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किताबें मिलीं: ‘पटना:खोया हुआ शहर’, ‘साक्षात्कार के आईने में’ और ‘षोडशी : रामायण के रहस्य’

पटना : खोया हुआ शहर अपनी मृत्यु के कुछ महीने पहले बुद्ध ने पाटलिपुत्र की महानता की भविष्यवाणी की थी। कालांतर में पाटलिपुत्र मगध, नंद, मौर्य, शुंग, गुप्त और पाल साम्राज्यों की राजधानी बनी। पाटलिपुत्र के नाम से विख्याल प्राचीन पटना की स्थापना 490 ईसा पूर्व में मगध सम्राट अजातशत्रु ने की थी। गंगा किनारे […]

Author March 17, 2019 4:04 AM
किताबें मिलीं: ‘पटना:खोया हुआ शहर’, ‘साक्षात्कार के आईने में’ और ‘षोडशी : रामायण के रहस्य’

पटना : खोया हुआ शहर

अपनी मृत्यु के कुछ महीने पहले बुद्ध ने पाटलिपुत्र की महानता की भविष्यवाणी की थी। कालांतर में पाटलिपुत्र मगध, नंद, मौर्य, शुंग, गुप्त और पाल साम्राज्यों की राजधानी बनी। पाटलिपुत्र के नाम से विख्याल प्राचीन पटना की स्थापना 490 ईसा पूर्व में मगध सम्राट अजातशत्रु ने की थी। गंगा किनारे बसा पटना दुनिया के उन सबसे पुराने शहरों में से एक है, जिसका एक क्रमबद्ध इतिहास रहा है।
मध्यकाल में विदेशों से आने वाले पर्यटकों की संख्या में काफी इजाफा हुआ। वह यह वक्त था जब पटना की शोहरत देश की सरहदों को लांघ विदेशों तक पहुंच गई थी। यह मुगल काल का स्वर्णिम युग था। पटना उत्पादन और व्यापार के केंद्र के रूप में देश में ही नहीं विदेशों में जाना जाने लगा। सत्रहवीं सदी में पटना की शोहरत हिंदुस्तान के ऐसे शहर के रूप में हो गई थी, जिसके व्यापारिक संबंध यूरोप, एशिया और अफ्रीका जैसे महादेशों के साथ थे।
ईस्ट इंडिया कंपनी और ब्रिटिश इंडिया में पटना और उसके आसपास के इलाकों में शोरा, अफीम, पॉटरी, चावल, सूती और रेशमी कपड़े, दरी और कालीन का उत्पादन बड़े पैमाने पर होता था। पटना के दीघा फार्म में तैयार उत्पादों की जबरदस्त मांग लंदन के आभिजात्य लोगों के बीच थी। विदेशी पर्यटक और यात्री कौतूहल के साथ पटना आते। उनके संस्मरणों में तत्कालीन पटना सजीव हो उठता है।
पटना : खोया हुआ शहर : अरुण सिंह; वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 595 रुपए।

साक्षात्कार के आईने में
लेखक का दायित्व अपने पाठकों और समाज के प्रति भी होता है। इसलिए अपने लेखन को लेकर उनके प्रति उसकी जवाबदेही बनती है। समय-समय पर पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों, दूरदर्शन और मीडियाकर्मी, पाठक और समीक्षक लेखक को कठघरे में खड़ा करते हैं। लेखक उनके समक्ष प्रस्तुत होकर उनके संवाद करता है, उनके प्रश्नों का, जिज्ञासाओं का निराकरण भी करता है। इसी क्रम में यह पुस्तक भी है।
समय-समय पर आलोचकों, पत्र-पत्रिकाओं के संवाददाता, विश्वविद्यालयों के प्राध्यापकों, शोधार्थियों और पाठकों द्वारा लिए गए कमल कुमार के साक्षात्कार, रचनाकार और उसकी रचनाधर्मिता का विचार-विमर्श प्रस्तुत करते हैं। इनमें उनके व्यक्तित्व, उनके कृतित्व और उनकी लेखन प्रक्रिया का उद्घाटन हुआ है। साथ ही कमल कुमार की शैक्षिक, पारिवारिक, सामाजिक स्थिति उनके परिवेश, उनके मूल्य और मान्यताओं का परिचय मिलता है।
कमल कुमार अपने लेखन में वे जितनी गहन और विस्तीर्ण हैं, अपने जीवन में और व्यवहार में उतनी ही आत्मीय और उदार भी हैं। उनमें न कोई ठसपना है और न ही अहंकार है। अपनी-सी, सहज और सादगी में ‘विशिष्ट’ हैं। विभिन्न वर्गों के लोगों द्वारा लिए उनके उनके ये साक्षात्कार उनको जानने, समझने और परखने के लिए पाठकों और शोधार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होंगे।
साक्षात्कार के आईने में : कमल कुमार; अमन प्रकाशन, 104-ए/80 सी, रामबाग, कानपुर; 395 रुपए।

षोडशी : रामायण के रहस्य
महाकवि शेषेंद्र शर्मा ने वाल्मीकि के शब्द-प्रयोगों और उपमा-विधान में छिपे हुए अर्थों का गहन शास्त्रीय विवेचन कर उनके तांत्रिक अभिप्रायों तथा विधापरक अर्थों को उद्घाटित किया है। रामायण की अनेक व्याख्याएं उपलब्ध हैं, इनमें उसमें सन्निहित शास्त्रीय रहस्यों का विवेचन किया गया है, किंतु तांत्रिक रहस्यों को जिस प्रकार शेषेंद्र शर्मा ने उद्घाटित किया है, वह अनूठा है। यह दृष्टि संप्रदाय से प्राप्त होती है। शर्माजी ने रामायण के सुंदरकांड का महत्त्व विशेष रूप से उद्घाटित किया है। सुंदरकांड में निहित कुंडलिनी-योगपरक अर्थ और भगवती सीता की पराशक्ति त्रिपुर सुंदरी से ऐक्य के रहस्य को गहन शास्त्रीय विवेचन द्वारा प्रकाशित किया गया है। इस प्रसंग में पग-पग पर श्रीलीला सहस्रनाम, भास्करराय के उस पर भाष्य, वामकेश्वरतंत्र आदि का प्रमाण देकर किया गया है। सुंदरकांड में सन्निहित आगमिक-तांत्रिक अभिप्रायों का प्रकाशन न सिर्फ गहरे शास्त्रीय अध्ययन की अपेक्षा करता है, बल्कि उसके लिए लंबी साधना की आवश्यकता है। शेषेंद्र शर्मा के विवेचन का सार यह है कि रामायण में समयाचार और कौलाचार दोनों का प्रतिपादन है।
षोडशी- रामायण के रहस्य: शेषेंद्र शर्मा; गुंटूर शेषेंद्र शर्मा मेमोरियल ट्रस्ट, हैदराबाद; 400 रुपए।

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