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किताबें मिलीं: जलावतन

यह किताब नाना किस्म की जलावतनी पर है, जिसमें न केवल मनुष्य, नाते-रिश्तेदार, पशु-पक्षी, हवा-धूप-रंग, अपनी-अपनी संस्कृति के विरसे की तमाम इमेजेज और उनके ही बीच से वस्तु-अंतर्वस्तु से बनती ज्ञानात्मक-सी कोई चीज है।

Author Published on: September 1, 2019 1:54 AM
जलावतन किताब

लाधर मंडलोई की छवि कवि के अलावा संस्कृति विचारक, साहित्यिक पत्रकार, आडियो-वीडियो इमेजेज के विद्यार्थी, फिल्म निर्माण निर्देशन की पकी-अधपकी दृष्टि या गफलत की है, जो करते हैं अलग करते हैं। उन्होंने परसाई, ज्ञानरंजन, कुमार गंधर्व, श्रीकांत वर्मा, मुक्तिबोध, शीन काफ़ निज़ाम, चेखव से लेकर जेल के कैदियों पर कुछ फिल्में भी की हैं। उनकी छायाकारी को देख कर कह सकते हैं कि बंदे में एक जुदा समझ है लेंडस्केप, पोर्ट्रेट से लेकर अमूर्त तक। उनकी यह किताब नाना किस्म की जलावतनी पर है, जिसमें न केवल मनुष्य, नाते-रिश्तेदार, पशु-पक्षी, हवा-धूप-रंग, अपनी-अपनी संस्कृति के विरसे की तमाम इमेजेज और उनके ही बीच से वस्तु-अंतर्वस्तु से बनती ज्ञानात्मक-सी कोई चीज है। लीलाधर मंडलोई कवि-कलाकार न अपनी धरती छोड़ता है न सृष्टि को। इस संग्रह में सीरिया, इराक और फिलस्तीन सहित कई देशों की जलावतनी के मार्मिक संदर्भ हैं इसलिए वे उन कवियों से अलग लगते हैं जो दृश्यात्मक स्मृतियों से अपने को काट कर इस समय के हृदयहीन जगत के बाशिंदे हो गए हैं। अधिकतर पठारी, नगरीय, महानगरीय पूंजीवादी परिवेश की इमेजेस से स्मार्टली काम चला रहे हैं। संग्रह में वैश्विक करुणा की इमेजेज हैं। हम अधिकांशत: इमेजेज में रहते, जीते हैं। इमेजेज का लोक भले ही किसी को आकर्षक या मौजंू लगे, लेकिन कवि इसे बेहतर पकड़ता है। संग्रह की कविताएं प्रभावशाली होने के साथ आपको सोचने-समझने के लिए न केवल झकझोरती हैं बल्कि आपका पीछा करती चलती हैं।
जलावतन : लीलाधर मंडलोई; भारतीय ज्ञानपीठ, 18, इंस्टीट्यूशनल एरिया, लोदी रोड, नई दिल्ली; 150 रुपए।

क्यों तेरा राह गुजर याद आया
ज के सूचना-तंत्र, मीडिया, इंटरनेट, मोबाइल और नए अर्थ-तंत्र के उभार के साथ सूचना विस्फोट की जो आंधी चली, उसमें सदियों पुरानी रिवायतें ढेर होती गई हैं। ऐसे में पत्र कैसे बचता? कभी वक्त था दिन में दो-दो बार पत्रों के पुलिंदे आते और हम उनमें घंटों खोए रहते। अपनों से मिलने की अनुभूति- आधी मुलाकात जैसे पत्र हमें गहरी संवेदनाओं से समृद्ध कर देते, विचारों को झकझोर देते, अंतर्मन में खलबली मचा देते और हमें खुशी और गम, सुख और अवसाद, उल्लास और त्रास जैसे मनोवेगों में घंटों लपेटे रहते। पत्रों की आवाजाही इतना कुछ कहती रही है, जितना किसी अन्य तरीके से नहीं कहा जा सकता। इसमें संदेह नहीं कि पत्र एक तरह के विरेचन, मुक्ति-विमुक्ति के रास्ते रहे हैं। लेकिन अब वह बात कहां? उनके न आने से दिल-दिमाग के कई कोने खाली हो गए हैं और सीधी-सच्ची, खरी-खोटी, गहरी-आत्मीय बातचीत से गूंजती जगहें सिकुड़ गई हैं।

प्रस्तुत पुस्तक में लेखक के अपने समकालीनों के साथ पत्र संवाद हैं। ये पत्र 1970 से 2019 के काल-खंड के कई अंतरालों, कई रचना-पीढ़ियों, कई प्रादेशिक अस्मिताओं को समेटे हुए हैं। इनसे गुजरते हुए आप भी किस्म-किस्म के लेखकीय अनुभवों और विचारों से परिचित होंगे।
क्यों तेरा राह गुजर याद आया : नरेंद्र मोहन; हंस प्रकाशन, 4648/21, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली; 595 रुपए।

