ताज़ा खबर
 

किताबें मिलीं: ‘भीड़तंत्र’, ‘खिड़कियां’, ‘मेघ देवता’ और ‘कि ग़ालिब को याद करके गा सकूं’

पुस्तक समीक्षा

Author November 25, 2018 6:11 AM
‘भीड़तंत्र’ और ‘खिड़कियां

भीड़तंत्र
कहानी क्या है? कहानी की तमाम परिभाषाएं अधूरी हैं, क्योंकि समय के अनुसार परिभाषाएं छोटी पड़ती जाती हैं। जैसे-जैसे समय बीतता है वैसे-वैसे रचना से अपेक्षाएं बढ़ती जाती हैं और अंतत: रचना परिभाषा से बाहर निकल जाती है। इस संकलन की कहानियां इसी द्वंद्व का शिकार हैं। बहुत से पाठक और आलोचक इन कहानियों को कहानी ही नहीं मानेंगे। वे सीधा-सीधा कह सकते हैं कि इनमें तो न कोई कथानक है और न कोई पात्र है। इनमें कुछ ऐसी वैचारिकता है, जो कहानियों में नहीं होती, आदि। लेखक का अपना मत है कि कोई भी रचनात्मक अभिव्यक्ति कहानी हो सकती है। एक वाक्य या दो वाक्यों में भी कहानी लिखी जा सकती है। कहानी के लिए प्लॉट की कोई आवश्यकता नहीं है। उसकी जगह पाठक को बांधे रखने के लिए अगर विचार और भाव का क्रमिक विकास सामने आता है तो वह कथानक की कमी पूरी कर सकता है। जरूरी नहीं है कि संवादों के साथ पात्र भी सामने आएं। दरअसल, संवाद अपने आप में पात्रों का निर्माण करता है, जबकि परंपरागत कहानी के ढांचे में पात्र संवादों को बनाते हैं।
‘भीड़तंत्र’ की कहानियों में पाठकों को घृणा और हिंसा की वे परछाइयां दिखाई पड़ेंगी, जो आजकल हमारे समाज में मुखर हो गई हैं। कहानियां समाधान नहीं देतीं, केवल संकेत देती हैं। उन संकेतों से अगर पाठक कुछ ग्रहण कर सकें तो अच्छा है।
भीड़तंत्र : असगर वजाहत; राजपाल एंड संज, 1590, मदरसा रोड, कश्मीरी गेट, दिल्ली; 175 रुपए।

कि ग़ालिब को याद करके गा सकूं
प्रस्तुत काव्य संकलन की कविताओं को पढ़ना अनुभव और अनुभूति के एक ऐसे संसार से गुजरना है, जहां जीवन का संघर्ष अपने उद्दाम वेग से निरंतर जारी रहता है। सरला माहेश्वरी की कविताओं का मूल स्वर राजनीतिक हैं। इसकी एक वजह यह है कि राजनीति से उनका सक्रिय जुड़ाव रहा है और साथ ही कविता उन्हें विरासत में मिली है।
एक कवि के रूप में वे मृत्यु पर जीवन का, देवत्व पर मनुष्यत्व का और असहजता पर सहज-लौकिक आकांक्षाओं का जयगान करती हैं। उन्हें भली-भांति पता है कि संघर्ष के बिना कोई भी उपलब्धि नहीं होती। इसलिए वे ऐसे जननायकों का भी जयगान करती हैं। इरोम शर्मिला हो या दशरथ मांझी, वे इन्हें ‘सेलेब्रिटी’ बनाए जाने की व्यावसायिक रणनीति के समांतर उनके मानवीय पक्ष को उभारती हैं। यातना के रूप उन्हें अपने समाज से लेकर अफ्रीका में पिता द्वारा कर्ज अदा न कर पाने पर सात साल के अबोध बच्चे को फांसा पर लटका देने तक, हर जगह मिलते हैं। उनका यह अंतरराष्ट्रीयतावादी दृष्टिकोण प्रगतिशील आंदोलन और मार्क्सवादी विचारधारा की देन है। लेकिन प्रेरणादायक चरित्रों के उदाहरण उन्हें अपने देश में मिलते हैं- सुरजीत से लेकर इरोम तक। यह आज की सच्चाई देखते हुए और जनता की चेतना का धरातल देखते हुए अपनाया गया रचनात्मक ढंग हो सकता है।
कि ग़ालिब को याद करके गा सकूं : सरला माहेश्वरी; सूर्य प्रकाशन मंदिर, दाऊजी रोड (नेहरू मार्ग), बीकानेर; 400 रुपए।

