ताज़ा खबर
 

किताबें मिलीं: ‘बंद मुट्ठी’,’अनकही अनुभूतियों का सच’ और ‘एक्वेरियम तथा अन्य कहानियां’

बंद मुट्ठी ‘बंद मुट्ठी’ डायरी या संस्मरण की तरह लिखा गया उपन्यास है। लगभग पूरा उपन्यास अतीत में चलता है। एक पूरे जीवन को उजागर करते हुए। उपन्यास की भावभूमि भावनात्मक है कि पाठक एक बार पात्रों से जुड़ जाता है तो फिर वह स्वयं भी पात्रों के साथ कच्चे-पक्के रास्तों पर यात्रा करने लगता […]

Author March 24, 2019 3:56 AM
‘बंद मुट्ठी’,’अनकही अनुभूतियों का सच’ और ‘एक्वेरियम तथा अन्य कहानियां’

बंद मुट्ठी

‘बंद मुट्ठी’ डायरी या संस्मरण की तरह लिखा गया उपन्यास है। लगभग पूरा उपन्यास अतीत में चलता है। एक पूरे जीवन को उजागर करते हुए। उपन्यास की भावभूमि भावनात्मक है कि पाठक एक बार पात्रों से जुड़ जाता है तो फिर वह स्वयं भी पात्रों के साथ कच्चे-पक्के रास्तों पर यात्रा करने लगता है। अतीत के पन्नों को पलटते हुए पाठक उन पात्रों के साथ एकाकार हो जाता है और अपने आप को उन पात्रों के स्थान पर ही जीने लगता है। वे सारे सुख-दुख जो पात्रों के रास्ते में आते हैं, पाठक को पढ़ते समय महसूस होते हैं। इस तरह यह उपन्यास पठनीयता के मापदंडों पर बिल्कुल खरा उतरता है।
कृति में घटनाक्रम सिंगापुर और कनाडा का है। लेकिन भारत इन दोनों देशों से भी ज्यादा इस उपन्यास के पृष्ठों पर धड़कता हुआ महसूस होता है। यह लेखिका का कौशल है कि एक अनुपस्थित को उन्होंने हर जगह उपस्थित महसूस कराने में कामयाबी हासिल की है।
उपन्यास एक प्रश्न है हमारे समाज से कि हमें वास्तव में चाहिए क्या, हमारे अपनों की खुशी या वे परंपराएं जो अब सदियों पुरानी हो चुकी हैं? यह प्रश्न पूरे उपन्यास में शिद्दत के साथ गूंजता हुआ दिखाई देता है। सच कहें तो आज के दौर में इस तरह सवालों से मुठभेड़ करना वक्त का तकाजा भी है।
बंद मुट्ठी: डॉ हंसा दीप; शिवना प्रकाशन, पीसी लैब, सम्राट कॉम्पलैक्स बेसमेंट, बस स्टैंड, सीहोर-466001; 300 रुपए।

अनकही अनुभूतियों का सच
प्रस्तुत काव्य संग्रह की कविताओं से गुजरते हुए ऐसा लगता है कि समस्याओं से घिरी हुई जिंदगी में भी जिजीविषा लेखक का आदर्श है। जड़ता, भाग्यवाद और निराशा से टकराते हुए सुनहरे भविष्य की ललक कविताओं में दिखाई पड़ती है। ‘अग्रदूत’ कविता में इसी की अभिव्यक्ति देखने को मिलती है। ‘क्रांति एक दिन में नहीं आती/ न ही मेरी कविता बदल देगी इस समाज की तस्वीर रातों रात… पर मैं हारूंगा नहीं।’ दरअसल, ‘पर मैं हारूंगा नहीं’ यह सोच ही इस कविता का कद बड़ा करती है।
अधिकांश कविताएं गांव की, माटी की गंध से सराबोर तो हैं, पर बदल रहे परिवेश में कुछ स्मृतियों के खोने, छूटने की एक कसक महसूस होती रही है। विज्ञान और तकनीकी विकास के त्वरित प्रभाव ने मनुष्य की आधुनिक पीढ़ी की सोच को, रहन-सहन को जिस तरह प्रभावित किया, पीढ़ियों के अंतराल की सोच जहां आकर खड़ी होती हैं अरविंद भट्ट की कविताएं वहां से शुरू होती हैं।
‘सरलीकरण’ कविता में वे कहते हैं कि ‘…मेरा हल सीधा सपाट है… और तुम्हारा बहुत ही क्लिष्ट/ जीवन का मूल उद्देश्य उसके सरलीकरण में है… उसको इतना कठिन मत बना देना कि उसका उद्देश्य ही विस्मृत हो जाए।’
अनकही अनुभूतियों का सच: अरविंद भट्ट; अंजुमन प्रकाशन, 942, आर्य कन्या चौराहा, मुट्ठीगंज, इलाहाबाद-211003; 200 रुपए।

एक्वेरियम तथा अन्य कहानियां
महेंद्र सिंह की कहानियों के केंद्र में हमारे समय के अंतर्विरोधों से जूझता हुआ मनुष्य है, उसकी पीड़ाएं हैं, उसके संघर्ष हैं और उसके सपने हैं। वे मनुष्य की इस पीड़ा को व्यापकता और विराटता में दर्ज करते हैं- मानवीयता के साथ और यह मानवीयता ही उनका कहानियों का प्रस्थान बिंदु है। ‘एक्वेरियम’ कहानी समय के गहरे सवाल हमारे सामने खड़े करती है कि ‘एक्वेरियम के लिए मरना ठीक है या बाहर आकर शहीद हो जाना।’ महेंद्र सिंह के कथा लेखन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे उन लोगों के संघर्षों को अपनी कथा में वाणी देते हैं जो अभाव ग्रस्त हैं, जो शोषित हैं और जो बदलाव के पक्षधर हैं। वह उनकी जिंदगी के दबावों, संघर्षों और तनावों को व्यक्त करते हैं। ‘दांव’, ‘भोर का तारा’, ‘पॉलीथीन की थैली’, ‘एक्वेरियम’ हमारे समय के कोलाज को गहराई से प्रस्तुत करने वाली कहानियां हैं।
स्थानीयता महेंद्र सिंह की कहानियों को न सिर्फ विश्वसनीय बनाती है, बल्कि पाठकों को बांधे भी रखती है।
एक्वेरियम तथा अन्य कहानियां: महेंद्र सिंह; राज पब्लिशिंग हाऊस, 9/5123, गली नं.1, कौशिक पुरी, पुराना सीलमपुर, दिल्ली-110031; 450 रुपए।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App