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किताबें मिलीं: स्वाधीन होने का अर्थ और कविता, साहित्य में अनामंत्रित, मन

स्वाधीनता के अर्थ की तलाश आजादी के बाद की कविता का एक प्रमुख स्वर ही नहीं है, केंद्रीय सरोकार भी है। इसकी अभिव्यक्ति कवि-दृष्टि के विभिन्न हिस्सों के तौर पर कई कविता पीढ़ियों और कविता दौरों से होती हुई आज एक नए मुकाम पर है- एक नई भाषा, काव्य-मुहावरे और शिल्प की खोज में संलग्न।

Author Updated: August 25, 2019 5:35 AM

स्वाधीन होने का अर्थ और कविता

राजनीतिक स्वतंत्रता के बावजूद, आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से स्वाधीन होने के वास्तविक अर्थ को पाने के लिए जो बड़े-बड़े उपक्रम किए गए, वे हमारी सोच, संवेदना और मानसिकता से तालमेल के अभाव में विफल होते रहे और आर्थिक-सामाजिक रूपांतरण की प्रक्रिया से आम जन वंचित ही रहा। ऐसे में प्रतिरोध, विद्रोह और संघर्ष के सिवा कविता की स्पेस को बचाने का और रास्ता ही क्या है? इसी का एक ग्राफ प्रस्तुत करती है यह पुस्तक ‘स्वाधीन होने का अर्थ और कविता’। इसमें कविता के विभिन्न दौरों से गुजरते हुए इस तरफ भरपूर संकेत हैं। आजादी के बाद की कविता को समझने-समझाने के एक जरूरी प्रयत्न के रूप में इस पुस्तक को देखा जा सकता है।

स्वाधीनता के अर्थ की तलाश आजादी के बाद की कविता का एक प्रमुख स्वर ही नहीं है, केंद्रीय सरोकार भी है। इसकी अभिव्यक्ति कवि-दृष्टि के विभिन्न हिस्सों के तौर पर कई कविता पीढ़ियों और कविता दौरों से होती हुई आज एक नए मुकाम पर है- एक नई भाषा, काव्य-मुहावरे और शिल्प की खोज में संलग्न। स्वाधीनता परवर्ती कविता की वस्तु, भाषा और मुहावरे में इधर दिख रहे परिवर्तनों के बल पर नए आलोचनात्मक आधारों की खोज नरेंद्र मोहन की इस पुस्तक में देखी जा सकती है।
स्वाधीन होने का अर्थ और कविता : नरेंद्र मोहन; अमन प्रकाशन, 104-ए/80 सी, रामबाग, कानपुर; 495 रुपए।
साहित्य में अनामंत्रित
प्रस्तुत पुस्तक अभय कुमार दुबे द्वारा समय-समय पर लिखे गए लेखों का संग्रह है। भाषा-साहित्य और समाज-विज्ञान से जुड़े मुद्दों के बीच आवाजाही इस संग्रह की खास विशेषता है। समाज-विज्ञान की ठोस भूमि पर खड़े होकर लेखक साहित्य-संवेदना की थाह लेने का प्रयास करते हैं। अंतर्विद्याश्रई अध्ययन की यह प्रक्रिया रचनात्मक साहित्य की आलोचना को मूल्यांकन का विशिष्ट आयाम प्रदान करती है।
पश्चिमी अवधारणाओं, सैद्धांतिकियों, बहस-मुबाहिसों और दृष्टियों के संदर्भ में साहित्यिक कृतियों का भाष्य करते हुए भारतीय सामाजिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, राजनीतिक परिदृश्य की जमीनी हकीकत निरंतर उनकी निगाह में रहती है। देशकाल निरपेक्ष अवधारणा को वे स्वीकार नहीं करते। नई-पुरानी रचनाओं को अस्मितामूलक विमर्शों के संदर्भ में जांचते हुए उन्होंने आलोचना के परिदृश्य का विस्तार किया है। आधुनिकता के भारतीय स्वरूप की कई कोणों से पड़ताल करते हुए वे इस क्षेत्र में रामविलास शर्मा के साहित्यक-सांस्कृतिक चिंतन पर विस्तार से विचार करते हैं। साहित्य और समाज विज्ञान के बीच खानेदारी को खारिज करते हुए दुबेजी मानते हैं कि समाज-विज्ञान का ‘नाक-नक्श’ बनाने में और उसके मार्गदर्शन में साहित्य ने बड़ी भूमिका अदा की है।
साहित्य में अनामंत्रित : अभय कुमार दुबे; सस्ता साहित्य मंडल प्रकाशन, एन-77, पहली मंजिल, कनॉट सर्कस, नई दिल्ली; 350 रुपए।

मन
संदीप की इस किताब में एक ही कविता है- मन। इस लंबी कविता में मन की अनेक प्रकार की अनुभूतियों का विश्लेषण किया गया है। हर इंसान यह सोचता है कि वह जिंदगी जी रहा है, लेकिन वह सिर्फ जिंदा होता है, जिंदगी को समझता नहीं है। वह संसार के अनेक प्रतिबिंब अपने भीतर महसूस करता है और प्रतिक्रिया में उसके मन में दुख, दर्द, क्रोध, निराशा और खुशी जैसे तमाम तरह के क्षणिक अहसास पनपते हैं। इन्हें समझे बिना वह सारी उम्र बाहर देखते एक विशेष अहसास का स्थायित्व ढूंढ़ता रहता है। इसे वह कहता तो खुशियां हैं, परंतु जानता नहीं कि उसे ये चाहिएं क्यूं? अगर वह अपने आप को अपने शरीर और मस्तिष्क से बाहर निकाल पाए तो उसकी अच्छाइयों और बुराइयों का हर प्रारूप विस्तृत रंगों में स्पष्ट नजर आता है, अगर वह इसे समझ ले, स्वीकार कर ले तब वह देख सकता है कि ‘‘वो जो सबसे सुंदर है, वो उसके भीतर है’’… ‘‘वो जो खो चुका, वो उसके भीतर सजा हुआ है’’,… ‘‘वो जिसे महसूस करता है, वो उसके भीतर ईश्वर बन चुका है’’… ये इतना अद्भुत होता है कि वो जीवन की तीक्ष्णतम वेदना के क्षणों में भी खुशियों का स्थायित्व पाता है और हर कड़वी बात, चुभती याद पर मुस्कुराता है।
मन : संदीप; नोशन प्रेस, ओल्ड नं. 38, न्यू नं. 6, मक्निकोलस रोड, चेतपेट, चेन्नई; 299 रुपए।

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