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किताबें मिलीं: ‘उड़ने को आकाश मिले’ और ‘यादों की धरोहर’

भूमंडलीकरण तथा बाजारवाद जनित उपभोक्तावादी अपसंस्कृति ने मानवीय मूल्यों को हाशिए पर धकेल दिया है। अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद ने इस विषैले वातावरण को रक्तरंजित कर और अधिक भयावह बना दिया है।

Author January 27, 2019 4:37 AM
पुस्तक ‘उड़ने को आकाश मिले’ और ‘यादों की धरोहर’

भूमंडलीकरण तथा बाजारवाद जनित उपभोक्तावादी अपसंस्कृति ने मानवीय मूल्यों को हाशिए पर धकेल दिया है। अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद ने इस विषैले वातावरण को रक्तरंजित कर और अधिक भयावह बना दिया है। ‘उड़ने को आकाश मिले’ संग्रह की गजलों की पृष्ठभूमि में वर्तमान समाज तथा समय अपनी संपूर्ण जटिलताओं, विषमताओं तथा विसंगतियों के साथ उपस्थित है। माधव कौशिक ने अपनी गजलों में विषम परिस्थितियों में फंसे आम आदमी के जीवन संघर्ष को पूरी मार्मिकता तथा संवेदनशीलता के साथ अंकित किया गया है।

सामान्य जन की प्रत्येक आह और कराह को दर्ज करते हुए रचनाकार ने उनकी अदम्य जिजीविषा, संघर्षशीलता तथा अटूट आस्था को प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त किया है। गजलकार का विश्वास है कि यदि हाशिए पर खड़े लोगों को उड़ने के लिए आकाश मिले, तो वे समाज में आमूलचूल परिवर्तन लाने की क्षमता रखते हैं। सहज, सरल तथा सृजनात्मक भाषा में लिखी इस संग्रह की गजलें पाठकों की संवेदना तथा सोच को विस्तार प्रदान करती हैं।
उड़ने को आकाश मिले : माधव कौशिक; किताबघर प्रकाशन, 4855-56/24, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली; 350 रुपए।

यादों की धरोहर
कमलेश भारतीय मूलत: कथाकार हैं। जीवन की धड़कनों पर उनकी बारीक नजर रहती है। पर इस किताब में उनके अट्ठाईस रचनाकारों से लिए साक्षात्कार संकलित हैं। साक्षात्कार भी एक रचना का आनंद देते हैं, अगर साक्षात्कार लेने और देने वाले के बीच सवालों और जवाबों का तार सही तरीके से जुड़ जाए। इस किताब में वह आनंद मौजूद है। इन साक्षात्कारों की खासियत यह है कि इनमें बड़े सटीक और बेबाक सवाल किए गए हैं। कई बार साक्षात्कार लेने वाले उस वक्त की स्थितियों, वातावरण और अपने अनुभवों के अवांतर प्रसंग पाट देते हैं। सवाल और जवाब उनमें कहीं खो जाते या फिर साक्षात्कार लेने वाले की अनावश्यक उपस्थिति से ऊबाऊ हो जाते हैं। पर इन साक्षात्कारों में एक तरह की रवानगी है।

किताब की भूमिका ‘कहां कहां से गुजरा’ में कमलेश भारतीय ने अपने साक्षात्कारों के बारे में तफ्सील से बताया है। किस तरह उन्होंने साक्षात्कार लेना शुरू किया और फिर यह एक सफर की तरह चल निकला। किन साक्षात्कारों में क्या-क्या दिक्कतें या फिर मजेदार घटनाएं हुर्इं, उन सबके बारे में बताया है। इन साक्षात्कारों की एक विसेषता यह भी है कि कमलेश भारतीय ने रचनाकारों के जवाबों को जस का तस नहीं परोस दिया है। उसमें से वही बातें ली हैं, जो उन्हें जरूरी लगी हैं। बाकी बातों को हटाते या संपादित करते हुए वे बीच में अपनी एक टिप्पणी से आगे की बातों को नत्थी करते चलते हैं। इस तरह बातचीत किसी कथा का आस्वाद देती चलती है। उसमें रचनाकारों के निजी प्रसंग भी घटित होते चलते हैं, तो रचनात्मक सफर का भी खुलासा होता चलता है।
यादों की धरोहर : कमलेश भारतीय; आस्था प्रकाशन, लाडोवाली रोड, जालंधर; 180 रुपए।

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