लोकमंच और समकालीन हिंदी रंगमंच का स्त्री-विमर्श
टकों में दो तरह की स्त्रियां आती हैं। एक वे जिनकी पृष्ठभूमि में नाटक के क्षेत्र में काम करने वाले संबंधी होते हैं। उन्हें परिवार की ओर से सहयोग और प्रशंसा दोनों मिलती हैं। नाटकों में काम करने के निश्चित घंटे नहीं होते। सभी दिन काम के होते हैं। आर्थिक दृष्टि से भी इसमें कोई लाभ नहीं होता। तो ऐसी स्त्रियां भी इस क्षेत्र में हैं जिन्हें घर से कोई सहयोग नहीं मिलता। उन्हें दोहरी तिहरी भूमिकाएं निभानी पड़ती हैं। परिवार में और नाटक की कर्मभूमि में सामंजस्य बैठाना पड़ता है। उनके मार्ग में बहुत सी बाधाएं भी आती हैं। कई तरह के कष्ट झेलने पड़ते हैं। छोटे बच्चे को साथ लेकर भी आना पड़ता है। परंतु आपसी सहयोग से सब मुश्किल आसान हो जाती है। स्त्रियां नाटकों में हर भूमिका निभा रही हैं। वे स्क्रिप्ट लेखक हैं, अभिनेता हैं, मंच संचालक हैं और निदेशक की बहुआयामी भूमिकाओं को निभा रही हैं। साथ ही मंचन के नए प्रयोग भी कर रही हैं। नाटकों के चुनाव में, कथ्य के प्रति सतर्क दृष्टि और निर्देशन में पुरुष कर्मियों से अलग उनकी अपनी स्त्रीवादी दृष्टि है। इनका ‘अपना सच’ है जिसका उद्घाटन होता है।
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में दाखिले के लिए भी लड़कियों की संख्या लड़कों से अधिक होती है, जिसके लिए मंच पर दोनों को समान अवसर देने के लिए विशेष कार्य पद्धति अपनानी पड़ती है। इस स्थिति में एक सामाजिक विसंगति तो है परंतु स्त्री के भीतर की रचनात्मक संवेदना उन्हें नाटक के कठिन क्षेत्र में ले आती है। वे अपने कर्म में और उद्देश्य में सफल भी होती हैं। निर्णायक ऊंचाई पर पहुंचती भी है। इस पुस्तक में इन्हीं स्त्रियों की कहानी इनकी ही जुबानी प्रस्तुत की गई है।
लोकमंच और समकालीन हिंदी रंगमंच का स्त्री-विमर्श : कमल कुमार; राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, बहावलपुर हाउस, भगवानदास रोड, नई दिल्ली; 200 रुपए।

पतरकी
शीष त्रिपाठी के इस उपन्यास में सामाजिक सरोकारों और मानवीय संवेदनाओं का समुचित प्रयोग किया गया है। यह उपन्यास उस भारतीय जनमानस का प्रतिबिंब है जो लोक में रचा-बसा है, जहां व्यक्ति के व्यक्तिगत संदर्भ सदैव ही समाज के समक्ष अपूर्ण रहे हैं क्योंकि व्यक्ति स्वयं लोक-हित को स्वयं से उच्च रख कर जीता है। समकालीन सामाजिक ताने-बाने में बुनी व्यक्ति के समाज में रहकर विजयी हो पाने की संचेतना लिए ‘पतरकी’ साहित्य के कई मानदंडों पर खरी उतरती है। पात्रों का गढ़न उपन्यासकार की सजग कल्पना को परिलक्षित करता है जहां पात्र पाठक के समक्ष जीवंत हो उसके आसपास दिखते हैं।
उपन्यास जिन सामाजिक बुराइयों की ओर ध्यान दिलाता है उनमें चुनाव और उससे उपजे दुष्परिणाम और दुर्व्यसन प्रमुख हैं जो समाज की सार्थक संकल्पना और बल को क्षीण करते हैं। शराब, जिसका दुरुपयोग उच्च वर्ग सत्ता हथियाने को करता है, वह उन्हीं घरों में त्रासदी का कारण बनती है। उपन्यास प्रेम के चित्रण में उन सभी स्थापित मापदंडों को तोड़ता है जहां प्रेम रूमानी और शारीरिक परिधि में दिखकर क्षणिक सुख देता हो। शिक्षक बृजभानलाल के कहे शब्द- ‘‘प्रेम में ‘न पाने’ का शोक नहीं अपितु समर्पण का उत्साह होना चाहिए।…’’
पात्रों की भाषा का वैविद्य मनोहारी है, जो उसी समाज की प्रचलित भाषा को बिना किसी बनावट के प्रयोग में लाते हैं, और यह कथानक को सुरुचिपूर्ण बना देता है। संयमित कथानक और सधी प्रस्तुति के साथ कितने ही गंभीर संदेश इस उपन्यास में समाहित हैं।
पतरकी : आशीष त्रिपाठी; यश पब्लिकेशंस, 1/10753, गली नं. 3, सुभाष पार्क, नवीन शाहदरा, दिल्ली; 250 रुपए।

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