खिड़कियां
अकेलापन एक ऐसी स्थिति है कि प्रत्येक के जीवन में कभी न कभी आती है। कभी भीड़ में भी व्यक्ति नितांत अकेला पड़ जाता है। आमतौर पर बुढ़ापे की ओर झुकते समय परिस्थितिवश व्यक्ति अकेलेपन का शिकार हो जाता है। उस समय ऐसा लगता है कि हर कोई उसकी भावनाओं से खेल रहा है।
दामोदर खड़से का उपन्यास ‘खिड़कियां’ पढ़ते समय ऐसा लगता है कि पाठक स्वयं अपने सामने खड़े हैं। दुनिया में कई लोग ऐसे हैं, जो अकेले हैं और अपने-आप से लड़ रहे हैं। यह उपन्यास पढ़ने पर पाठक अपने-आपको अकेला महसूस नहीं करेंगे। अपने जैसे कई लोग हमारे आसपास हैं, यह पाठक अनुभव करेंगे। जब व्यक्ति अपनी इच्छा से अकेलापन चुनता है, तब वह ‘एकांत’ पा जाता है। फिर इस ‘एकांत’ में अकेले होकर भी खुश रहता है। ऐसी स्थिति में वह स्वयं को तरोताजा, सकारात्मक और ऊर्जावान रखता है। इस उपन्यास का ‘नायक’ अरुण प्रकाश ऐसा ‘एकांत’ हासिल करने में यशस्वी हो जाते हैं। वे ‘खिड़कियों’ से कई लोगों के जीवन को अनुभव करते हैं। उन्हीं अनुभवों से वे अपने जीवन को देखते हैं- इसी से उन्हें ‘एकांत’ की प्राप्ति होती है। ऐसा ही ‘एकांत’ पाठक महसूस कर सकें, यही दामोदर खड़से बताना चाहते हैं और लगता है, यह बताने में वे पूर्णत: सफल हुए हैं।
खिड़कियां : दामोदर खड़से; वाणी प्रकाशन, 4695, दरियागंज, नई दिल्ली; 225 रुपए।

मेघ देवता
बाल कहानियों के इस संग्रह के रचनाकार मास्टर सैयद असद ‘आजाद’ प्रतिभा के धनी हैं। छठे वर्र्ग से इनमें कहानी लेखन की छटपटाहट महसूस की जा रही थी, जो आठवें वर्ग तक आते-आते किताब रूप में सामने है। परिपक्वता के अभाव के अंदेशे में पहले इजाजत घर से नहीं मिली, लेकिन प्रतिभा को कब तक कोई दबा सकता है।
कहानियों के तेवर देख कर सुखद अहसास की अनुभूति होती है। यह अनुभूति इसलिए कि मनोवैज्ञानिक तौर पर बच्चों के लिए लेखन बड़े साहित्यकार के लिए भी कभी आसान नहीं रहा है। ऐसे में एक बालक का अपने ही जैसे बालकों के लिए कहानी लिखना सराहनीय काम है।

संग्रह की सभी कहानियां एक से बढ़ कर एक हैं। ‘अनशन’, ‘प्रकृति की ओर’, ‘मेघ देवता’, ‘खुशियों वाली दिवाली’, ‘सोनू की समझदारी’, ‘सैलाब’, ‘शानू की जीत’, ‘बहादुर चिंटू’, ‘सच्ची मित्रता’ और ‘प्रतियोगिता’- सभी अपने शिल्प और कथानक में बेजोड़ हैं। ‘प्रतियोगिता’ जैसी छोटी कहानियां बाल कथा साहित्य की प्रतिमान है। इन कहानी में जिन कथा बिंबों का इस्तेमाल हुआ है वे सुपरिचित हैं और बड़े से लेकर बाल पाठकों के हृदय तक पहुंचने की क्षमता रखते हैं। कथाकार अपने अनुभव क्षेत्र में ही घूमता रहा है और अपनी साफ-सुथरी कल्पना और कौशल से पाठकों के दिल में उतरता है। कह सकते हैं कि आजाद ने इतनी कम उम्र में बाल-साहित्य में योगदान देकर साहित्य का कल्याण किया है।
मेघ देवता : सैयद असद ‘आजाद’; दूसरा मत प्रकाशन, 81-बी, सैनिक विहार, फेज-2, मोहन गार्डन, उत्तर नगर, नई दिल्ली; 225 रुपए।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

X