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किताबें मिलीं: ‘तीसरी परंपरा की खोज’, ‘आंचलिक अखबारों की राष्ट्रीय पत्रकारिता’, ‘आप कैमरे की निगाह में हैं’ और ‘तिनका तिनका मध्य प्रदेश’

अभी तक हिंदी में इतिहास लेखन की दो परंपराएं मानी जाती रही हैं- एक आचार्य रामचंद्र शुक्ल की और दूसरी आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की। एक ने तुलसी को केंद्र में रख कर साहित्य के प्रतिमान गढ़े, तो दूसरे ने कबीर को। इन्हीं दो परंपराओं की नजर से साहित्य को देखने-परखने का प्रयास होता रहा है।

Author Published on: March 10, 2019 6:02 AM
किताबें मिलीं: ‘तीसरी परंपरा की खोज’, ‘आंचलिक अखबारों की राष्ट्रीय पत्रकारिता’, ‘आप कैमरे की निगाह में हैं’ और ‘तिनका तिनका मध्य प्रदेश’

तीसरी परंपरा की खोज
अभी तक हिंदी में इतिहास लेखन की दो परंपराएं मानी जाती रही हैं- एक आचार्य रामचंद्र शुक्ल की और दूसरी आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की। एक ने तुलसी को केंद्र में रख कर साहित्य के प्रतिमान गढ़े, तो दूसरे ने कबीर को। इन्हीं दो परंपराओं की नजर से साहित्य को देखने-परखने का प्रयास होता रहा है। पर सुधाश पचौरी मानते हैं कि इन दोनों आचार्यों के बाद से अब तक समाज और साहित्य में बहुत कुछ बदल चुका है। साहित्य को पढ़ने का दृष्टिकोण बदला है। बहुत सारी अवधारणाएं बदली हैं। सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक स्थितियां बदली हैं। अस्मिताओं का संघर्ष बढ़ा है। वैचारिक दुनिया में काफी टूट-फूट हो चुकी है- भाषा के स्तर पर भी, कथ्य के स्तर पर भी। इसलिए दुनिया भर में इतिहास लेखन की पुरातन परिपाटी को बदलने की वकालत हो रही है। नव्य इतिहासशास्त्र मानता है कि मनुष्य के जीवन से जुड़ी हर चीज इतिहास होती है, वह केवल राजाओं और सत्ताओं का लेखाजोखा नहीं होता। ऐसे में सुधीश पचौरी कहते हैं कि दूसरी परंपरा से आगे बढ़ कर तीसरी परंपरा की खोज होनी चाहिए।

यह पुस्तक हिंदी साहित्य के उपलब्ध इतिहासों की अब तक न देखी गई सीमाओं को उजागर करते हुए हिंदी साहित्य के इतिहास के पुनर्लेखन का एक नया दरवाजा खोलती है। ‘नव्य इतिहासशास्त्र’ के आगमन के बाद एक हजार बरस के हिंदी इतिहास को सिर्फ दो आचार्यों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। उत्तर-आधुनिक नजरिए, उत्तर संरचनावादी विखंडनवादी पद्धति, मिशेल फूको की इतिहास लेखन पद्धति, ग्रीनब्लाट और हैडन वाइट आदि के विचारों से विकसित ‘नव्य इतिहासशास्त्र’ ने इतिहास लेखन के क्षेत्र में आज एक भारी क्रांति पैदा कर दी है।

पर यह तीसरी परंपरा क्या है, क्या हो सकती है, कैसी हो सकती है, इस बारे में सुधीश पचौरी अनेक पाश्चात्य विचारकों के भाषा और साहित्य संबंधी संरचनावादी, विखंडनवादी आदि तर्कों को सामने रखते हुए एक खाका तैयार करते हैं। उसमें पाठ और उसके अर्थों के आयाम खोलते हैं और फिर इतिहास में साहित्य की जगह तलाशते हैं। वे मानते हैं कि इतिहास अपने आप में एक आख्यान है, एक कहानी है, इसलिए आख्यान भी, कहानी भी अपने आप में एक इतिहास है। जब वे हिंदी साहित्य के इतिहास की तीसरी परंपरा की बात करते हैं, तो रामचंद्र शुक्ल और हजारी प्रसाद द्विवेदी की व्याख्याओं में जहां-तहां पड़ी दरारों को उजागर करते और फिर रेखांकित करते हैं कि यह नई दृष्टि से किस तरह ठीक नहीं है। वे कहते हैं- ‘जो इतहासकार एक सीधी-सरल रेखा में इतिहास को हुआ समझते हैं और उसमें आए ब्रेकों और व्यवधानों, दरारों और फाल्ट लाइनों को भूल जाते हैं, वे उन्हीं ब्रेकों, दरारों और गड्ढों में गिरने को अभिशप्त होते हैं।’
तीसरी परंपरा की खोज : सुधीश पचौरी; वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 295 रुपए।

