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बाखबर: साधारण का आकर्षण

इस खबर से पूरे दो दिन तक एंकरों और चुनाव विशेषज्ञों के बीच सन्नाटा खिंचा रहा। तिस पर भाजपा के प्रवक्ताओं की निरे आत्मविश्वास से भरी टीपें कि हमारे एक्जिट पोल के हिसाब से हम अड़तालीस सीट लेकर सरकार बनाने जा रहे हैं।

ईवीएम में मतदान करता मतदाता (फाइल फोटो)।

वोट के दिन बहुत-से चढ़े हुए चेहरे देर तक कैमरों से बाहर रहे। सिर्फ एक्जिट पोल वाले अपनी-अपनी दुकानें लगाए बैठे रहे। जितने चैनल, उतने एक्जिट पोल! सब दावा करते कि सिर्फ वे ही सही हो सकते हैं! दिल्ली की चंट-चतुर जनता ने सबको हिला दिया। मतदान के बाद रिजल्ट के आने तक के दो दिन बड़े कष्टदायी रहे! अपने-अपने दर्शकों को पटाने के लिए एंकर अपने-अपने चैनलों में ग्यारह फरवरी के सुबह छह बजे से ही सज कर बैठ गए, जबकि उनके पास दो घंटे तक बताने को कुछ भी नया नहीं था।

चुनाव की शाम अचानक लगी वोटरों की लंबी लाइनों की खबरों ने सब एक्जिटियों को चित्त-सा कर दिया। कुछ विशेषज्ञ बगलें बजाने लगे कि आखिरी वक्त में वोटरों को ‘मॉबिलाइज’ करने का काम सिर्फ भाजपा ही कर सकती है, क्योंकि उसी के पास कार्यकर्ता है। आशय यह कि ये वोट भाजपा को गया है। सारे एक्जिट पोल गलत होंगे। भाजपा जीतेगी।

इस खबर से पूरे दो दिन तक एंकरों और चुनाव विशेषज्ञों के बीच सन्नाटा खिंचा रहा। तिस पर भाजपा के प्रवक्ताओं की निरे आत्मविश्वास से भरी टीपें कि हमारे एक्जिट पोल के हिसाब से हम अड़तालीस सीट लेकर सरकार बनाने जा रहे हैं।

भाजपा प्रवक्ताओं के ऐसे आत्मविश्वास को देख कर कई ‘एक्जिटिए’ वक्त से पहले ही ‘एक्जिट’ कर गए! बढ़े मतदान के आंकड़े ने उनकी पोल खोल दी कि ‘एक्जिटिए’ तो सिर्फ दोपहर तीन बजे तक ही ‘एक्जिट’ निपटा देते हैं! चैनलों में यह सवाल लटका रहा- आखिर में पड़े वोट किसे मिले? तीन घंटे मे तीस प्रतिशत पड़े तो कैसे?

‘आप’ के प्रवक्ता आक्रामक मुद्रा में दिखे। वे पूछने लगे कि ‘ये ईवीएम सड़क पर कैसे रखी हैं’ और ‘चुनाव आयोग कुल मतदान के प्रतिशत पर चुप क्यों हैं?’ इसे देख कुछ भक्त एंकर ‘ईवीएम का बहाना’ बनाने के लिए ‘आप’ के नेताओं को उलाहना भी देने लगे!

चुनाव आयोग कुछ देर से बोला। इस वजह से आयोग कई चर्चाओं में कुटा, लेकिन जब उसने प्रतिशत दे दिया तो विवाद शांत हो गया। लेकिन वोटों की गिनती के दिन ज्यों-ज्यों परिणाम आते गए और ‘आप’ शुरू से बढ़ती दिखी, त्यों-त्यों तमाम एक्जिट पोल करने वाले अपनी-अपनी भविष्यवाणियों पर इठलाते दिखने लगे कि देखा, हम न कहते थे कि ‘आप’ ही बहुमत लाएगी! सत्ता विरोधी लहर नहीं है। हमारा ‘एक्जिट’ एकदम सही हैं! जिन एक्जिटियों ने भाजपा को बीसेक सीटें दी थीं, वे हकलाते दिखे और वे भी ‘आप’ की जीत के ‘बल्ले-बल्ले’ गाने लगे और कहने लगे कि भाजपा की ‘ध्रुवीकरण’ की और ‘गोली मारो’ की राजनीति हार के लिए जिम्मेदार है!

