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किताबें मिलीं: ‘ग्रियर्सन: भाषा और साहित्य चिंतन’ और ‘बोहनी’

जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन (डबलिन, आयरलैंड, 1851-1941) बहुभाषाविद् और आधुनिक भारत में भाषाओं का सर्वेक्षण करने वाले पहले भाषावैज्ञानिक थे। वे 1870 के लगभग आईसीएस होकर भारत आए।

‘ग्रियर्सन: भाषा और साहित्य चिंतन’ और ‘बोहनी’

ग्रियर्सन: भाषा और साहित्य चिंतन
जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन (डबलिन, आयरलैंड, 1851-1941) बहुभाषाविद् और आधुनिक भारत में भाषाओं का सर्वेक्षण करने वाले पहले भाषावैज्ञानिक थे। वे 1870 के लगभग आईसीएस होकर भारत आए। वे बंगाल और बिहार के कई उच्च पदों पर 1899 तक कार्यरत रहे। फिर वापस आयरलैंड चले गए। भारत में रहते हुए ग्रियर्सन ने कई क्षेत्रों में काम किया। तुलसीदास और विद्यापति के साहित्य का महत्त्व प्रतिपादित करने वाले वे संभवत: पहले अंग्रेज विद्वान थे। हिंदी क्षेत्र की बोलियों के लोक साहित्य (गीत-कथा) का संकलन और विश्लेषण करने वाले कुछेक विद्वानों में थे।

आलोचना और वैचारिक चिंतन के क्षेत्र के सुपरिचित आलोचक अरुण कुमार ने ग्रियर्सन के भाषा और साहित्य के अनेक पक्षों को उभारा है साथ ही उनकी सीमा या कहें, बुनियादी मकसद को भी सामने रखा है। लेखक के अनुसार हिंदी प्रदेश को बांटने और उसे एक न मानने के पीछे ग्रियर्सन की समझ काम कर रही थी। आश्चर्य यह कि बिहार में रह कर उनकी भाषिक समझ लगभग ब्रिटिश राज की दृष्टि से भिन्न नहीं थी जबकि कश्मीर से लेकर पाक स्थित उत्तर-पश्चिमी प्रांत अफगानिस्तान की पश्तो भाषा आदि के विषय में ग्रियर्सन की दृष्टि कमोबेश संतुलित और प्रासंगिक थी। अरुण कुमार ने ऐसे अनेक आयामों को समझा और उनका विश्लेषण किया है।
ग्रियर्सन : भाषा और साहित्य चिंतन : अरुण कुमार; वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 695 रुपए।

बोहनी
प्रस्तुत संग्रह की कहानियों की रचनाकार भूमिका द्विवेदी ने हिंदी की समकालीन दुनिया में बड़ी तेजी से अपनी पहचान बनाई और लगातार लिखा। एक नए रचनाकार के लिए साहित्यिक परिदृश्य पर बने रहना जरूरी होता है। वे अंग्रेजी साहित्य की अध्येता रही हैं और हिंदी साहित्य की अनुरागी भी। उन्होंने कई कालजयी लेखकों को पढ़ा और अपनी सृजनात्मकता के विकासक्रम में कुछ ग्रहण किया है। उनकी कहानियां हमेशा पेचीदा विषय उठाती और नायिका को बिना किसी आदर्शवादी मुलम्मे के प्रतिरोधी भूमिका में पेश करती हैं। ‘मैं राइटर बनना चाहती हूं’ लेखिका के स्कूली दिनों का भावोच्छवास है। इस लेखिका के पास जीवन के तिक्त-मधुर अनुभवों का भंडार है, जिसकी छोटी-सी झलक इस संग्रह में आ पाई है।

इस संग्रह में कुल तेरह कहानियां संकलित हैं। इन कहानियों में किशोर बेटे खो चुकी चरम गमजदा मांओं के आंसू भी हैं, शादी नाम का लबादा ओढ़ कर बलात्कार करते पति की नृशंसता भी है। यहां दोस्तों का दोस्त शराबी विशंभर भी है, कर्जे की मार से क्षत-विक्षत जहरूल हसन भी है, जो मजबूर मेकअप से लिपटी वेश्या के विस्तर पर बैठा कोई करिश्माई सिफत अपनी चिथड़ी होती झोली में समेट रहा है। और ‘एक पैकेट दूध’ के लिए तन का मान चीथड़ों में बदलती एक मां ‘लछमी’ भी है, पिता-पुत्री के कालिखशउदा दूषित ताल्लुकात की झलक भी है, किशोरी से प्रौढ़ा हुई पूनम यादव का कुटिलत प्रतिशोध भी है, जो सियासी गलियारों में नए अहम समीकरण बनाता और बिगाड़ता है। एक मेधावी संघर्ष में आकंठ मुब्तला विद्यार्थी के सच होते मासूम सपने भी हैं, जिसे महज एक रायटर बनना है।
बोहनी : भूमिका द्विवेदी; भारतीय ज्ञानपीठ, 18, इंस्टीट्यूशनल एरिया, लोदी रोड, नई दिल्ली; 220 रुपए।

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