आंचलिक अखबारों की राष्ट्रीय पत्रकारिता
यह किताब आंचलिक पत्रकारिता के संघर्षों, जनहित में लड़े आंदोलनों को, आर्थिक बदहाली के बावजूद तटस्थता को तो नजदीक से दिखाती ही है, उससे जुड़े पसीने की महक, आत्मसंतुष्टि का स्पंदन और कुछ करने की ख्वाहिश में किए दुस्साहस से भी रूबरू कराती है। इस किताब का दूसरा सुखद पहलू यह है कि इसने क्षेत्रीय अखबारों की उन चर्चित रपटों को शामिल किया है, जिन्होंने अखबारों को पहचान दी। जिनके चर्चे न सिर्फ देश में हुए, बल्कि विदेशों में उनकी गूंज हुई। यह किताब कारवां है कल के उन सुनहरे पलों का, जिसे आंचल में बांध कर आंचलिक पत्रकारिता समृद्ध हुई है। यह एक जरूरी डाक्युमेंटेशन है, जो पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखने वाले हर शख्स के लिए घुट्टी की तरह काम करेगा। इस घुट्टी में अनुसंधान की तरलता है, अनुभवों का रस है, विचारों की कड़वाहट है, फिर भी सरोकारों की पौष्टिकता है।
आंचलिक अखबारों की राष्ट्रीय पत्रकारिता : हरीश पाठक; प्रकाशन संस्थान, 4268-बी/3, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली; 995 रुपए।

आप कैमरे की निगाह में हैं
रामनगीना मौर्य आम जनजीवन की घटनाओं को अपनी कहानी का विषय बनाते हैं। दफ्तरी जीवन, घर-परिवार के भीतर घटित होने वाली घटनाएं, गांव-जवार की तकलीफें। इस तरह इनकी कहानियां मानव मन की भीतर हलचलों पर केंद्रित रहती हैं। इस संग्रह में उनकी जो आठ कहानियां संकलित हैं, उनकी विषय-वस्तु इसी तरह की घटनाओं से रची-बनी है। वे मानते भी हैं कि संसार घटनाओं से भरा पड़ा है। महत्त्वपूर्ण है हमारे देखने का नजरिया। इसलिए वे हर घटना में कुछ नया तलाशते हैं और फिर उसे सिलसिलेवार ढंग से परोस देते हैं। इस तरह उनकी कहानियां एक सतत चलने वाली घटना की तरह प्रतीत होती हैं। स्वाभाविक ही उनकी भाषा में प्रवाह बना रहता है।
आप कैमरे की निगाह में हैं : रामनगीना मौर्य; रश्मि प्रकाशन, 204, सनशाइन अपार्टमेंट, बी-3, बी-4, कृष्णानगर लखनऊ; 125 रुपए।

तिनका तिनका मध्य प्रदेश
तिनका तिनका फाउंडेशन ऐसा मंच है, जो पूरी तरह से जेल में सृजन को समर्पित है। तिनका तिनका तिहाड़ से इसकी शुरुआत हुई। वर्तिका नंदा लंबे समय से देश की विभिन्न जेलों में कैदियों के साथ काम करती आ रही हैं। वे कैदियों में रचनात्मकता के विकास और उनकी रचनाओं के प्रकाशन का कार्य करती रही हैं। इस क्रम में वे कैदियों के निजी जीवन को भी जानने-समझने का प्रयास करती रही हैं।
प्रस्तुत किताब में मध्य प्रदेश की जेलों की टोह ली गई है। इस किताब का मकसद किसी भी बंदी के अपराध या उसे मिली सजा पर टिप्पणी करना नहीं है और न ही उसके अपराध को जायज या नाजायज ठहराना। यह प्रयोग जेलों में उम्मीद का संगीत है, क्योंकि तकरीबन सभी बंदी एक बार फिर उसी समाज का हिस्सा बनेंगे, जिससे वे इस समय कटे हुए हैं। यह प्रयोग समाज और जेलों के बीच पुल बनाने का एक प्रयास है, ताकि बंदी जब इस पुल को पार कर फिर से समाज में पहुंचें तो उनके मन में बदलाव का पौधा रोपा जा चुका हो।

तिनके-दर-तिनके के ऐसे प्रयोग जंग लगे कुछ तालों को खोलने में काफी मददगार साबित हुए हैं। इस किताब का हर पन्ना जेल के उस चेहरे से मिलवाता है, जो काफी हद तक अनजाना और अनछुआ है। इसमें इस्तेमाल किए गए सभी बिंब हकीकत हैं। इसके कथावाचक भी अनोखे हैं। रंगों, तस्वीरों, कविताओं और खुले शब्दों के जरिए यह किताब जेलों के सभी तहखानों को खोलती जाती है। दुनिया के मानवाधिकार के दावों के बीच यह किताब एक दमदार अध्याय साबित होगी, जिसे कई पीढ़ियों तक बांचा जा सकेगा।

किताब के अंतिम हिस्से में वर्तिका इस किताब के बनने की कहानी बताती हैं- ‘बंदियों की कथा को सिर्फ दीवारें। जेल में काम करने वाले कर्मचारियों की कथा के श्रोता भी दीवारें ही हैं। जेल कर्मचारियों की लंबी ड्यूटी का असर यह होता है कि वे भी भी बंदियों की ही तरह समाज से कट जाते हैं। अक्सर जेल के अंदर ही कर्मचारियों और बंदियों के आपसी नाते से नए परिवार बनते जाते हैं। इस तरह कई जेलें एक साथ चलती हैं। शहरों से दूर बसाई गई जेलें द्वीप की तरह अपनी अंदरूनी शक्ति से संचालित होती हैं। मीडिया के लिए भी जेल से आने वाली कोई बुरी खबर तो समाचार बनती है, लेकिन भावनाओं से उपजता सरोकार नहीं। मध्य प्रदेश जेल प्रशासन की तरफ से जेलों को बार-बार देखने की इजाजत मिलने की वजह से यह किताब ठीक वैसा आकार ले सकी है, जैसी तमन्ना थी।’
तिनका तिनका मध्य प्रदेश : वर्तिका नंदा; तिनका तिनका फाउंडेशन, नई दिल्ली; 995 रुपए।

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