ताज़ा खबर
 

बाखबर: वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति

एक दिन संघ प्रमुख मोहन भागवत ने ‘लिंचिग’ शब्द के ‘भारतीय’ न होने पर आपत्ति जता कर चैनलों में विवाद पैदा कर दिया। जवाब में एक ने कहा कि ‘लिंचिंग’ अंग्रेजी का हो या किसी का, ‘हिंसा’ तो ‘हिंसा’ है।

Author Updated: October 13, 2019 6:15 AM
पीएमसी बैंक के सामने जुटी भीड़ (एक्सप्रेस फाइल फोटो)

आए दिन हजारों लोग चैनलों में रोते-बिलखते दिखते रहे। वे रोज पीएमसी बैंक के आगे खड़े होकर नारे लगाते रहे। सरकार के हजूर में गुहार लगाते रहे कि हमारा पैसा और हमें क्यों नहीं मिल रहा? इसे देख हुजूर का दिल पिघला और कह दिया कि छह महीने में एक हजार रुपए बैंक से निकाल सकते हैं। लोग बोले कि हुजूर! एक हजार में आप ही छह महीने अपने परिवार का पेट पाल कर दिखा दें, तो हुजूर ने तरस खाकर छह महीने में पच्चीस हजार रुपए निकालने को कह दिया!

लेकिन लोगों का रोना-धोना कम न हुआ। एक भक्त चैनल ने इस बैंक घोटाले पर पहली बार बहस कराई, जिसमें भक्त-प्रवक्ता ने दुखी प्राणियों से कुछ इस भाव से कहा मानो अहसान कर रहे हो कि ‘पच्चीस हजार रुपए तक’ कर तो दिया! इस पर एक भुक्तभोगी रोषपूर्ण स्वर में बोली कि हम क्या भीख मांग रहे हैं आपसे? हमारा पैसा है। हमें वो चाहिए! गनीतम रही कि उन्होंने उसे देशद्रोही न कहा!

शुरू में सिर्फ एक चैनल ने पीड़ितों की खबर दी। उसी में कई दलों के बड़े नेताओं के नाम भी आए, जिनकी कृपा से यह बैंक डूबा। लेकिन उसके बाद किसी चैनल पर किसी का नाम न आया। सिर्फ तीन घोटालेबाजों के चेहरे और नाम दिखते रहे। अपने यहां अक्सर ऐसा होता है कि पहले सत्य पर दूसरे, तीसरे सत्य का लेप चढ़ाया जाता रहता है और इस तरह पहला सत्य ‘आउट’ कर दिया जाता है।

जब लोग ‘प्रोटेस्ट’ करने लगे और महाराष्ट्र विधानसभा के चुनावों के बीच मार्मिक खबर बनाते रहे, तो कुछ आंसू पोंछने का प्रयास हुआ। वित्तमंत्री जी आर्इं। पीड़ितों से बात की। फिर मीडिया से मुखातिब हुर्इं, जिसमें उन्होंने बैंकों की दोहरी-तिहरी व्यवस्था के बारे में पत्रकारों का ज्ञानवर्धन अधिक किया और ‘नियमों में परिवर्तन किया जाएगा ताकि ऐसा फिर न हो’ का आश्वासन दिया!

