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किताबें मिलीं: ‘सोनचिरइया’ और ‘मोगरी’

भय सन 1980 के आसपास उभरे कथा लेखकों की पीढ़ी के एक प्रतिष्ठित व्यक्तित्व हैं और अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता के लिए उनकी विशिष्ट पहचान है। वे मूल रूप से ग्रामीण पृष्ठभूमि के कथाकार हैं।

किताबें मिलीं: ‘सोनचिरइया’ और ‘मोगरी’

सोनचिरइया
भय सन 1980 के आसपास उभरे कथा लेखकों की पीढ़ी के एक प्रतिष्ठित व्यक्तित्व हैं और अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता के लिए उनकी विशिष्ट पहचान है। वे मूल रूप से ग्रामीण पृष्ठभूमि के कथाकार हैं। पहली कहानी ‘नाव’ के साथ, जिसे वरिष्ठ कथाकार रमेश उपाध्याय ने सकारात्मक विकल्प की कहानी बताया था, अभय ने कथालेखन में कदम रखा और प्रगतिशील लेखन आंदोलन और लघु पत्रिका आंदोलन से जुड़ कर अपनी पहचान बनाई है। आनन-फानन में चर्चा पाने के लिए अभय ने किसी जुगाड़ या तिकड़म का सहारा नहीं लिया है। गांव की छोटी-छोटी स्थितियों के सहारे उन्होंने अपनी कहानियों का ताना-बाना बुना और अपने रचनाकर्म को विकसित किया है।

आलोचक खगेंद्र ठाकुर ने ‘आलपीन’ को ग्रामीण जीवन के नए यथार्थ से विकसित वर्गीय चेतना की अभिव्यक्ति का एक सशक्त उदाहरण माना है। विश्वनाथ त्रिपाठी मानते हैं कि दलित सौंदर्यबोध को उद्घाटित करने वाली अभय की कहानी ‘सूअर का बच्चा’ अपनी तरह की हिंदी में लिखी कहानी है। ‘सोनचिरइया’ विश्वबाजार पर केंद्रित कुछ-एक कहानियों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कहानी है। उनकी ‘पहचान’ और ‘दफा तीन सौ उन्यासी’ न्यायालय और उसके परिवेश से जुड़ी यादगार कहानियां हैं। यथार्थ के नएपन और छोटी-छोटी स्थितियों के प्रति सजगता अभय का निजत्व है, जो उन्हें महत्त्वपूर्ण कथाकार बनाता है।
सोनचिरइया : अभय; प्रकाशन संस्थान; 4268-बी/ 3, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली; 250 रुपए।

मोगरी
हानी की सबसे पहली और बड़ी विशेषता होती है उसका कथा-रस। मुरारी गुप्ता की इन कहानियों में कथा-रस भरपूर मात्रा में है और बिल्कुल सही तरीके से कहानियों की रोचकता को बढ़ाते हुए प्रवाहित है। सबसे अच्छी बात इन कहानियों में यह है कि बहुत सलीके के साथ बातें कही गई हैं। जैसे पहली ही कहानी ‘भोगली’ में भाषा और शिल्प के सुंदर प्रयोग से कहानी को उस दिसा में जाने से बचा लिया गया है, जिस दिशा में इस प्रकार की कहानियां अक्सर चली जाती हैं। कहानी संग्रह की एक और विशेषता विषय की विविधता है। हर दूसरी कहानी पिछली कहानी से बिल्कुल अलग विषय पर है। इस कहानी संग्रह की सारी कहानियां अलग-अलग धरातलों पर चलती हैं, और रोचकता बनाए रखती हैं। भाषा, शैली, पात्र, विषय जैसे अलग-अलग मापदंडों पर ये चौदह कहानियां एकदम खरी उतरती हैं।

इस संग्रह में मुरारी गुप्ता ने समाज की उन परंपराओं में से दिलचस्प कथानक ढूंढ़ निकाले हैं, जो आमतौर पर पाठक तक नहीं पहुंच पाते। कहानी कहने का उनका दिलचस्प अंदाज इस संग्रह की रोचकता को और भी बढ़ा देता है।
मोगरी : मुरारी गुप्ता; बोधि प्रकाशन, सी-46, सुदर्शनपुरा इंडस्ट्रियल एरिया एक्सटेंशन, नाला रोड, बाईस गोदाम, जयपुर; 200 रुपए।

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