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किताबें मिलीं: ‘भाषा का समाजशास्त्र’ और ‘राग मारवा’

कतिपय भाषावैज्ञानिक सिद्धांतों को सरल भाषा में कैसे प्रस्तुत किया जाए, यह पुस्तक बतलाती है। जैसे भाषा की पारिस्थितिकी, भाषा का समाजशास्त्र, बहुभाषावाद आदि। इसके अलावा पैशाची भाषा पर वाद-विवाद-संवाद प्रस्तुत किया गया है, जो संकेत करता है कि कैसे हमारी भाषाएं लुप्त हो रही हैं।

Author January 27, 2019 5:05 AM
पुस्तक ‘भाषा का समाजशास्त्र’ और ‘राग मारवा’

भाषा का समाजशास्त्र
कतिपय भाषावैज्ञानिक सिद्धांतों को सरल भाषा में कैसे प्रस्तुत किया जाए, यह पुस्तक बतलाती है। जैसे भाषा की पारिस्थितिकी, भाषा का समाजशास्त्र, बहुभाषावाद आदि। इसके अलावा पैशाची भाषा पर वाद-विवाद-संवाद प्रस्तुत किया गया है, जो संकेत करता है कि कैसे हमारी भाषाएं लुप्त हो रही हैं। ‘जीवन की भाषा और भाषा के जीवन’ नामक अध्ययन में बिहार में प्रचलित हिंदी के रंग को बखूबी दिखाया गया है, किंतु यह स्पष्ट किया गया है कि हिंदी का यह स्वरूप ‘मानक’ हिंदी से भले भिन्न है, फिर भी उसकी सोंधी गंध और सुस्वाद अन्य क्षेत्रों से अलग हट कर है। यह विविधता स्वस्थ एवं जीवंत हिंदी की भी परिचायक है। आजकल लोक भाषाएं (मौखिक) अधोगति को प्राप्त हो रही हैं, इसलिए उनमें संग्रहीत देशज ज्ञान और लोक संस्कृति कलाओं का भी लोप हो रहा है, जो राष्ट्र से लेकर समुदाय तक के लिए चिंता एवं चिंतन का विषय है।

दो अध्यायों में भाषायी विविधता, प्राकृतिक विविधता और सांस्कृतिक विविधता से मानव जीवन के सशक्तीकरण का सवाल उठाया गया है। चार अध्यायों में स्थानीय-क्षेत्रीय भाषाओं की व्यथा-कथा, हिंदी भाषा की दशा और दिशा, मॉरिशस में भोजपुरी-हिंदी, तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी के जरूरी मुद्दों का सांगोपांग विवेचन है। अंतिम अध्याय में भाषाओं के जीवन-मरण की चर्चा के साथ खतरे में पड़ी भाषाओं को बचाने के उपायों की भी बात की गई है।
भाषा का समाजशास्त्र : सुभाष शर्मा; भारतीय ज्ञानपीठ, 18, इंस्टीट्यूशनल एरिया, लोदी रोड, नई दिल्ली; 470 रुपए।

राग मारवा
ममता सिंह के इस संग्रह में दस कहानियां शामिल हैं। आमतौर पर ममता लंबी कहानियां लिखती हैं और उनकी लेखन-प्रक्रिया का मूल तत्त्व वर्तमान से अतीत में चले जाना और अतीत से भविष्य में छलांग लगा देने जैसा है। उनका मूल कथा-स्वर संबंधों का राग-विराग, यादों की दुनिया में आवाजाही और पुराने मूल्यों के साथ सतत टकराव में निहित है। उनके पात्र नए समय में खड़े हैं, मगर वह पुराने समय की नैतिकताओं, मान्यताओं के साथ निरंतर मुठभेड़ में हैं। इस मुठभेड़ में जब वे टूटने को होते हैं तो पलायन के तौर पर अतीत की मोहक गलियों में सरक जाते हैं।

‘पानी पे लिखा खामोश अफसाना’ एक मार्मिक और कचोट देने वाली कहानी है, जो एक छोटी बच्ची की आंख से देखी माता-पिता के संबंधों में पड़ गई बारीक मगर तीखी दरार का औचक प्रकाशन करती है। ‘जनरल टिकट’ एक युवा महत्त्वाकांक्षी स्त्री के बनने, संघर्ष करने और टूट कर फिर से बनने की दारुण कथा है। ‘गुलाबी दुपट्टे वाली औरत’ एक अनपढ़ लेकिन सुंदर नेपाली कामगार स्त्री के संघर्षों का कोलाज है। संग्रह की सबसे बेहतरीन, अर्थपूर्ण, बड़े सरोकारों वाली, समय के सीमांत पर घटते बुरे प्रसंगों को रेखांकित करने वाली मर्मस्पर्शी कथा है ‘आखिरी कॉन्ट्रैक्ट’। इस कहानी का लोकेल मुंबई है जिसे देश का सबसे कॉस्मोपॉलिटन शहर कहा जाता है तथा जहां करोड़पति और भिखारी एक साथ लोकल ट्रेन में सफर करते हैं। सबको सबकी औकात में रखने वाली मुंबई में भी दो समुदायों के बीच कलुष और कपट की जो रेखा है, उसने धर्मनिरपेक्ष लोगों के जीवन को हताहत कर दिया है। बेहद निस्संगता के साथ यह कहानी दो समुदायों के बीच पसरे बनैले आतंक और अंधी नफरत का मार्मिक आख्यान रचती है। हिंदू स्त्री-मुस्लिम पुरुष- पति-पत्नी के खतरनाक समय और सच को यह कहानी गहरी वेदना के साथ आकार देने में सफल हुई है।
राग मारवा : ममता सिंह; राजपाल एंड संज, 1590, मदरसा रोड, कश्मीरी गेट, दिल्ली; 225 रुपए।

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