इस बीच नाराज लोगों को कैमरे दिखाते रहे : एक बोला कि मैंने किडनी बदलवाई है, मुझे पांच हजार की दवाई रोज चाहिए। बताइए, मैं कैसे जिंदा रहूं? दूसरा अचानक बेहोश-सा होने लगा, तो उसको लोग पानी पिलाते दिखे। एक रोते-रोते कहता रहा कि सर कुछ तो करिए। ऐसे कैसे जिएंगे।
बहरहाल, हम तो सोचते रहे कि दशहरे के दिन रावण-दहन ही बड़ी खबर बनेगा और एंकर जन ‘बुराई पर अच्छाई की जीत’ का जाप करेंगे, लेकिन असली बड़ी खबर रफाल ने बनाई और उससे भी बड़ी खबर राजनाथ सिंह द्वारा रफाल की जन्मभूमि पर ‘शस्त्र पूजा’ करने ने बनाई।
कांग्रेस को यह पूजा फूटी आंख न सुहाई। यही नहीं, कांग्रेस ने सेक्युलर सवाल दागे और भाजपा के हाथों जम कर ठुंकी!
विधानसभा के चुनाव नजदीक हैं। एक रिपोर्टर हरियाणा के एक शहर में स्वयं को बेरोजगार बताने वाले एक युवक से पूछती दिखी कि किसे वोट देंगे, तो वह कहने लगा कि ठीक है कि रोजगार चाहिए, लेकिन सुरक्षा भी तो चाहिए और वह प्रधानमंत्री ने दी है!
अब भी पूछते हो कि वोट किसे?
फिर वह एक अन्य शहर के एक किसान जैसे व्यक्ति से यही सवाल पूछती दिखी, तो भी ऐसा ही जवाब आया कि ठीक है कि परेशानी है, लेकिन वोट भाजपा को ही देंगे!
फिर भी पूछते हो कि वोट किसे?
एक अंग्रेजी चैनल आर्थिक ठंडी पर एक लंबी विद्वतचर्चा करा और बता चुका है कि कोई रास्ता नहीं दिखता! लेकिन वोट की पूछो तो इस सबका कोई असर नहीं दिखता!
क्या यह प्रकारांतर से किसी पक्ष का प्रचार नहीं?
राष्ट्रवाद के नए नेरेटिव पर जनता का मूड भांपने के लिए आयोजित एक अंग्रेजी चैनल-चर्चा के दौरान पहले एक चर्चक ने कहा कि बेरोजगारी है, मंदी है, सब कुछ है लेकिन ‘राष्ट्रवाद’ का विचार जनता के बीच बैठा हुआ है, वही वोट को तय करता है। जवाब में एक कांग्रेसी टाइप व्यक्ति कहता रहा कि ऐसा नहीं हो सकता।… तब लेखक चेतन भगत ने अपनी एक सूत्रीय शैली में इस शंका का समाधान किया कि अपने लोग सोचते हैं कि वे आधी रोटी खा लेंगे, लेकिन इमरान को ठिकाने लगाएंगे!
ऐसे ही एक शाम एक चैनल ‘सिद्धांतिकिया’ सवाल पूछने लगा कि क्या संघ गांधी को ‘एप्रोप्रिएट’ कर सकता है? आम भाषा में कहें तो क्या संघ गांधी को ‘पचा’ सकता है?
एक अन्य चैनल पर देर तक कुछ चर्चक गांधी के आदर्शों की चर्चा करते हुए बताते रहे कि संघ उनके ऐन विपरीत सोचता है और गोडसे ने गांधी की हत्या की थी, जो हिंदुत्ववादी विचारों से प्रभावित था। एक संघ भक्त ने उवाचा कि गोडसे एक ‘स्ट्रे’ व्यक्ति था, तो एक ने जवाब दिया कि सच यही है कि वह संघ के विचारों से प्रभावित था। गोडसे के भाई ने तो यहां तक बताया है कि वह संघ का सदस्य था है और रहेगा, लेकिन एक ने कहा कि संघ की सदस्यता का कोई रिकार्ड नहीं होता। यानी कि ‘सदस्य’ सदस्य हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता!
इस बार दशहरे के दिन रावण से अधिक लाइव कवरेज रफाल ने लिया। रफाल को देखते ही एंकरों की भुजाएं फड़कती दिखीं और देशप्रेम में पगे वे एक से एक वीर रस से युक्त काव्य पक्तियां गढ़ने लगते हैं, ताकि जनता भी इनको देख कर वीरासन में बैठ जाए, जैसे कि ‘ये उड़ता है दुश्मन कांपते हैं’, ‘आया रफाल दुश्मनों का काल’, ‘हमें आंख दिखाओगे बहुत पछताओगे’, ‘जिसका नाम सुनते ही दुश्मन थर्राते हैं’, ‘गेम चेंजिंग ड्रीम मशीन, ‘इमरान वाच आउट राफेल इज हियर’, अंग्रेजी चैनल जब तब वीर रस में मदमाते रहे और मौका लगते ही हिंदी में वीर रस बरसाते रहे हैं!
एक दिन संघ प्रमुख मोहन भागवत ने ‘लिंचिग’ शब्द के ‘भारतीय’ न होने पर आपत्ति जता कर चैनलों में विवाद पैदा कर दिया। जवाब में एक ने कहा कि ‘लिंचिंग’ अंग्रेजी का हो या किसी का, ‘हिंसा’ तो ‘हिंसा’ है।
यानी ‘वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति’!

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 एक विश्व एक परिवार
2 वक़्त की नब्ज़: लोकतंत्र बनाम भीड़तंत्र
3 तीरंदाज: दबी हुई चुप्पी