, अपने पोपले मुंह से वे वही बातें कहती हैं कि बताइए हम कहां जाएंगी? हम तो यहां से कभी न जाएंगी। उसे देख फिल्म ‘गरम हवा’ की उस बुढ़िया की याद आती है, जो पाकिस्तान न जाने के लिए एक कुठरिया में छिप जाती है और अपने बेटे से ‘करुणा-क्रंदित’ आवाज में कहती है : मैं यहां से कहीं नहीं जाऊंगी…

हकाले जाने का डर ही उनको सड़क पर ले आया है, जिसमें भविष्य की आशंकाएं बोलती हैं और आश्चर्य कि कोई उनसे बात तक नहीं करने को तैयार।
यह संवादहीनता शाहीन बाग की जिद को बढ़ाए जा रही है।
इसके आगे एक ही दिन में चार चार बदलेखोर धमकियां बरसती हैं :
– जो हिंसा करेगा, उसको हम ऐसी सजा देंगे कि सात पुश्तें याद रखेंगी…
– तू मेरे काम को देखना चाहता है तो देख! हमने यहां आठ सौ साल तक हुकुमरानी और जांबाजी की है…
– हमारे सब्र की हद देखो। हम उस कौम से हैं कि अगर अपनी पर आ गए तो सब कुछ बर्बाद कर देंगे। कुछ नहीं बचेगा। मुल्क के टुकड़े टुकड़े कर देंगे, लेकिन हम अभी नहीं करेंगे…

एंकर उसे लताड़ते हुए कहता है कि तो तू मेरे हिंदुस्तान के टुकड़े करेगा? बता कैसे करेगा? बता कैसे करेगा? कायर, एंटी-नेशनल कहीं का… फिर एंकर उसे अरेस्ट करने तक की मांग कर देता है और बहस जारी रहती है।
आखिरी धमकी दिल्ली के एक भाजपा प्रत्याशी से आती है कि :
– अगर आप शाहीन बाग, चांद बाग, इंद्रलोक बनाएंगे तो आठ फरवरी को दिल्ली भर में हिंदुस्तान बनेगा…

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