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बाखबर: हंसना मना है

बहरहाल, टाई-सूट छाप नामी-गिरामी पत्रकारों ने यूपी सरकार और पुलिस की निरंकुशता को दो दिन तक लगातार जम कर कोसा और बड़ी अदालत से न्याय की गुहार तक की। पत्रकार की पत्नी भी पत्रकारों के प्रदर्शन में दिल्ली में दिखीं।

प्रतीकात्मक तस्वीर। (photo by financial express)

एक दिन सारे चैनल जम्मू-कश्मीर की धारा तीन सौ सत्तर के हटाने, न हटाने को लेकर बहस चलाते रहे और भविष्य का नया एजंडा तय होता रहा। पुराने विशेषज्ञ कहते रहे कि धारा के साथ छेड़छाड़ ठीक नहीं। दूसरे कहते रहे कि जब कश्मीर ‘इंटेग्रेशन’ वाले प्रस्ताव में धारा तीन सौ सत्तर कहीं है ही नहीं, तब उसका होना क्यों जरूरी है? एजंडे पर कश्मीर रहना है।

फिर एक शाम, एक से एक बड़ी खबरें टूटीं कि वक्फ बोर्ड के कब्जे से प्रापर्टीज को मुक्त किया जाएगा, कि मदरसों का आधुनिकीकरण किया जाएगा, कि अल्पसंख्यक समाज के पांच करोड़ छात्रों को वजीफे दिए जाएंगे, कि शादी के वक्त लड़कियों को इक्यावन हजार रुपए दिए जाएंगे!
लोग अल्पसंख्यकों पर खतरे को रोते रहे और सरकार उन तक इस तरह पहुंचती रही। कई एंकर चहक उठे कि देखो, यह है सरकार का अल्पसंख्यकों तक सीधी पहुंच बनाने का तरीका।
एक चैनल चर्चा में एक पत्रकार बोलीं कि सेक्युलर दलों ने मुसलमानों को एक ‘घेटो’ में बंद रखा है। एंकर कटाक्ष करते हुए बोला कि लोग तो मानते हैं कि अल्पसंख्यकों पर अगले पांच बरस भी अत्याचार जारी रहेंगे। पत्रकार फिर बोलीं कि सवाल यह है कि अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व तो नहीं मिला न!
भई! आपको आम खाने से मतलब है कि पेड़ गिनने से? एंकर समझाने लगा कि सबका विश्वास के इस दौर में आप भी तो सबके विश्वास में विश्वास करो जी!
इसी बीच यूपी में एक अल्पज्ञात चैनल के अल्पज्ञात रिपोर्टर की अल्पज्ञात कहानी सुविख्यात चैनलों में आकर ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ का सवाल बन उठी।
उस अल्पज्ञात पत्रकार ने जंबूद्वीप की एक पगलेट प्लेटोनिक प्रेमिका के नाम एक प्रेमगीत जोड़ कर सोशल मीडिया में आगे बढ़ा दिया। एकतरफा मुहब्बत की यह शाश्वत कहानी सोशल मीडिया में वायरल होकर दो दिन के लिए अमर हो गई।
प्रेमकथा को वायरल होते देख जंबूद्वीप के चिर सजग एंटी रोमियो स्क्वाड एक्शन में आ गया और उसने इस अल्पज्ञात पत्रकार को ‘स्वत: संज्ञान’ भाव में ताव उठा कर अंदर कर दिया! उसके साथ अन्य सात पत्रकारों को किश्तों में अंदर किया। यानी पूरा चैनल ही अंदर कर दिया, ताकि इस प्रेमकथा का नामलेवा तक बाहर न रहे।

सुविख्यात पत्रकारों को यह तुरंता गिरफ्तारी अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला नजर आई। सभी पत्रकार एंकर हाय हाय करने लगे कि अपने जंबूद्वीप में ये क्या गजब हो रहा है? आखिर उस पत्रकार की गलती क्या है? उसने एकतरफा मुहब्बत की दास्तान को सिर्फ आगे तो बढ़ाया। अगर पकड़ना ही था तो अपनी मुहब्बत का वीडियो में इजहार करने वाली पे्रमिका को पकड़ते। उन मीडिया वालों को धरते, जिनने उसे खबर की तरह दिखाया। यह अल्पज्ञात पत्रकार कनौजिया तो एक फिल्मी गाना चिपका कर इस इश्किया का मजा ही तो ले रहा था। हाय! इतनी हंसी भी एंटी रोमियो स्क्वाड को बर्दाश्त नहीं हुई!
बहरहाल, टाई-सूट छाप नामी-गिरामी पत्रकारों ने यूपी सरकार और पुलिस की निरंकुशता को दो दिन तक लगातार जम कर कोसा और बड़ी अदालत से न्याय की गुहार तक की। पत्रकार की पत्नी भी पत्रकारों के प्रदर्शन में दिल्ली में दिखीं।
एक अंग्रजी एंकर ने इस एकतरफा पे्रम की कथा को ससंदर्भ अंग्रेजी में कह कर पुलिस को चुनौती तक दे डाली कि हमने भी कह दी वह प्रेमकथा, जिसे कॉमिक बनाने के ‘अपराध’ में कनौजिया को पकड़ा। अब हमें पकड़ कर दिखाए पुलिस, तो जानें। हम नहीं डरते, आएं हमें पकड़ें।
इसे कहते हैं बीती गंगा में हाथ धोना! जब सब कुछ कहा जा चुका तब आपने कही, तो क्या कही?
अहसान मानिए साहसी पत्रकार कनौजिया का कि उसने अपनी एक जरा-सी मजाहिया पत्रकारिता से आप सबको एक क्रांतिकारी मुद्रा अपनाने का अवसर दिया!

बहरहाल, इस सप्ताह अल्पज्ञात पत्रकारों पर बुरी गुजरी। अगले रोज एक अन्य अल्पज्ञात पत्रकार ने फिर खबर बनाई। रेलवे यार्ड में हो रहे घोटाले को खोलने के लिए उसने अपने मोबाइल में वीडियो बनाया, लेकिन शामली पुलिस ने उस मोबाइल को छीन लिया तथा पत्रकार को सीधे थाने में बंद कर दिया लिया।
थाने में बंद होते हुए भी पत्रकार का साहस देखिए कि एक चैनल के थाने के अंदर आते ही वह बेधड़क बोलता रहा कि मेरा वीडियो वाला मोबाइल इन पुलिसवालों ने छीन लिया। तीन किलोमीटर दूर से थाने तक मुझे पीटते हुए लाए। मुझे नंगा कर दिया। मेरे मुंह में ‘टायलेट’ किया। अहा! क्या ‘कंट्रास्टी सीन’ था : इधर सलाखों के पीछे खड़ा आहत पत्रकार पुलिस पर आरोप लगाता रहा, उधर आरोपी पुलिस जी पास की कुर्सी पर अपने भावों को जब्त करते हुए खामोशी से बैठे सुनते रहे। चैनल के कैमरे रिकार्ड करते रहे, जिसे चैनलों ने बार-बार दिखाया। बाद में पत्रकार को सलाखों से बाहर कर दिया गया। यह है असली, किंतु अल्पज्ञात साहसी छोटी-छोटी पत्रकारिता, जो स्टूडियोज में बैठी गाल बजाती सूट बूट छाप पत्रकारिता पर भी भारी पड़ जाती है। वह वहां भी हंस सकती है, जहां हंसना मना है!

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