जो एंकर ‘शाहीन बाग’ को इस चुनाव के लिए निर्णायक बताते आए थे, अचानक हकबकाने लगे और कहने लगे कि ‘सीएए’ और ‘राष्ट्रवाद’ की धारणा के मुकाबले ‘आप’ द्वारा दिल्ली की जनता को सीधे लाभ पहुंचाने की राजनीति जीती। यह चुनाव विचारधारात्मक लाइन पर होने की जगह ‘आप’ के अपनी किस्म के ‘विकासवादी मॉडल’ पर हुआ और उसे ही जनस्वीकृति मिली! देश में मोदी, दिल्ली में केजरी’ वाले नारे पर दिल्ली की जनता ने मुहर लगाई!

‘आप’ की इस जबर्दस्त जीत के दृश्य अपनी साधारणता में भी आकर्षक थे। जीत के बाद आम आदमी पार्टी के कार्यालय में केजरी के अति संक्षिप्त संबोधन के दौरान वे और उनका परिवार एकदम साधारण परिधानों में ही दिखे, जिसे देख नलिनी सिंह ने एक चैनल पर कहा भी कि सबसे आकर्षक तत्त्व है आप के नेताओं की ‘साधारणता’!

केजरीवाल ने सारी जीत को चंद साधारण वाक्यों में निपटा दिया कि ‘दिल्ली वालो आपने गजब ढा दिया’ और ‘आई लव यू’ कह कर लोगों की ओर एक ‘फ्लाइंग किस’ फेंक दिया और फिर कहा कि ये काम की राजनीति की जीत है! बस!

इस चुनाव में केजरीवाल के हनुमान चालीसा का पाठ करने और हनुमान मंदिर जाने का विवाद भी उठा! एंकरों और ‘चर्चकों’ ने इसे केजरी का ‘नरम हिंदुत्व’ बताया। भाजपा की करारी हार के बीच भी एक भाजपा प्रवक्ता के लिए केजरी द्वारा ‘हनुमान चालीसा’ का पाठ करना भाजपा के ‘विचार की जीत’ रहा! हार में भी जीत देखने वाले ऐसे ‘दिव्यचक्षुओं’ को नमन!

‘हनुमान चालीसा’ के पाठ का प्रसंग इतना-सा रहा कि एक पत्रकार ने केजरीवाल से पूछा कि ‘क्या वे हनुमान भक्त हैं!’ इसके जबाव में केजरीवाल अपने कच्चे गले से चालीसा का शुरुआती दोहा सुना दिया और इस तरह चालीसा का सेकुलरीकरण कर दिया! फिर जीत के बाद अपने कार्यालय से निकल कर सीधे कनाट प्लेस के हनुमान मंदिर में जाकर और पूजा कर केजरीवाल के अपने हनुमान भक्त होने का सहजीकरण कर दिया!

मंदिर के अंदर ‘जै श्रीराम’ ‘जै श्रीराम’ के नारे सुनाई देना, फिर केजरीवाल मनीष सिसोदिया और केजरीवाल के परिवार को पुजारी का तिलकादि लगाना और पटका प्रसाद देना सहजता से गुजर गया, लेकिन भाजपा के एक प्रवक्ता ने मंदिर के अंदर लगे ‘जै श्रीराम’ के नारों में हिंदुत्व की ‘जै जै’ नजर आई!

लेकिन अपने चैनलों को ‘आप’ की यह जीत पची नहीं। अगले ही रोज कई नामी एंकर हमले करने में लग गए कि ये ‘फ्री-बीज’ की कब तक चलेंगी..! मार्च के महीने के बाद देखते हैं कि गरमी के दिनों में कितनों को मुफ्त बिजली मिलती है? कैसा अंधस्वार्थी जमाना है कि दस-दस बीस-बीस लाख रुपए महीने कमाने वाले ये महान एंकर, दस-बीस हजार महीने कमाने वाले दिल्ली वालों को सरकारी मदद से भी ‘ईर्ष्यादग्ध’ होने लगते हैं!
शायद ऐसों के लिए कहा गया है कि ‘मेरा पेट हाउ, मैं न दैहों काउ!’

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