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किताबें मिलीं: ‘बादल राग’, ‘बांसुरीवाली’ और ‘सोचने पे पहरा है!’

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Author February 10, 2019 6:22 AM
पुस्तकें ‘बादल राग’, ‘बांसुरीवाली’ और ‘सोचने पे पहरा है!’

बादल राग
‘स्त्रियों का मन समझने के लिए स्त्री ही होना चाहिए’ यह धारणा दामोदर खड़से ने अपने उपन्यास ‘बादल राग’ में गलत सिद्ध कर दी है। स्त्री केंद्रित अनुभवों को साहित्य-रूप देते समय केवल पारिवारिक, सामाजिक वास्तविकता का ही विश्लेषण काफी नहीं है, बल्कि स्त्री-मन की अंतर-व्यथा-वेदनाओं की दैहिक अनुभूतियों के परिणामों का भी ध्यान रखना होगा। दामोदर खड़से ने इस उपन्यास के माध्यम से इसे अभिव्यक्त किया है। दामोदर खड़से ने इस उपन्यास में सामाजिक रूढ़ियों, नीति-संकल्पनाओं की सुविधाजनक सीमाओं के पार जाकर स्त्री-मुक्ति का स्वावलंबी मार्ग तलाशने वाली नायिका का संघर्ष और उसकी दृढ़ता का यशस्वी चित्रण किया है। उन्होंने स्त्री-मुक्ति के सामाजिक-सांस्कृतिक पहलुओं के साथ शारीरिक और मानसिक आयामों का भी विचार किया है। शिक्षित स्त्री-पुरुषों का साथ आना केवल काम-वासना के लिए है तो वह पाप ही होगा। लेकिन, आत्म-भान जागृत स्त्री-पुरुष आपसी वैचारिक समानता-आधारित एक-दूसरे के व्यक्तित्व को आदरपूर्वक स्वीकार करते हैं तो यह स्त्रीत्व का सम्मान ही है। स्त्री-पुरुष समानता की पैरवी, स्त्रीवादी जीवनदृष्टि इस उपन्यास में बखूबी अभिव्यक्त हुई है।
बादल राग : दामोदर खड़से; भारतीय ज्ञानपीठ, 18, इंस्टीट्यूशनल एरिया, लोदी रोड, नई दिल्ली; 430 रुपए।

बांसुरीवाली
बालमन के कोमल धरातल पर कभी कुछ ऐसा अटका रह जाता कि बहता समय उस स्मृति को मिटा नहीं पाता, बल्कि उसे और गहरा करता जाता है। बचपन की एक बांसुरी का खो जाना किस तरह से एक व्यक्ति के जीवन-संगीत को विपन्न कर देता है, इसी कथाभूमि का वितान है यह उपन्यास।
एक रोचक कथा-सूत्र को राज कमल ने अपनी अद्भुत किस्सागोई के साथ उपन्यास में ढाला है। जीवन के एक लंबे कालखंड का बयान करती हुई इस किस्सागोई में रहस्य, रोमांच और कौतुक के साथ-साथ कहीं-कहीं जादुई यथार्थवाद की कौंध भी है जो उपन्यास को एक गहरी पठनीयता से संपृक्त तो करती ही है, साथ ही साथ वह अपने ही तरह से उपन्यास की मूल संवेदना को दीप्त भी करती है।
उपन्यास में तेजी से बदलते घटना-चक्र, रहस्य-रोमांच के नीचे कहीं गहरे एक लंबे समय में फैली हुई विषाद की परतें हैं, और जिसमें कहीं-कहीं प्रेम की रंगत भी है, जिसे राज कमल व्यक्त तो नहीं करते लेकिन एक अलक्षित भी नहीं रह पाती। बचपन की एक सहज सी घटना के सहारे एक बीहड़ यथार्थ को उकेरते हुए बहुमुखी प्रतिभा के धनी राज कमल इस उपन्यास के जरिए एक विशिष्ट कथाशिल्पी के रूप में उभर कर सामने आते हैं।
बांसुरीवाली : राज कमल; अमन प्रकाशन, 104-ए/80-सी, रामबाग, कानपुर; 200 रुपए।

सोचने पे पहरा है!
‘सोचने पे पहरा है’ अखलाक ‘आहन’ की एक तवील नज्म का उन्वान है और उनके पहले शेरी मज्मुआ का भी। ये नज्म तमामतर कातिलों और जान के दुश्मनों के खिलाफ गुस्से का ऐलान-नामा है। गुस्सा इसलिए कि ये वो हैं जो हमारी साझी विरासत, हमारी तहजीब और तमद्दुन के दुश्मन हैं। ये अवाम के दुश्मन हैं, जमहूर के दुश्मन हैं, मुल्क की तमामतर दौलत पर काबिज हैं और अवाम को नित-नए भेस में ठगते हैं। शा’इर पर परेशानी सिर्फ ये ही नहीं है कि किस-किस को फेहरिस्त में शामिल करे, बल्कि ये भी कि किस-किस से इस सब का जिक्र करें, कौन है जो उसकी बात पर कान धरेगा।
यह हमारे प्रजातंत्र का इतिहास है, हमारा विकास का मॉडल है, जिसमें व्यवस्था आगे बढ़ती जा रही है और लोग पीछे छूटते जा रहे हैं। व्यवस्था के इस मॉडल के एक-एक हिस्से की खबर लेने के बाद अखलाक आम लोगों के मानसिक दिवालिएपन पर भी नजर डालते हैं: ‘तेरी-मेरी ये फिक्रें/ मकड़ियों के जाले हैं/ इल जालों को तोड़े बगैर आजादी नहीं है, सोच पर पड़े हुए परदे हमें खुद ही नोच फेंकने होंगे।’ जब तक हमें विभाजित करने वाले इन पर्दों को नोच फेंकने के लिए हम नहीं उठ खड़े होते तब तक सोच पर लगे हुए पहरे भी बरकरार रहेंगे।
सोचने पे पहरा है! : अखलाक ‘आहन’; नयी किताब, 1/11829, प्रथम मंजिल, पंचशील गार्डन, नवीन शाहदरा, दिल्ली; 100 रुपए।

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